आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्रीकृष्ण के आठ दिव्य श्लोक — व्रज-मण्डन, पाप-खण्डन, भक्त-रञ्जन नन्दनन्दन की स्तुति। प्रत्येक श्लोक के अन्त में "भजे व्रजैकमण्डनम्" का मंगल-घोष।
कृष्णाष्टकम् आदि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित श्रीकृष्ण के आठ श्लोकों का स्तोत्र है। प्रत्येक श्लोक के अन्त में "स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्" की ध्रुव-पंक्ति दोहराई जाती है — जो इस स्तोत्र की विशेषता है।
यह अद्वैत-वेदान्त के प्रणेता शंकराचार्य की कृष्ण-भक्ति का प्रमाण है। ज्ञानी भी भक्ति को श्रेष्ठ मानते हैं — यही इस स्तोत्र का सार है।