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✦ गायत्री छन्द • २४ अक्षर ✦

Krishna Gayatri

कृष्ण गायत्री मंत्र
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गायत्री छन्द में निबद्ध भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य मंत्र — देवकी-नन्दन का ध्यान, वासुदेव का धीमहि और कृष्ण की प्रेरणा का वरदान।

गायत्री छन्द • २४ अक्षर • ब्रह्म-मुहूर्त जप
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे
वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥
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✦ कृष्ण गायत्री — सम्पूर्ण मंत्र एवं अर्थ ✦
देवकीनन्दनाय विद्महे
वासुदेवाय धीमहि
तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्
Oṃ Devakī-Nandanāya Vidmahe |
Vāsudevāya Dhīmahi |
Tanno Kṛṣṇaḥ Pracodayāt ॥
✦ पद-पद अर्थ — Word by Word ✦
Oṃ
परमात्मा का वाचक प्रणव — सृष्टि का आदि नाद, जो ब्रह्म का बोधक है।
देवकीनन्दनाय
Devakī-Nandanāya
देवकी के पुत्र, नन्द को प्रदान किए गए — मथुरा में जन्मे, गोकुल में पले।
विद्महे
Vidmahe
हम जानते हैं / हम ध्यान करते हैं — परिचय और ध्यान का भाव।
वासुदेवाय
Vāsudevāya
वसुदेव के पुत्र, सर्वत्र व्याप्त — वासुदेव अर्थात् जो सब में वास करते हैं।
धीमहि
Dhīmahi
हम धारण करते हैं / ध्यान करते हैं — बुद्धि में स्थापित करने का भाव।
तन्नो कृष्णः
Tanno Kṛṣṇaḥ
वह कृष्ण हमको — "तत्" अर्थात् वह परम, "नः" अर्थात् हमको।
प्रचोदयात्
Pracodayāt
प्रेरित करें / उद्दीप्त करें — बुद्धि, प्राण और आत्मा को सन्मार्ग पर प्रेरित करें।
✦ सम्पूर्ण अर्थ ✦
✦ हिंदी अनुवाद ✦
हम देवकी-नन्दन का ध्यान करते हैं।
वासुदेव श्रीकृष्ण को धारण करते हैं।
वे कृष्ण हमारी बुद्धि को प्रेरित करें॥
जो परम ब्रह्म देवकी के गर्भ से प्रकट हुए, जो वसुदेव के पुत्र और सर्वव्यापी वासुदेव हैं — वे श्रीकृष्ण हमारी बुद्धि, मन और आत्मा को सत्य, प्रेम और धर्म के मार्ग पर प्रेरित और उद्दीप्त करें।
✦ गायत्री छन्द — २४ अक्षर ✦
॥ छन्द विवरण ॥
तीन पाद — प्रत्येक में ८ अक्षर
देवकीनन्दनाय विद्महे — प्रथम पाद (८)
वासुदेवाय धीमहि — द्वितीय पाद (८)
तन्नो कृष्णः प्रचोदयात् — तृतीय पाद (८)
गायत्री छन्द में तीन पाद होते हैं — प्रत्येक पाद में ८ अक्षर। कुल २४ अक्षर। "ॐ" को जोड़ने पर कुल पच्चीसवाँ अक्षर ब्रह्म-स्वरूप बनता है। यही गायत्री की अद्भुत संरचना है।
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॥ तीन शक्तियाँ ॥
विद्महे — धीमहि — प्रचोदयात्
विद्महे — ज्ञान-शक्ति (ऋग्वेद)
धीमहि — क्रिया-शक्ति (यजुर्वेद)
प्रचोदयात् — इच्छा-शक्ति (सामवेद)
गायत्री के तीन पदों में तीन वेदों की तीन शक्तियाँ समाहित हैं — ज्ञान, क्रिया और इच्छा। कृष्ण गायत्री में ये तीनों शक्तियाँ कृष्ण-चेतना को जागृत करती हैं।
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॥ देवकीनन्दन ॥
नाम की विशेषता
देवकीनन्दन = जन्म से कृष्ण
वासुदेव = सर्वव्यापी परमात्मा
कृष्ण = आकर्षण का केन्द्र
"देवकीनन्दन" शब्द कृष्ण के मानवीय जन्म को, "वासुदेव" उनके दिव्य स्वरूप को और "कृष्ण" उनके आकर्षण-स्वभाव को व्यक्त करता है। तीनों मिलकर पूर्ण परमात्मा का बोध कराते हैं।
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✦ अक्षर
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✦ दैनिक जप
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✦ माला जप
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✦ पाद
✦ मंत्र-फल — Mantra Phala ✦
कृष्ण गायत्री जो नित जपे।
बुद्धि-विवेक उसका नित बढ़े॥
कृष्ण-कृपा का अमृत मिले।
जीवन में दिव्य प्रकाश खिले॥
जो प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक कृष्ण गायत्री का जप करता है, उसकी बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है। भगवान कृष्ण की कृपा का अमृत प्राप्त होता है और जीवन में दिव्य प्रकाश का संचार होता है।

🌅 कृष्ण गायत्री — परिचय

कृष्ण गायत्री मंत्र गायत्री छन्द में निबद्ध भगवान श्रीकृष्ण का विशेष उपासना-मंत्र है। यह मंत्र तीन पदों और चौबीस अक्षरों में विभक्त है — जो ब्रह्माण्ड की तीन अवस्थाओं और चौबीस तत्त्वों का प्रतीक है।

ब्रह्म-मुहूर्त में सूर्योदय से पूर्व इस मंत्र का जप सर्वाधिक फलदायी माना गया है। जपकर्ता को बुद्धि की शुद्धि, मन की एकाग्रता और आत्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

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ब्रह्म-मुहूर्त — सर्वोत्तम कालसूर्योदय से डेढ़ घंटा पहले — जब वातावरण में सत्त्व-गुण की प्रधानता होती है — इस मंत्र का जप सर्वाधिक प्रभावशाली होता है।
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गायत्री छन्द — शक्ति-स्रोतगायत्री छन्द स्वयं में एक शक्ति है। इस छन्द में निबद्ध कोई भी मंत्र तीनों लोकों में व्याप्त होकर फल देता है।
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बुद्धि-प्रेरणा — प्रचोदयात्"प्रचोदयात्" का अर्थ है — प्रेरित करें। यह मंत्र केवल स्तुति नहीं, एक प्रार्थना है कि कृष्ण हमारी बुद्धि को सत्कर्म में लगाएँ।
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तुलसी माला — जप-साधनकृष्ण गायत्री का जप तुलसी माला पर करना सर्वोत्तम है। तुलसी विष्णु-प्रिय है और मंत्र की शक्ति को कई गुना बढ़ाती है।
KRISHNA GAYATRI MANTRA
गायत्री छन्द • २४ अक्षर