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✦ आदि शंकराचार्य विरचित ✦

Krishnashtakam

कृष्णाष्टकम्
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आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्रीकृष्ण के आठ दिव्य श्लोक — व्रज-मण्डन, पाप-खण्डन, भक्त-रञ्जन नन्दनन्दन की स्तुति। प्रत्येक श्लोक के अन्त में "भजे व्रजैकमण्डनम्" का मंगल-घोष।

आदि शंकराचार्य • ८ श्लोक • अनुष्टुप् छन्द
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
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✦ कृष्णाष्टकम् — सम्पूर्ण ८ श्लोक ✦
श्लोक १ • Shloka 1
व्रज-मण्डन — Vraja-Mandana
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भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
Bhaje Vrajaika-Maṇḍanaṃ Samasta-Pāpa-Khaṇḍanam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Nanda-Nandanam
मैं व्रज के एकमात्र भूषण, समस्त पापों के नाशक, अपने भक्तों के चित्त को आनन्दित करने वाले और सदा नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण का भजन करता हूँ।
श्लोक २ • Shloka 2
सुन्दर रूप — Beautiful Form
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सुचारुगण्डमण्डलं विलोलकुण्डलावलम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
Sucāru-Gaṇḍa-Maṇḍalaṃ Vilola-Kuṇḍalāvalam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Nanda-Nandanam
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्…
सुन्दर गोल कपोलों (गालों) वाले, हिलते हुए कुण्डलों की पंक्तियों से सुशोभित, अपने भक्तों के चित्त को आनन्दित करने वाले, सदा नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण का भजन करता हूँ।
श्लोक ३ • Shloka 3
वनमाली — Forest Garland Bearer
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विचित्रपीतवाससं वृतं सुहृत्समासकम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
Vicitra-Pīta-Vāsasaṃ Vṛtaṃ Suhṛt-Samāsakam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Nanda-Nandanam
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्…
विचित्र (अनूठे) पीत-वस्त्र (पीताम्बर) धारण करने वाले, सुहृदों (प्रियजनों) से सदा घिरे रहने वाले, अपने भक्तों के चित्त को आनन्दित करने वाले नन्दनन्दन का भजन करता हूँ।
श्लोक ४ • Shloka 4
मुरलीधर — Flute Bearer
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मनोहरात्मकन्दलं सुमन्दहासमण्डलम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
Manohara-Ātma-Kandalaṃ Sumanda-Hāsa-Maṇḍalam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Nanda-Nandanam
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्…
मन को हरने वाली दिव्य आभा से युक्त, अत्यन्त मन्द-मन्द मुस्कान के मण्डल (वृत्त) से सुशोभित, भक्त-चित्त-रञ्जन, सदा नन्दनन्दन का भजन करता हूँ।
श्लोक ५ • Shloka 5
कालिया-दमन — Serpent Subduer
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प्रभुत्वनिर्जितासकं नताङ्गलक्षणान्वितम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
Prabhutva-Nirjitāsakaṃ Natāṅga-Lakṣaṇānvitam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Nanda-Nandanam
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्…
अपने प्रभुत्व से समस्त आसक्तियों को जीतने वाले, नतमस्तक होने वाले सभी लक्षणों से युक्त, अपने भक्तों के चित्त को रंजित करने वाले नन्दनन्दन का भजन करता हूँ।
श्लोक ६ • Shloka 6
गोवर्धन-धारी — Hill Bearer
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सुभक्तिमुक्तिदायकं सुनेत्रभृङ्गसायकम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
Subhakti-Mukti-Dāyakaṃ Sunetra-Bhṛṅga-Sāyakam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Nanda-Nandanam
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्…
उत्तम भक्ति और मुक्ति के दाता, जिनकी सुन्दर आँखें भौंरे के समान (काली और मनोहर) हैं, ऐसे भक्त-चित्त-रञ्जक नन्दनन्दन का भजन करता हूँ।
श्लोक ७ • Shloka 7
रास-विलासी — Rasa Dancer
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रसालवेणुगानभृत्समस्तगोपमोहनम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
Rasāla-Veṇu-Gāna-Bhṛt Samasta-Gopa-Mohanam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Nanda-Nandanam
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्…
रसीली बाँसुरी का मधुर गान करने वाले, समस्त गोप-गोपियों को मोहित करने वाले, अपने भक्तों के चित्त को आनन्दित करने वाले नन्दनन्दन का भजन करता हूँ।
श्लोक ८ • Shloka 8
अष्टम श्लोक — Final Shloka
विलासलोलकुन्तलं विचित्रपुष्पमण्डितम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्॥
Vilāsa-Lola-Kuntaláṃ Vicitra-Puṣpa-Maṇḍitam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Nanda-Nandanam
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्…
विलासपूर्ण लहराते घुँघराले केशों से युक्त, विचित्र (रंग-बिरंगे) पुष्पों से अलंकृत, अपने भक्तों के चित्त को रंजित करने वाले, सदैव नन्दनन्दन का भजन करता हूँ।
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
इदं हि कृष्णाष्टकं पठेन्नरो जनार्दनम्।
लभेत भक्तिमव्ययां परां च मुक्तिमच्युताम्॥
जो मनुष्य इस कृष्णाष्टकम् का पाठ करता है — वह जनार्दन (श्रीकृष्ण) की अव्यय (अविनाशी) भक्ति और अच्युत मोक्ष की प्राप्ति करता है।

💫 कृष्णाष्टकम् — परिचय

कृष्णाष्टकम् आदि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित श्रीकृष्ण के आठ श्लोकों का स्तोत्र है। प्रत्येक श्लोक के अन्त में "स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्" की ध्रुव-पंक्ति दोहराई जाती है — जो इस स्तोत्र की विशेषता है।

यह अद्वैत-वेदान्त के प्रणेता शंकराचार्य की कृष्ण-भक्ति का प्रमाण है। ज्ञानी भी भक्ति को श्रेष्ठ मानते हैं — यही इस स्तोत्र का सार है।

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रचयिता — आदि शंकराचार्य८वीं शताब्दी के अद्वैत-वेदान्त के प्रणेता — जिन्होंने भारत के चारों कोनों में चार धाम स्थापित किए।
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ध्रुव-पंक्ति — Dhruva Padaप्रत्येक श्लोक में "नन्दनन्दनम्" की ध्रुव-पंक्ति — यह स्मृति और भक्ति-भाव को गहरा करती है।
अनुष्टुप् छन्दसंस्कृत का सर्वाधिक लोकप्रिय छन्द — ३२ अक्षर, चार पाद। रामायण और महाभारत भी इसी छन्द में हैं।
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ज्ञान और भक्ति का संगमशंकराचार्य ने ज्ञान-मार्ग के साथ-साथ भक्ति की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए यह स्तोत्र रचा।
KRISHNASHTAKAM
Adi Shankaracharya • 8 Shlokas