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✦ आजु नाथ एक व्रत — सम्पूर्ण गीत Maithili ✦
✦ टेक — Refrain ✦
आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागत हे
तोहें सिव धरु नट वेष कि डमरू बजाबहे
॥ अंतरा १ ॥
गौरी की शंका — चारि सोच
तोहें गोरी कहे छनाछब हम कोना नाचब हे।
चारि सोच मोहि होय कौन विधि बांचव हे।
अमि अचुमिय भूमि खसत बघम्बर जानत हे।
होत बघम्बर बाघ बसहा धरि खायत हे।
आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागत हे
तोहें सिव धरु नट वेष कि डमरू बजाबहे
हे गौरी! (शिवजी कहते हैं) — मैं कैसे नाचूँगा? मुझे चार चिंताएँ हैं, किस प्रकार बचूँगा। यदि मैं नाचते हुए थोड़ा भी झुका, तो बाघम्बर (बाघ की खाल) गिर जाएगी, और वह बाघम्बर, बाघ बनकर बैल (नंदी) को खा जाएगा।
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॥ अंतरा २ ॥
साँप, गंगा और कार्तिक की चिंता
सिरसँ ससरत साँप भूमि लोटायत हे।
कार्तिक पोसल मजूर सेहो धरि खायत हे।
जटा सं छिलकत गंग भूमि पर पाटत हे।
होय तो सहस्त्र मुखी धार समेटलो ने जायत हे।
आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागत हे
तोहें सिव धरु नट वेष कि डमरू बजाबहे
यदि मैं नाचा तो सिर से सर्प फिसलकर भूमि पर लोट जाएगा, और वह कार्तिकेय के पाले हुए मोर को खा लेगा। जटाओं से गंगा छलककर भूमि पर फैल जाएगी, और उसकी सहस्र धाराएँ समेटी नहीं जा सकेंगी।
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॥ अंतरा ३ ॥
मुंडमाल और विद्यापति की भनिता
मुंडमाल टूटी खसत मसानी जानत हे।
तोहें गौरी जैबा पराय नाचके देखत हे।
भनहि विद्यापति गाओल गावि सुनाओल हे।
राखल गौरी के मान चारू उपजाओल हे।
आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागत हे
तोहें सिव धरु नट वेष कि डमरू बजाबहे
मुंडमाल टूटकर गिरेगी तो मुर्दे जागेंगे (श्मशान जाग जाएगा)। और हे गौरी! तुम ही किसी और को नाचते देखने चली जाओगी! विद्यापति कहते हैं — यह गीत गाकर सुनाया। (शिवजी ने) गौरी का मान रखा और चारों संकटों का समाधान निकाला।
✦ गीत का भाव — The Essence ✦
शिव-गौरी के इस मधुर संवाद में
प्रेम, हास्य और भक्ति का अद्भुत सम्मिश्रण है।
विद्यापति की लेखनी से निकला यह गीत
मिथिला की माटी की सुगन्ध समेटे है।
इस गीत में गौरी माँ शिवजी से प्रेमपूर्वक नट वेष धारण कर नृत्य करने का आग्रह करती हैं। शिवजी हास्य-विनोद में अनेक बाधाएँ गिनाते हैं — बाघम्बर, साँप, गंगा, मुंडमाल — परन्तु अंत में गौरी का मान रखते हैं। यह रचना शिव-शक्ति के प्रेम और परस्पर सम्मान का अनुपम चित्र है।
🔱 गीत परिचय — About This Song
यह रचना महाकवि विद्यापति ठाकुर (लगभग १३५०–१४४८ ई.) द्वारा रचित है, जो मिथिला के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनकी मैथिली पदावली शिव, शक्ति और राधा-कृष्ण की भक्ति से ओतप्रोत है।
इस गीत की भाषा मैथिली है — बिहार और नेपाल के मिथिला क्षेत्र की प्राचीन साहित्यिक भाषा। "हे, हेमा, जानत, बजाबहे" जैसे प्रत्यय इसे विशेष मैथिल रंग देते हैं।
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नट वेष और डमरूशिवजी का नटराज रूप — जहाँ वे तांडव नृत्य करते हैं और हाथ में डमरू होती है — इसी की गौरी माँ कल्पना कर रही हैं।
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शिव के पाँच संकटबाघम्बर, सर्प, गंगा, मुंडमाल — शिवजी के समस्त प्रतीक इस गीत में जीवंत हो उठते हैं।
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मैथिली साहित्य का रत्नविद्यापति की पदावली को बंगाल के वैष्णव और मिथिला के शैव — दोनों परम्पराओं में श्रद्धा से गाया जाता है।
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भनिता परम्पराअंतिम पद में "भनहि विद्यापति" — कवि की भनिता (हस्ताक्षर) मैथिल काव्य की पहचान है।