✦ प्रतिनिधि श्लोक — १६.३ ✦
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
Abhayaṃ Sattva-Saṃśuddhir-Jñāna-Yoga-Vyavasthitiḥ | Dānaṃ Damaś-Ca Yajñaś-Ca Svādhyāyas-Tapa Ārjavam
निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रिय-संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये दैवी सम्पत् के लक्षण हैं।