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✦ गीता अध्याय २ — प्रमुख श्लोक ✦
✦ प्रसंग — कुरुक्षेत्र ✦
अर्जुन रथ में बैठकर विषादग्रस्त हो गए — कुटुम्बियों को देखकर धनुष छोड़ दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उपदेश दिया। अध्याय २ में आत्मा की अमरता, निष्काम कर्म का सिद्धान्त और स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए गए। यह समस्त गीता का सार-अध्याय है।
॥ २.१९ ॥
आत्मा — न हन्ता न हन्यते
BHAGAVAD GITA · 2.19
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
Ya Enaṃ Vetti Hantāraṃ Yaś-Cainaṃ Manyate Hatam | Ubhau Tau Na Vijānīto Nāyaṃ Hanti Na Hanyate
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है — दोनों ही नहीं जानते। यह न मारता है, न मारा जाता है।
सार : आत्मा कर्ता नहीं, साक्षी है। शरीर नश्वर है, आत्मा अविनाशी।
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॥ २.२० ॥
नित्योऽयमजो नित्यः शाश्वतः
BHAGAVAD GITA · 2.20
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
Na Jāyate Mriyate Vā Kadācin Nāyaṃ Bhūtvā Bhavitā Vā Na Bhūyaḥ | Ajo Nityaḥ Śāśvato'yaṃ Purāṇo Na Hanyate Hanyamāne Śarīre
यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। न यह होकर फिर न होती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है — शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती।
सार : आत्मा का न जन्म है न मृत्यु — यह सनातन सत्य है।
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॥ २.२२ ॥
वासांसि जीर्णानि — वस्त्र-उपमा
BHAGAVAD GITA · 2.22
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
Vāsāṃsi Jīrṇāni Yathā Vihāya Navāni Gṛhṇāti Naro'parāṇi | Tathā Śarīrāṇi Vihāya Jīrṇāny-Anyāni Saṃyāti Navāni Dehī
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है — उसी प्रकार आत्मा जीर्ण शरीरों को छोड़कर अन्य नए शरीरों में प्रवेश करती है।
सार : शरीर वस्त्र के समान है — आत्मा शाश्वत धारक है।
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✦ निष्काम कर्म — गीता सार ✦
॥ २.४७ ॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते — सर्वप्रसिद्ध श्लोक
BHAGAVAD GITA · 2.47 · GITA SAAR
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
Karmaṇy-Evādhikāraste Mā Phaleṣu Kadācana | Mā Karma-Phala-Hetur-Bhūr Mā Te Saṅgo'stv-Akarmaṇi
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। इसलिए न तो कर्म-फल के लिए काम करो और न ही अकर्म (कर्म न करने) में आसक्त रहो।
गीता का केन्द्रीय सन्देश : कर्म करो, फल की चिन्ता ईश्वर पर छोड़ो। यही निष्काम कर्म है — समत्व बुद्धि से किया गया कर्म।
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॥ २.४८ ॥
योगस्थः कुरु कर्माणि — समत्व
BHAGAVAD GITA · 2.48
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
Yoga-Sthaḥ Kuru Karmāṇi Saṅgaṃ Tyaktvā Dhanañjaya | Siddhy-Asiddhyoḥ Samo Bhūtvā Samatvaṃ Yoga Ucyate
हे धनञ्जय! आसक्ति त्यागकर, सफलता और असफलता में समान रहकर, योगस्थ होकर कर्म करो। यह समत्व ही योग कहलाता है।
सार : समत्व — सुख-दुःख, जय-पराजय में समान भाव — ही वास्तविक योग है।
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॥ २.५० ॥
बुद्धियुक्तो जहातीह — कुशल कर्म
BHAGAVAD GITA · 2.50
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
Buddhi-Yukto Jahātīha Ubhe Sukṛta-Duṣkṛte | Tasmād-Yogāya Yujyasva Yogaḥ Karmasu Kauśalam
समबुद्धि वाला इस जन्म में ही पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए योग में लगो — योग ही कर्मों में कुशलता है।
सार : "योगः कर्मसु कौशलम्" — बुद्धिपूर्वक किया गया कर्म ही योग है।
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✦ स्थितप्रज्ञ — स्थिर बुद्धि वाला ✦
✦ स्थितप्रज्ञ के लक्षण — गीता २.५५–५८ ✦
मनोगत कामनाएँ त्यागना
DESIRELESSNESS · 2.55
सब मनोगत कामनाओं को त्यागकर आत्मा में ही सन्तुष्ट रहना
दुःख में उद्विग्न न होना
EQUANIMITY · 2.56
दुःख में उद्विग्न नहीं, सुख में स्पृहा नहीं — राग-द्वेष-भय से रहित
कछुए सी इन्द्रिय-संयम
SENSE-WITHDRAWAL · 2.58
जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे इन्द्रियों को विषयों से हटाना
स्थितधी प्रज्ञा
STEADY WISDOM · 2.54
परमात्मा में प्रतिष्ठित, बाह्य विषयों में विचलित न होने वाली बुद्धि
॥ २.५५ ॥
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा — परिभाषा
BHAGAVAD GITA · 2.55
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
Prajahāti Yadā Kāmān Sarvān Pārtha Mano-Gatān | Ātmany-Evātmanā Tuṣṭaḥ Sthita-Prajñas-Tadocyate
हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है — तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
सार : स्थितप्रज्ञ — जो फल की अपेक्षा न रखते हुए, आत्मसन्तुष्ट होकर जीता है।
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॥ २.५८ ॥
कूर्म इव — कछुए की उपमा
BHAGAVAD GITA · 2.58
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
Yadā Saṃharate Cāyaṃ Kūrmo'ṅgānīva Sarvaśaḥ | Indriyāṇīndriyārthebhyas-Tasya Prajñā Pratiṣṭhitā
जब यह व्यक्ति जिस प्रकार कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियों को उनके विषयों से खींच लेता है — तब उसकी बुद्धि स्थिर है।
सार : इन्द्रिय-संयम स्थितप्रज्ञता की नींव है — विषयों से विरक्ति नहीं, नियन्त्रण।
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✦ विषय-क्रम — पतन की शृंखला ✦
॥ २.६२–६३ ॥
ध्यायतो विषयान् — पतन-क्रम
BHAGAVAD GITA · 2.62–63
ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥
Dhyāyato Viṣayān Puṃsaḥ Saṅgas-Teṣūpajāyate | Saṅgāt Sañjāyate Kāmaḥ Kāmāt Krodho'bhijāyate | Krodhād Bhavati Sammohaḥ Sammohāt Smṛti-Vibhramaḥ | Smṛti-Bhraṃśād Buddhi-Nāśo Buddhi-Nāśāt Praṇaśyati
विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति होती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है, कामना से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-भ्रम, स्मृति-भ्रम से बुद्धि-नाश और बुद्धि-नाश से मनुष्य का पूर्ण पतन होता है।
पतन की शृंखला : विषय → आसक्ति → काम → क्रोध → मोह → स्मृतिभ्रंश → बुद्धिनाश → पतन।
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॥ २.७० ॥
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं — शान्ति की प्राप्ति
BHAGAVAD GITA · 2.70
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
Āpūryamāṇam-Acala-Pratiṣṭhaṃ Samudram-Āpaḥ Praviśanti Yadvat | Tadvat Kāmā Yaṃ Praviśanti Sarve Sa Śāntim-Āpnoti Na Kāma-Kāmī
जैसे सब नदियों का जल समुद्र में प्रवेश करता है पर समुद्र अचल रहता है — उसी प्रकार जिसमें सब काम-वासनाएँ प्रवेश करती हैं पर वह अविचल रहता है, उसे शान्ति मिलती है — कामनाओं की पूर्ति चाहने वाले को नहीं।
सार : समुद्र-सी अचल बुद्धि — कामनाएँ आती-जाती हैं पर स्थितप्रज्ञ विचलित नहीं होता।
✦ अध्याय-फल — गीता २ माहात्म्य ✦
गीतायाः द्वितीयोऽध्यायः पठितो यः प्रयत्नतः।
ज्ञानविज्ञानयुक्तोऽसौ मोक्षमार्गं च विन्दति॥
कर्मण्येवाधिकारश्च स्थितप्रज्ञस्य लक्षणम्।
पठतां श्रृण्वतां चापि कुरुते कर्म-कौशलम्॥
Gītāyāḥ Dvitīyo'dhyāyaḥ Paṭhito Yaḥ Prayatnataḥ | Jñāna-Vijñāna-Yukto'sau Mokṣa-Mārgaṃ Ca Vindati
जो गीता के द्वितीय अध्याय का प्रयत्नपूर्वक पठन करता है, वह ज्ञान-विज्ञान से युक्त होकर मोक्ष-मार्ग को प्राप्त करता है। कर्मण्येवाधिकारस्ते का नित्य स्मरण और स्थितप्रज्ञ के लक्षण का चिन्तन — यह कर्म-कौशल की सिद्धि देता है।