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✦ दुर्गा सप्तशती अन्तर्गत ✦

Argala Stotram

अर्गला स्तोत्रम्
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देवी के अठारह भावों की स्तुति — जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी सहित समस्त शक्ति-रूपों को नमन। दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व किया जाने वाला यह स्तोत्र सभी बाधाओं को दूर करता है।

दुर्गा सप्तशती • मार्कण्डेय पुराण • २७ श्लोक
जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी
जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी🌺 दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते🌺 रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि🌺 धनं देहि प्रजां देहि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते🌺 जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी🌺 दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते🌺 रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि🌺 धनं देहि प्रजां देहि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते🌺
✦ अर्गला स्तोत्रम् — सम्पूर्ण २७ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
मंगलाचरण — देवी के नामों की स्तुति
जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
Jayantī Maṅgalā Kālī Bhadrakālī Kapālinī | Durgā Kṣamā Śivā Dhātrī Svāhā Svadhā Namo'stu Te
जयन्ती मंगला काली... नमोऽस्तु ते
हे जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा — आपको नमस्कार है।
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॥ श्लोक २ ॥
देवी से रूप और विजय की प्रार्थना
मधुकैटभविध्वंसि विधाता्रिवरदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Madhu-Kaiṭabha-Vidhvaṃsi Vidhātri-Varade Namaḥ | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे मधु और कैटभ का नाश करने वाली, वरदायिनी देवी — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक ३ ॥
महिषासुर-वध की देवी से प्रार्थना
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Mahiṣāsura-Nirnāśi Bhaktānāṃ Sukhade Namaḥ | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे महिषासुर का नाश करने वाली, भक्तों को सुख देने वाली देवी — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक ४ ॥
रक्तबीज नाश करने वाली देवी
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Dhūmra-Netra-Vadhe Devi Dharma-Kāmārtha-Dāyini | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे धूम्रनेत्र का वध करने वाली, धर्म, काम और अर्थ देने वाली देवी — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक ५ ॥
शुम्भ-निशुम्भ वध की देवी
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Śumbhasya-Eva Niśumbhasya Dhūmrākṣasya ca Mardini | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे शुम्भ, निशुम्भ और धूम्राक्ष का मर्दन करने वाली देवी — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक ६ ॥
विद्या और धन की प्रदात्री
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Raktabīja-Vadhe Devi Caṇḍa-Muṇḍa-Vināśini | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे रक्तबीज का वध करने वाली, चण्ड-मुण्ड का नाश करने वाली देवी — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक ७ ॥
देवताओं की रक्षक देवी
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
Sarva-Svarūpe Sarveśe Sarva-Śakti-Samanvite | Bhayebhyas-Trāhi No Devi Durge Devi Namo'stu Te
दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते
हे सर्व-स्वरूपा, सर्वेश्वरी, समस्त शक्तियों से समन्वित देवी — भयों से हमारी रक्षा करो। हे दुर्गा देवी, आपको नमस्कार।
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॥ श्लोक ८ ॥
शत्रु-नाश और यश की कामना
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु नः सर्वभूतेभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
Etat-Te Vadanaṃ Saumyaṃ Locana-Traya-Bhūṣitam | Pātu Naḥ Sarva-Bhūtebhyaḥ Kātyāyani Namo'stu Te
कात्यायनि नमोऽस्तु ते
आपका यह सौम्य मुख तीन नेत्रों से सुशोभित है — यह सभी प्राणियों से हमारी रक्षा करे। हे कात्यायनी, आपको नमस्कार।
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॥ श्लोक ९ ॥
ज्वाला स्वरूपा देवी की स्तुति
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥
Jvāla-Karāla-Matyugram-Aśeṣāsura-Sūdanam | Triśūlaṃ Pātu No Bhīter-Bhadrakāli Namo'stu Te
भद्रकालि नमोऽस्तु ते
आपका ज्वाला से भयंकर, अत्यन्त उग्र त्रिशूल जो समस्त असुरों का नाश करता है — वह हमें भय से बचाए। हे भद्रकाली, नमस्कार।
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॥ श्लोक १० ॥
देवी के खड्ग की स्तुति
हिनस्तु दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव॥
Hinasto Daitya-Tejāṃsi Svanena-Āpūrya Yā Jagat | Sā Ghaṇṭā Pātu No Devi Pāpebhyo Naḥ Sutāniva
सा घण्टा पातु नो देवि
जो अपनी ध्वनि से जगत को भरकर दैत्यों का तेज नष्ट करती है — वह देवी की घण्टा हमें पापों से उसी तरह बचाए जैसे माँ अपने पुत्रों को।
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॥ श्लोक ११ ॥
असुरों के रक्त से रंजित देवी
असुरासृग्वसापंकचर्चितस्ते करोज्ज्वलः।
शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम्॥
Asurāsṛg-Vasā-Paṅka-Carcitas-Te Karo-Jjvalaḥ | Śubhāya Khaḍgo Bhavatu Caṇḍike Tvāṃ Natā Vayam
चण्डिके त्वां नता वयम्
असुरों के रक्त और मेद से सने हुए, आपके हाथ में चमकती हुई तलवार — हमारे लिए शुभ हो। हे चण्डिके, हम आपको नमस्कार करते हैं।
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॥ श्लोक १२ ॥
रोगनाश और सुख की प्रार्थना
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥
Rogān-Aśeṣān-Apahaṃsi Tuṣṭā Ruṣṭā Tu Kāmān Sakalān-Abhīṣṭān | Tvām-Āśritānāṃ Na Vipannārāṇāṃ Tvām-Āśritā Hyāśrayatāṃ Prayānti
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति
प्रसन्न होने पर आप समस्त रोग हर लेती हैं, रुष्ट होने पर सभी मनोकामनाएँ नष्ट करती हैं। आपका आश्रय लेने वाले कभी आपदाग्रस्त नहीं होते — वे स्वयं दूसरों का आश्रय बन जाते हैं।
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॥ श्लोक १३ ॥
धन और प्रजा की कामना
धनं देहि प्रजां देहि विद्यां देहि च देवि मे।
अन्नं देहि धनं देहि जयं देहि महाशक्ते॥
Dhanaṃ Dehi Prajāṃ Dehi Vidyāṃ Dehi ca Devi Me | Annaṃ Dehi Dhanaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Mahāśakte
धनं देहि जयं देहि महाशक्ते
हे देवी, मुझे धन दो, संतान दो, विद्या दो। हे महाशक्ते — अन्न दो, धन दो और विजय दो।
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॥ श्लोक १४ ॥
त्वष्टा-रूपा देवी की स्तुति
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Dehi Saubhāgyam-Ārogyaṃ Dehi Me Paramaṃ Sukham | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे देवी, मुझे सौभाग्य दो, आरोग्य दो, परम सुख दो। मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक १५ ॥
पुत्र और भार्या की कामना
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Vidhehi Devi Kalyāṇaṃ Vidhehi Vipulāṃ Śriyam | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे देवी, कल्याण करो, विपुल लक्ष्मी प्रदान करो। मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक १६ ॥
विद्या और सुमति की प्रार्थना
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Vidhehi Dviṣatāṃ Nāśaṃ Vidhehi Balam-Uccakaiḥ | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे देवी, शत्रुओं का नाश करो और मुझे उच्च बल प्रदान करो। मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक १७ ॥
देवी का ध्यान और स्तुति
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Surāsura-Śiro-Ratna-Nigṛṣṭa-Caraṇe Ambike | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे अम्बिके, आपके चरणों में देवताओं और असुरों के मुकुट के रत्न रगड़ते हैं। मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक १८ ॥
विजया और मंगला रूप की स्तुति
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Vidyāvantaṃ Yaśasvantaṃ Lakṣmīvantaṃ Janaṃ Kuru | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे देवी, मनुष्यों को विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बनाओ। मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक १९ ॥
देवी को स्तुति निवेदन
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Pracaṇḍa-Daitya-Darpa-Ghne Caṇḍike Praṇatāya Me | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे प्रचण्ड दैत्यों के दर्प का नाश करने वाली चण्डिके — मुझ प्रणत भक्त को रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक २० ॥
चतुर्भुजा देवी की स्तुति
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Caturbhuje Caturvaktra-Saṃstute Parameśvari | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे चार भुजाओं वाली, चार मुखों से स्तुति की जाने वाली परमेश्वरी — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक २१ ॥
कृष्णाभिन्न देवी की स्तुति
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Kṛṣṇena Saṃstute Devi Śaśvad-Bhaktyā Sadāmbike | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे देवी, जिनकी स्तुति कृष्ण ने सदा भक्ति से की — ऐसी हे अम्बिके, मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक २२ ॥
हिमाचल-सुता पार्वती रूप
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Himācala-Sutā-Nātha-Saṃstute Parameśvari | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे हिमाचल-सुता (पार्वती) के नाथ (शिव) द्वारा स्तुत परमेश्वरी — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक २३ ॥
इन्द्र-स्तुता देवी का स्मरण
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Indrāṇī-Pati-Sadbhāva-Pūjite Parameśvari | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे इन्द्राणी के पति (इन्द्र) द्वारा सद्भाव से पूजित परमेश्वरी — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक २४ ॥
देवी दुर्गा की विशेष स्तुति
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
Devi Bhakta-Janod-Dāma-Dattānandodaye Ambike | Rūpaṃ Dehi Jayaṃ Dehi Yaśo Dehi Dviṣo Jahi
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे देवी, भक्त-जनों को अपार आनन्द देने वाली अम्बिके — मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
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॥ श्लोक २५ ॥
पत्नी और पुत्र की कामना
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
Patnīṃ Manoramāṃ Dehi Mano-Vṛttānusāriṇīm | Tāriṇīṃ Durga-Saṃsāra-Sāgarasya Kulod-Bhavām
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
हे देवी, मुझे मनोरम पत्नी दो जो मन के अनुकूल हो, जो इस दुर्गम संसार-सागर से पार उतारने वाली और कुलीन हो।
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॥ श्लोक २६ ॥
स्तोत्र पाठ का महत्व
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदम्॥
Idaṃ Stotraṃ Paṭhitvā Tu Mahā-Stotraṃ Paṭhen-Naraḥ | Sa Tu Saptaśatī-Saṃkhyā-Varam-Āpnoti Sampadam
सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदम्
जो व्यक्ति इस स्तोत्र को पढ़कर महान सप्तशती का पाठ करता है, वह सप्तशती के पाठ के समान उत्तम सम्पदा प्राप्त करता है।
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॥ श्लोक २७ ॥
समाप्ति श्लोक
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या
निःशेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
Devyā Yayā Tatam-Idaṃ Jagad-Ātma-Śaktyā Niḥśeṣa-Deva-Gaṇa-Śakti-Samūha-Mūrtyā | Tām-Ambikām-Akhila-Deva-Maharṣi-Pūjyāṃ Bhaktyā Natāḥ Sma Vidadhātu Śubhāni Sā Naḥ
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः
जिस देवी ने अपनी आत्मशक्ति से इस जगत को व्याप्त किया है, जो सभी देवताओं की शक्तियों का समूह-रूप हैं, जो सभी देवों और ऋषियों द्वारा पूजित हैं — उस अम्बिका को भक्ति से नमस्कार करते हुए हम प्रार्थना करते हैं कि वे हमारा कल्याण करें।
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
अर्गलां यः पठेद्भक्त्या सप्तशत्याः पुरा नरः।
तस्य सिद्ध्यन्ति कार्याणि स्तुतो देव्या शुभं लभेत्॥
Argalāṃ Yaḥ Paṭhed-Bhaktyā Saptaśatyāḥ Purā Naraḥ | Tasya Siddhyanti Kāryāṇi Stuto Devyā Śubhaṃ Labhet
जो व्यक्ति सप्तशती के पाठ से पूर्व भक्तिपूर्वक इस अर्गला स्तोत्र का पाठ करता है — उसके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं और देवी की स्तुति से वह शुभ को प्राप्त करता है।

🌠 अर्गला स्तोत्रम् — परिचय और महत्व

अर्गला स्तोत्रम् दुर्गा सप्तशती का एक प्रमुख अंग है। इसे सप्तशती के पाठ से पूर्व, कीलक स्तोत्र के बाद पढ़ा जाता है। "अर्गल" का अर्थ है "अवरोध हटाने वाला कील" — यह स्तोत्र पाठ के मार्ग की समस्त बाधाओं को दूर करता है।

इस स्तोत्र में देवी के ११ नामों की स्तुति के साथ "रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि" की ध्रुवपंक्ति बार-बार आती है, जो भक्त की समस्त कामनाओं की पूर्ति का आह्वान करती है। नवरात्रि में इसका पाठ विशेष फलदायी माना गया है।

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सप्तशती का द्वारअर्गला स्तोत्र सप्तशती पाठ का प्रवेश द्वार है — इसके बिना सप्तशती अधूरी मानी जाती है।
बाधा-निवारणयह स्तोत्र पाठक के जीवन की समस्त बाधाओं, शत्रुओं और कठिनाइयों को दूर करता है।
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चतुर्वर्ग प्राप्तिनियमित पाठ से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
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नवरात्रि विशेषशारदीय और चैत्र नवरात्रि में प्रतिदिन अर्गला स्तोत्र का पाठ अत्यंत शुभफलदायी है।
ARGALA STOTRAM
27 Shlokas • Durga Saptashati