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✦ श्रीकृष्ण - अर्जुन संवाद • कुरुक्षेत्र ✦

Shrimad Bhagavad Gita

श्रीमद् भगवद्गीता
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महाभारत के भीष्मपर्व में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया दिव्य ज्ञान — धर्म, कर्म, योग और मोक्ष का शाश्वत ग्रन्थ। प्रत्येक अध्याय का प्रतिनिधि श्लोक।

वेदव्यास रचित • महाभारत भीष्मपर्व • कुरुक्षेत्र
१८
✦ अध्याय
७००
✦ श्लोक
१८
✦ योग
✦ ज्ञान
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत📖 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन📖 नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः📖 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज📖 योगस्थः कुरु कर्माणि📖 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत📖 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन📖 नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः📖 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज📖 योगस्थः कुरु कर्माणि📖
अ. १अ. २ अ. ३अ. ४ अ. ५अ. ६ अ. ७अ. ८ अ. ९अ. १० अ. ११अ. १२ अ. १३अ. १४ अ. १५अ. १६ अ. १७अ. १८
✦ प्रथम अध्याय ✦
अर्जुनविषादयोगः
Arjuna Vishada Yoga
विषय: अर्जुन का विषाद — युद्ध का प्रारम्भ
४७ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १.२८ ✦
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥
Dṛṣṭvemaṃ Svajanaṃ Kṛṣṇa Yuyutsuṃ Samupasthitam | Sīdanti Mama Gātrāṇi Mukhaṃ Ca Pariśuṣyati
हे कृष्ण! युद्ध के लिए उद्यत इन स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है। — अर्जुन का यह विषाद ही ज्ञान-यात्रा का आरम्भ है।
अर्जुन-विषाद योग
✦ द्वितीय अध्याय ✦
सांख्ययोगः
Sankhya Yoga
विषय: आत्मज्ञान, नित्य-अनित्य विवेक, स्थितप्रज्ञ
७२ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — २.२० ✦
न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
Na Jāyate Mriyate Vā Kadācin Nāyaṃ Bhūtvā Bhaviṭā Vā Na Bhūyaḥ | Ajo Nityaḥ Śāśvato'yaṃ Purāṇo Na Hanyate Hanyamāne Śarīre
यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है। यह पहले था, अभी है और आगे भी रहेगा। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है — शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मरती।
सांख्य योग
✦ तृतीय अध्याय ✦
कर्मयोगः
Karma Yoga
विषय: निष्काम कर्म, यज्ञ, लोकसंग्रह
४३ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — ३.१९ ✦
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥
Tasmād-Asaktaḥ Satataṃ Kāryaṃ Karma Samācara | Asakto Hy-Ācaran-Karma Param-Āpnoti Pūruṣaḥ
इसलिए आसक्ति छोड़कर सदा कर्तव्य-कर्म करते रहो। क्योंकि आसक्ति-रहित होकर कर्म करने वाला मनुष्य परमात्मा को प्राप्त करता है।
कर्म योग
✦ चतुर्थ अध्याय ✦
ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः
Jnana Karma Sannyasa Yoga
विषय: अवतार-रहस्य, ज्ञान-यज्ञ, कर्म का स्वरूप
४२ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — ४.७-८ ✦
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
Yadā Yadā Hi Dharmasya Glānir-Bhavati Bhārata | Abhyutthānam-Adharmasya Tadātmānaṃ Sṛjāmy-Aham | Paritrāṇāya Sādhūnāṃ Vināśāya Ca Duṣkṛtām | Dharma-Saṃsthāpanārthāya Sambhavāmi Yuge Yuge
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ। साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतरित होता हूँ।
ज्ञान-कर्म-संन्यास योग
✦ पञ्चम अध्याय ✦
कर्मसंन्यासयोगः
Karma Sannyasa Yoga
विषय: संन्यास और कर्मयोग का तुलनात्मक विवेचन
२९ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — ५.१० ✦
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
Brahmaṇy-Ādhāya Karmāṇi Saṅgaṃ Tyaktvā Karoti Yaḥ | Lipyate Na Sa Pāpena Padma-Patram-Ivāmbhasā
जो कर्म ब्रह्म में अर्पण करके, आसक्ति त्यागकर करता है — वह पाप से उसी तरह नहीं लिपता जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं भीगता।
कर्म-संन्यास योग
✦ षष्ठ अध्याय ✦
आत्मसंयमयोगः
Atma Sanyam Yoga
विषय: ध्यान-योग, मन का नियंत्रण, योगी का स्वरूप
४७ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — ६.५ ✦
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
Uddhared-Ātmanātmānaṃ Nātmānam-Avasādayet | Ātmaiva Hy-Ātmano Bandhur-Ātmaiva Ripur-Ātmanaḥ
मनुष्य को अपने आप से अपना उद्धार करना चाहिए, अपना पतन नहीं करना चाहिए। क्योंकि आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु है।
आत्म-संयम योग
✦ सप्तम अध्याय ✦
ज्ञानविज्ञानयोगः
Jnana Vijnana Yoga
विषय: परा-अपरा प्रकृति, माया, भक्त के प्रकार
३० श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — ७.१९ ✦
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
Bahūnāṃ Janmanām-Ante Jñānavān-Māṃ Prapadyate | Vāsudevaḥ Sarvam-Iti Sa Mahātmā Sudurlabhaḥ
अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान पुरुष मुझे प्राप्त होता है — "वासुदेव ही सब कुछ है" ऐसा जानकर। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
ज्ञान-विज्ञान योग
✦ अष्टम अध्याय ✦
अक्षरब्रह्मयोगः
Akshar Brahma Yoga
विषय: ब्रह्म, अक्षर, मृत्यु-काल, देव-पितृ मार्ग
२८ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — ८.५ ✦
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
Anta-Kāle Ca Māmeva Smaran-Muktvā Kalevaram | Yaḥ Prayāti Sa Mad-Bhāvaṃ Yāti Nāsty-Atra Saṃśayaḥ
जो अंतकाल में केवल मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है — वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। इसमें कोई संदेह नहीं।
अक्षर-ब्रह्म योग
✦ नवम अध्याय ✦
राजविद्याराजगुह्ययोगः
Raja Vidya Raja Guhya Yoga
विषय: राजविद्या, भक्ति का महत्व, समभाव
३४ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — ९.२७ ✦
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
Yat-Karoṣi Yad-Aśnāsi Yaj-Juhoṣi Dadāsi Yat | Yat-Tapasyasi Kaunteya Tat-Kuruṣva Mad-Arpaṇam
हे कौन्तेय! तू जो भी करे, जो खाए, जो यज्ञ में अर्पण करे, जो दान दे और जो तप करे — वह सब मुझे अर्पण कर दे।
राजविद्या-राजगुह्य योग
१०
✦ दशम अध्याय ✦
विभूतियोगः
Vibhuti Yoga
विषय: ईश्वर की विभूतियाँ, दिव्य महिमा
४२ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १०.२० ✦
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥
Aham-Ātmā Guḍākeśa Sarva-Bhūtāśaya-Sthitaḥ | Aham-Ādiś-Ca Madhyaṃ Ca Bhūtānām-Anta Eva Ca
हे गुडाकेश (अर्जुन)! मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही समस्त प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ।
विभूति योग
११
✦ एकादश अध्याय ✦
विश्वरूपदर्शनयोगः
Vishwaroopa Darshan Yoga
विषय: विश्वरूप-दर्शन, दिव्यचक्षु, अर्जुन का विस्मय
५५ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — ११.३२ ✦
श्रीभगवानुवाच —
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
Śrī-Bhagavān-Uvāca — Kālo'smi Loka-Kṣaya-Kṛt-Pravṛddho Lokān-Samāhartum-Iha Pravṛttaḥ
श्रीभगवान बोले — मैं काल हूँ, लोकों का नाश करने वाला, विकराल रूप। यहाँ सब लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हूँ। तुम्हारे बिना भी, प्रतिपक्ष में खड़े ये सभी योद्धा नहीं रहेंगे।
विश्वरूप-दर्शन योग
१२
✦ द्वादश अध्याय ✦
भक्तियोगः
Bhakti Yoga
विषय: सगुण-निर्गुण भक्ति, भक्त के लक्षण
२० श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १२.१३-१४ ✦
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
Adveṣṭā Sarva-Bhūtānāṃ Maitraḥ Karuṇa Eva Ca | Nirmarmo Nirahaṅkāraḥ Sama-Duḥkha-Sukhaḥ Kṣamī
जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, मैत्री और करुणा से युक्त है, ममता-अहंकार से रहित है, सुख-दुख में सम और क्षमाशील है — ऐसा सदा संतुष्ट, आत्मसंयमी, दृढ़निश्चयी मुझमें मन-बुद्धि अर्पित करने वाला भक्त मुझे प्रिय है।
भक्ति योग
१३
✦ त्रयोदश अध्याय ✦
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः
Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
विषय: क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का ज्ञान
३५ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १३.२७ ✦
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥
Samaṃ Sarveṣu Bhūteṣu Tiṣṭhantaṃ Parameśvaram | Vinaśyatsv-Avinaśyantaṃ Yaḥ Paśyati Sa Paśyati
जो विनाशी जीवों में समभाव से स्थित अविनाशी परमेश्वर को देखता है — वही सच में देखता है। वही वास्तविक दृष्टा है।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
१४
✦ चतुर्दश अध्याय ✦
गुणत्रयविभागयोगः
Gunatraya Vibhaga Yoga
विषय: सत्व, रज, तम — तीन गुण और उनसे मुक्ति
२७ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १४.१९ ✦
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥
Nānyaṃ Guṇebhyaḥ Kartāraṃ Yadā Draṣṭānupaśyati | Guṇebhyaś-Ca Paraṃ Vetti Mad-Bhāvaṃ So'dhigacchati
जब द्रष्टा (साधक) गुणों से अतिरिक्त कोई अन्य कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे (परमात्मा को) जानता है — वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
गुण-त्रय विभाग योग
१५
✦ पञ्चदश अध्याय ✦
पुरुषोत्तमयोगः
Purushottama Yoga
विषय: अश्वत्थ वृक्ष, क्षर-अक्षर-पुरुषोत्तम
२० श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १५.१५ ✦
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
Sarvasya Cāhaṃ Hṛdi Sanniviṣṭo Mattaḥ Smṛtir-Jñānam-Apohanañ-Ca | Vedaiś-Ca Sarvair-Ahameva Vedyo Vedānta-Kṛd-Vedavid-Eva Cāham
मैं सबके हृदय में प्रविष्ट हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका नाश होता है। मैं ही सभी वेदों से जानने योग्य हूँ, वेदांत का रचयिता और वेदों का जाननेवाला भी मैं ही हूँ।
पुरुषोत्तम योग
१६
✦ षोडश अध्याय ✦
दैवासुरसम्पद्विभागयोगः
Daivasura Sampadvibhaga Yoga
विषय: दैवी और आसुरी सम्पत् — दो प्रकार की स्वभाव
२४ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १६.३ ✦
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
Abhayaṃ Sattva-Saṃśuddhir-Jñāna-Yoga-Vyavasthitiḥ | Dānaṃ Damaś-Ca Yajñaś-Ca Svādhyāyas-Tapa Ārjavam
निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रिय-संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये दैवी सम्पत् के लक्षण हैं।
दैवासुर-सम्पद् विभाग योग
१७
✦ सप्तदश अध्याय ✦
श्रद्धात्रयविभागयोगः
Shraddhatraya Vibhaga Yoga
विषय: तीन प्रकार की श्रद्धा, आहार, यज्ञ, दान, तप
२८ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १७.३ ✦
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥
Sattvānurūpā Sarvasya Śraddhā Bhavati Bhārata | Śraddhā-Mayo'yaṃ Puruṣo Yo Yac-Chraddhaḥ Sa Eva Saḥ
हे भारत! सभी की श्रद्धा उनके स्वभाव (सत्व) के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है — जो जैसी श्रद्धा रखता है, वह वैसा ही है।
श्रद्धात्रय विभाग योग
१८
✦ अष्टादश अध्याय ✦
मोक्षसंन्यासयोगः
Moksha Sannyasa Yoga
विषय: त्याग, गीता का सार, शरणागति और मोक्ष
७८ श्लोक
✦ प्रतिनिधि श्लोक — १८.६६ ✦
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
Sarva-Dharmān-Parityajya Māmekam̐ Śaraṇaṃ Vraja | Ahaṃ Tvā Sarva-Pāpebhyo Mokṣayiṣyāmi Mā Śucaḥ
सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत कर। — यह गीता का चरम उपदेश और श्रीकृष्ण का परम वचन है।
मोक्ष-संन्यास योग — गीता-सार
BHAGAVAD GITA
श्रीमद् भगवद्गीता