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✦ भगवद्गीता • अध्याय २ • ७२ श्लोक ✦

Nishkam Karma Yoga

निष्काम कर्म योग
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कुरुक्षेत्र के रणांगण में अर्जुन के विषाद के उत्तर में श्रीकृष्ण ने जो ज्ञान दिया — वह गीता का द्वितीय अध्याय है। निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता, और स्थितप्रज्ञ की परिभाषा — यह गीता का सार है।

भगवद्गीता • अध्याय २ • सांख्य योग • श्रीकृष्णोवाच
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन⚖️ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि⚖️ योगस्थः कुरु कर्माणि⚖️ स्थितप्रज्ञस्य का भाषा⚖️ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम्⚖️ नासतो विद्यते भावो⚖️ समत्वं योग उच्यते⚖️ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन⚖️ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि⚖️ स्थितप्रज्ञस्य का भाषा⚖️ समत्वं योग उच्यते⚖️
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✦ गीता अध्याय २ — प्रमुख श्लोक ✦
✦ प्रसंग — कुरुक्षेत्र ✦
अर्जुन रथ में बैठकर विषादग्रस्त हो गए — कुटुम्बियों को देखकर धनुष छोड़ दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उपदेश दिया। अध्याय २ में आत्मा की अमरता, निष्काम कर्म का सिद्धान्त और स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए गए। यह समस्त गीता का सार-अध्याय है।
✦ आत्मा की अमरता ✦
॥ २.१९ ॥
आत्मा — न हन्ता न हन्यते
BHAGAVAD GITA · 2.19
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
Ya Enaṃ Vetti Hantāraṃ Yaś-Cainaṃ Manyate Hatam | Ubhau Tau Na Vijānīto Nāyaṃ Hanti Na Hanyate
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है — दोनों ही नहीं जानते। यह न मारता है, न मारा जाता है।
सार : आत्मा कर्ता नहीं, साक्षी है। शरीर नश्वर है, आत्मा अविनाशी।
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॥ २.२० ॥
नित्योऽयमजो नित्यः शाश्वतः
BHAGAVAD GITA · 2.20
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
Na Jāyate Mriyate Vā Kadācin Nāyaṃ Bhūtvā Bhavitā Vā Na Bhūyaḥ | Ajo Nityaḥ Śāśvato'yaṃ Purāṇo Na Hanyate Hanyamāne Śarīre
यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। न यह होकर फिर न होती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है — शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती।
सार : आत्मा का न जन्म है न मृत्यु — यह सनातन सत्य है।
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॥ २.२२ ॥
वासांसि जीर्णानि — वस्त्र-उपमा
BHAGAVAD GITA · 2.22
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
Vāsāṃsi Jīrṇāni Yathā Vihāya Navāni Gṛhṇāti Naro'parāṇi | Tathā Śarīrāṇi Vihāya Jīrṇāny-Anyāni Saṃyāti Navāni Dehī
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है — उसी प्रकार आत्मा जीर्ण शरीरों को छोड़कर अन्य नए शरीरों में प्रवेश करती है।
सार : शरीर वस्त्र के समान है — आत्मा शाश्वत धारक है।
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✦ निष्काम कर्म — गीता सार ✦
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॥ २.४८ ॥
योगस्थः कुरु कर्माणि — समत्व
BHAGAVAD GITA · 2.48
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
Yoga-Sthaḥ Kuru Karmāṇi Saṅgaṃ Tyaktvā Dhanañjaya | Siddhy-Asiddhyoḥ Samo Bhūtvā Samatvaṃ Yoga Ucyate
हे धनञ्जय! आसक्ति त्यागकर, सफलता और असफलता में समान रहकर, योगस्थ होकर कर्म करो। यह समत्व ही योग कहलाता है।
सार : समत्व — सुख-दुःख, जय-पराजय में समान भाव — ही वास्तविक योग है।
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॥ २.५० ॥
बुद्धियुक्तो जहातीह — कुशल कर्म
BHAGAVAD GITA · 2.50
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
Buddhi-Yukto Jahātīha Ubhe Sukṛta-Duṣkṛte | Tasmād-Yogāya Yujyasva Yogaḥ Karmasu Kauśalam
समबुद्धि वाला इस जन्म में ही पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए योग में लगो — योग ही कर्मों में कुशलता है।
सार : "योगः कर्मसु कौशलम्" — बुद्धिपूर्वक किया गया कर्म ही योग है।
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✦ स्थितप्रज्ञ — स्थिर बुद्धि वाला ✦
✦ स्थितप्रज्ञ के लक्षण — गीता २.५५–५८ ✦
मनोगत कामनाएँ त्यागना
DESIRELESSNESS · 2.55
सब मनोगत कामनाओं को त्यागकर आत्मा में ही सन्तुष्ट रहना
दुःख में उद्विग्न न होना
EQUANIMITY · 2.56
दुःख में उद्विग्न नहीं, सुख में स्पृहा नहीं — राग-द्वेष-भय से रहित
कछुए सी इन्द्रिय-संयम
SENSE-WITHDRAWAL · 2.58
जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे इन्द्रियों को विषयों से हटाना
स्थितधी प्रज्ञा
STEADY WISDOM · 2.54
परमात्मा में प्रतिष्ठित, बाह्य विषयों में विचलित न होने वाली बुद्धि
॥ २.५५ ॥
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा — परिभाषा
BHAGAVAD GITA · 2.55
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
Prajahāti Yadā Kāmān Sarvān Pārtha Mano-Gatān | Ātmany-Evātmanā Tuṣṭaḥ Sthita-Prajñas-Tadocyate
हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है — तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
सार : स्थितप्रज्ञ — जो फल की अपेक्षा न रखते हुए, आत्मसन्तुष्ट होकर जीता है।
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॥ २.५८ ॥
कूर्म इव — कछुए की उपमा
BHAGAVAD GITA · 2.58
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
Yadā Saṃharate Cāyaṃ Kūrmo'ṅgānīva Sarvaśaḥ | Indriyāṇīndriyārthebhyas-Tasya Prajñā Pratiṣṭhitā
जब यह व्यक्ति जिस प्रकार कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियों को उनके विषयों से खींच लेता है — तब उसकी बुद्धि स्थिर है।
सार : इन्द्रिय-संयम स्थितप्रज्ञता की नींव है — विषयों से विरक्ति नहीं, नियन्त्रण।
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✦ विषय-क्रम — पतन की शृंखला ✦
॥ २.६२–६३ ॥
ध्यायतो विषयान् — पतन-क्रम
BHAGAVAD GITA · 2.62–63
ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥
Dhyāyato Viṣayān Puṃsaḥ Saṅgas-Teṣūpajāyate | Saṅgāt Sañjāyate Kāmaḥ Kāmāt Krodho'bhijāyate | Krodhād Bhavati Sammohaḥ Sammohāt Smṛti-Vibhramaḥ | Smṛti-Bhraṃśād Buddhi-Nāśo Buddhi-Nāśāt Praṇaśyati
विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति होती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है, कामना से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-भ्रम, स्मृति-भ्रम से बुद्धि-नाश और बुद्धि-नाश से मनुष्य का पूर्ण पतन होता है।
पतन की शृंखला : विषय → आसक्ति → काम → क्रोध → मोह → स्मृतिभ्रंश → बुद्धिनाश → पतन।
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॥ २.७० ॥
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं — शान्ति की प्राप्ति
BHAGAVAD GITA · 2.70
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
Āpūryamāṇam-Acala-Pratiṣṭhaṃ Samudram-Āpaḥ Praviśanti Yadvat | Tadvat Kāmā Yaṃ Praviśanti Sarve Sa Śāntim-Āpnoti Na Kāma-Kāmī
जैसे सब नदियों का जल समुद्र में प्रवेश करता है पर समुद्र अचल रहता है — उसी प्रकार जिसमें सब काम-वासनाएँ प्रवेश करती हैं पर वह अविचल रहता है, उसे शान्ति मिलती है — कामनाओं की पूर्ति चाहने वाले को नहीं।
सार : समुद्र-सी अचल बुद्धि — कामनाएँ आती-जाती हैं पर स्थितप्रज्ञ विचलित नहीं होता।
✦ अध्याय-फल — गीता २ माहात्म्य ✦
गीतायाः द्वितीयोऽध्यायः पठितो यः प्रयत्नतः।
ज्ञानविज्ञानयुक्तोऽसौ मोक्षमार्गं च विन्दति॥
कर्मण्येवाधिकारश्च स्थितप्रज्ञस्य लक्षणम्।
पठतां श्रृण्वतां चापि कुरुते कर्म-कौशलम्॥
Gītāyāḥ Dvitīyo'dhyāyaḥ Paṭhito Yaḥ Prayatnataḥ | Jñāna-Vijñāna-Yukto'sau Mokṣa-Mārgaṃ Ca Vindati
जो गीता के द्वितीय अध्याय का प्रयत्नपूर्वक पठन करता है, वह ज्ञान-विज्ञान से युक्त होकर मोक्ष-मार्ग को प्राप्त करता है। कर्मण्येवाधिकारस्ते का नित्य स्मरण और स्थितप्रज्ञ के लक्षण का चिन्तन — यह कर्म-कौशल की सिद्धि देता है।

⚖️ गीता अध्याय २ — परिचय

भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय "सांख्य योग" भी कहलाता है। इसमें ७२ श्लोक हैं। अर्जुन के विषाद के उत्तर में श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम आत्मा की नित्यता का प्रतिपादन किया, फिर निष्काम कर्म का सिद्धान्त और अन्त में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए।

"कर्मण्येवाधिकारस्ते" — यह श्लोक विश्व के सबसे प्रसिद्ध दर्शन-वाक्यों में से एक है। यह न केवल आध्यात्मिक, बल्कि जीवन-व्यवहार का भी परम मार्गदर्शक है।

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निष्काम कर्मफल की अपेक्षा के बिना कर्म — यह भारतीय दर्शन का सबसे क्रान्तिकारी सिद्धान्त है जो गीता के दूसरे अध्याय में प्रतिपादित है।
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आत्मा की अमरतावासांसि जीर्णानि — शरीर वस्त्र है, आत्मा अजर-अमर। यह उपमा सम्पूर्ण भारतीय दर्शन की आधारशिला है।
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स्थितप्रज्ञस्थिर बुद्धि वाला — सुख-दुःख में समान, कामना-रहित, इन्द्रिय-संयमी। यह गीता का आदर्श पुरुष है।
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कुरुक्षेत्र प्रसंगधृतराष्ट्र के दरबार से शुरू होकर रणांगण तक — अर्जुन का मोह और कृष्ण का उपदेश। यह केवल युद्ध नहीं, जीवन का दर्शन है।
GITA CHAPTER 2
निष्काम कर्म योग