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✦ ब्रह्मसंहिता • पञ्चम अध्याय • ब्रह्माजी विरचितम् ✦

Govindam Adi Purusham

गोविन्दम् आदि पुरुषम्
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ब्रह्माजी द्वारा रचित ब्रह्मसंहिता के पञ्चम अध्याय का यह प्रमुख श्लोक भगवान गोविन्द के आदि-पुरुष रूप की महिमा गाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने दक्षिण भारत की यात्रा में इसे प्राप्त किया और इसे परम प्रमाण माना।

रचयिता : ब्रह्माजी • ब्रह्मसंहिता • पञ्चम अध्याय • गौड़ीय वैष्णव परम्परा
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि🦚 वेणुं क्वणन्तमरविन्ददलायताक्षम्🦚 बर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दराङ्गम्🦚 कन्दर्पकोटिकमनीयविशेषशोभम्🦚 आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभिः🦚 चिन्तामणिप्रकरसद्मसु🦚 सहस्रपत्रकमलगोकुलमादिपूज्यम्🦚 गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि🦚 वेणुं क्वणन्तमरविन्ददलायताक्षम्🦚 कन्दर्पकोटिकमनीयविशेषशोभम्🦚 गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि🦚
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✦ गोविन्दम् आदि पुरुषम् — सम्पूर्ण ✦
✦ ब्रह्मसंहिता ५.१ — मूल प्रतिज्ञा ✦
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥
Īśvaraḥ Paramaḥ Kṛṣṇaḥ Saccidānanda-Vigrahaḥ | Anādir-Ādir-Govindaḥ Sarva-Kāraṇa-Kāraṇam
॥ श्लोक १ ॥
वेणुं क्वणन्तम् — दिव्य-रूप वर्णन
वेणुं क्वणन्तमरविन्ददलायताक्षम्
बर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दराङ्गम्।
कन्दर्पकोटिकमनीयविशेषशोभम्
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Veṇuṃ Kvaṇantam Aravinda-Dalāyatākṣam Barhāvataṃsam Asitāmbuda-Sundarāṅgam | Kandarpa-Koṭi-Kamanīya-Viśeṣa-Śobham Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जो मुरली बजा रहे हैं, जिनके नेत्र कमल-दल के समान विशाल हैं, जो मोर-पंख मुकुट धारण किए हैं, जिनका अंग नीले मेघ के समान सुन्दर है, जो करोड़ों कामदेवों से भी अधिक मनोहर हैं — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक २ ॥
आलोलचन्द्रकलसद्वनमाल्यवंशी — श्रृंगार
आलोलचन्द्रकलसद्वनमाल्यवंशी-
रत्नाङ्गदं प्रणयकेलिकलाविलासम्।
श्यामं त्रिभङ्गललितं नयनाभिरामम्
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Ālola-Candrakala-Sad-Vanamālya-Vaṃśī Ratnāṅgadaṃ Praṇaya-Keli-Kalā-Vilāsam | Śyāmaṃ Tribhaṅga-Lalitaṃ Nayanābhirāmam Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जो चन्द्र-कला सदृश वनमाला और बाँसुरी धारण किए हुए हैं, जो रत्नजड़ित बाजूबन्द पहने हैं, जो प्रेम-क्रीड़ा में विलास करते हैं, जो श्यामवर्ण, त्रिभंग मुद्रा में ललित और नेत्रों को आनन्द देने वाले हैं — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक ३ ॥
आनन्दचिन्मयरस — गोपियों का प्रेम
आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि-
स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः।
गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Ānanda-Cinmaya-Rasa-Pratibhāvitābhis Tābhir Ya Eva Nija-Rūpatayā Kalābhiḥ | Goloka Eva Nivasaty-Akhilātma-Bhūto Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जो आनन्द-चिन्मय-रस से परिपूर्ण अपनी स्वरूपभूत कलाओं (गोपियों) के साथ गोलोक में निवास करते हैं, जो समस्त आत्माओं के मूल हैं — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक ४ ॥
श्रीराधिकाप्रसाद — राधा-कृष्ण युगल
श्रीराधिकाप्रसादाय मदनगोपाल-
माधुर्यलीलामधुरालयाय नमो नमः।
वृन्दारण्यप्रियाय गोपीहृदयानन्द-
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Śrī-Rādhikā-Prasādāya Madana-Gopāla Mādhurya-Līlā-Madhurālayāya Namo Namaḥ | Vṛndāraṇya-Priyāya Gopī-Hṛdayānanda Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जो श्रीराधिका के कृपापात्र हैं, जो मदनगोपाल की मधुर लीलाओं के आधार हैं, जो वृन्दावन वन के प्रिय हैं, जो गोपियों के हृदय को आनन्द देते हैं — उन आदि पुरुष गोविन्द को बार-बार नमन तथा उनकी मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक ५ ॥
चिन्तामणिप्रकर — गोलोक धाम
चिन्तामणिप्रकरसद्मसु कल्पवृक्ष-
लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम्।
लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Cintāmaṇi-Prakara-Sadmasu Kalpa-Vṛkṣa Lakṣāvṛteṣu Surabhīr Abhi-Pālayantam | Lakṣmī-Sahasra-Śata-Sambhrama-Sevyamānaṃ Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जो चिन्तामणि-निर्मित भवनों में, लाखों कल्प-वृक्षों से घिरे स्थान पर, सुरभि (कामधेनु) गायों का पालन करते हैं और लाखों-करोड़ों लक्ष्मियों द्वारा आदरपूर्वक सेवित हैं — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक ६ ॥
वेणुनादेन — सकल लोकों का आकर्षण
वेणुनादेन निखिलसुरमुनिचित्त-
हारिणे गोपिकानयनचकोरचन्द्राय।
कालिन्दीकूलकदम्बाश्रयशीलाय
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Veṇu-Nādena Nikhila-Sura-Muni-Citta Hāriṇe Gopikā-Nayana-Cakora-Candrāya | Kālindī-Kūla-Kadambāśraya-Śīlāya Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जिनकी वेणु-धुन समस्त देवों और मुनियों के चित्त को हर लेती है, जो गोपियों के नेत्र-रूपी चकोर पक्षियों के चन्द्रमा हैं, जो कालिन्दी (यमुना) के तट पर कदम्ब-वृक्ष के आश्रय लेते हैं — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक ७ ॥
सहस्रपत्रकमल — गोकुल आदि पूज्य
सहस्रपत्रकमलगोकुलमादिपूज्यं
सत्पद्मकेसरनिभं रचितं च पाणौ।
तद्विप्रसादपरिभावितसेव्यमानं
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Sahasra-Patra-Kamala-Gokulam Ādi-Pūjyaṃ Sat-Padma-Kesara-Nibhaṃ Racitaṃ Ca Pāṇau | Tad-Vipra-Sāda-Paribhāvita-Sevyamānaṃ Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जो सहस्र-दल-कमल के समान गोकुल में सबसे पहले पूजनीय हैं, जिनके हाथ में सत्-कमल का केसर-सदृश रचा हुआ चिह्न है, जो ब्राह्मणों की कृपा से परिभावित और सेवित हैं — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक ८ ॥
रामादि मूर्तिषु — दिव्य विस्तार
रामादि मूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्
नानावतारमकरोद्भुवनेषु किन्तु।
कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Rāmādi Mūrtiṣu Kalā-Niyamena Tiṣṭhan Nānāvatāram Akarod Bhuvaneṣu Kintu | Kṛṣṇaḥ Svayam Samabhavat Paramaḥ Pumān Yo Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जो राम आदि अवतारी रूपों में कला के नियम से स्थित रहते हुए विभिन्न लोकों में नाना अवतार लेते हैं, किन्तु परम पुरुष कृष्ण स्वयं (स्वयं भगवान्) प्रकट हुए — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक ९ ॥
एकोऽप्यसौ — दिव्य शक्ति
एकोऽप्यसौ रचयितुं जगदण्डकोटिं
यच्छक्तिरस्ति जगदण्डचया यदन्तः।
अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थं
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Eko'py Asau Racayituṃ Jagad-Aṇḍa-Koṭiṃ Yac-Chaktirastī Jagad-Aṇḍa-Cayā Yadantaḥ | Aṇḍāntara-Stha-Paramāṇu-Cayāntarasthaṃ Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जो अकेले ही करोड़ों ब्रह्माण्डों को रचने की शक्ति रखते हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डों के भीतर और उन ब्रह्माण्डों के भीतर प्रत्येक परमाणु में भी स्थित हैं — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
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॥ श्लोक १० ॥
अङ्गानि यस्य — ब्रह्माजी की स्तुति
अङ्गानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति
पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति।
आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वलविग्रहस्य
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
Aṅgāni Yasya Sakalendriya-Vṛttimanti Paśyanti Pānti Kalayanti Ciraṃ Jaganti | Ānanda-Cinmaya-Sad-Ujjvala-Vigrahasya Govindam Ādi-Puruṣam Tam-Ahaṃ Bhajāmi
गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामि॥
जिनके अंग-प्रत्यंग सभी इन्द्रियों के कार्य करने में समर्थ हैं, जो जगत को देखते, पालते और बनाए रखते हैं, जिनका विग्रह आनन्द-चिन्मय-सत् से उज्ज्वल है — उन आदि पुरुष गोविन्द की मैं भजना करता हूँ।
✦ ब्रह्मसंहिता फलश्रुति ✦
श्रीब्रह्मसंहिता पठेद् यः श्रद्धया सदा।
गोविन्दस्य प्रसादेन गोलोकं स गमिष्यति॥
चैतन्यप्रभुना लब्धं नीलाचले परमाद्भुतम्।
तत्स्तोत्रं पठतां नित्यं मुक्तिं ददाति दुर्लभाम्॥
Śrī-Brahma-Saṃhitā Paṭhed Yaḥ Śraddhayā Sadā | Govindasya Prasādena Golokaṃ Sa Gamiṣyati
जो श्रद्धापूर्वक सदा इस ब्रह्मसंहिता का पाठ करता है, वह गोविन्द की कृपा से गोलोक को प्राप्त करता है। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा नीलाचल में प्राप्त यह परम अद्भुत स्तोत्र नित्य पठन से दुर्लभ मुक्ति प्रदान करता है।

🦚 ब्रह्मसंहिता — परिचय

ब्रह्मसंहिता की रचना स्वयं ब्रह्माजी ने की है। इसके पञ्चम अध्याय में भगवान गोविन्द के परम स्वरूप, गोलोक धाम, और उनकी दिव्य लीलाओं का विस्तृत वर्णन है। "आदि पुरुष" का अर्थ है — समस्त कारणों के आदि कारण, जो सर्वप्रथम पुरुष हैं।

श्री चैतन्य महाप्रभु ने दक्षिण भारत की यात्रा (१५१०-१५११ ई.) के दौरान आदि केशव मन्दिर (तिरुवट्टार) में इस ग्रन्थ को प्राप्त किया और इसे गौड़ीय वैष्णव दर्शन का प्रमाण-ग्रन्थ माना।

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आदि पुरुषम्गोविन्द समस्त अस्तित्व के आदि स्रोत हैं — यह श्लोक उस सत्य को प्रकट करता है जो समस्त वेद-शास्त्रों का सार है।
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गोलोक धामचिन्तामणि भवन, कल्प-वृक्ष और सुरभि गायों से युक्त गोलोक — भगवान का परम निवास इस स्तोत्र में चित्रित है।
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वेणु-माधुर्यबाँसुरी की धुन जो देवों और मुनियों के चित्त को हर लेती है — वेणुं क्वणन्तम् — यह ब्रह्मसंहिता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है।
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चैतन्य महाप्रभु१५वीं-१६वीं शताब्दी के भक्तिवेदान्त आचार्य श्री चैतन्य ने इस ग्रन्थ को दक्षिण यात्रा में खोजा और गौड़ीय परम्परा में स्थापित किया।
GOVINDAM ADI PURUSHAM
ब्रह्मसंहिता • पञ्चम अध्याय