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✦ दुर्गा सप्तशती अन्तर्गत ✦

Devi Kavacham

देवी कवचम्
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माँ दुर्गे का सर्वांग रक्षा-कवच — दसों दिशाओं में देवियों का आह्वान करके शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा। दुर्गा सप्तशती के प्रथम चरित्र का दिव्य कवच।

दुर्गा सप्तशती • मार्कण्डेय पुराण • सर्वांग रक्षा
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री
आग्नेय्यामग्निदेवता
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री🛡️ आग्नेय्यामग्निदेवता🛡️ दक्षिणेऽवतु वाराही🛡️ नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी🛡️ सर्वांग रक्षा-कवच🛡️ जय माँ दुर्गे🛡️ प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री🛡️ आग्नेय्यामग्निदेवता🛡️ दक्षिणेऽवतु वाराही🛡️ नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी🛡️ सर्वांग रक्षा-कवच🛡️ जय माँ दुर्गे🛡️
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✦ देवी कवचम् — सम्पूर्ण पाठ ✦
✦ विनियोग ✦
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः।
अनुष्टुप् छन्दः। चामुण्डा देवता।
अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्।
दिग्बन्धदेवताः शक्तिः।
इस श्री चण्डी कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता चामुण्डा हैं। अंगन्यास में उक्त मातृकाएँ बीज हैं और दिग्बन्ध देवताएँ शक्ति हैं।
॥ श्लोक १ ॥
ब्रह्मा-विष्णु-शिव का आह्वान
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच।
ओं यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥
सर्वरक्षाकरं परं
मार्कण्डेय ने कहा — हे पितामह! जो परम गुह्य, मनुष्यों की सर्वरक्षा करने वाला और जो किसी को नहीं बताया गया — वह मुझे बताइए।
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॥ श्लोक २ ॥
ब्रह्मा का उत्तर
ब्रह्मोवाच।
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥
देव्यास्तु कवचं पुण्यं
ब्रह्मा बोले — हे विप्र, महामुने! एक परम गुह्य और सभी प्राणियों का उपकार करने वाला देवी का पवित्र कवच है — उसे सुनो।
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॥ श्लोक ३ ॥
पूर्व दिशा की रक्षा
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता।
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी॥
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री
पूर्व दिशा में ऐन्द्री, आग्नेय कोण में अग्नि-देवता, दक्षिण में वाराही और नैर्ऋत्य कोण में खड्गधारिणी देवी मेरी रक्षा करें।
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॥ श्लोक ४ ॥
पश्चिम व उत्तर दिशा की रक्षा
प्रतीच्यां रक्षतु श्रीमद्वारुणी वायुदेवता।
कौबेरी चोत्तरे रक्षेदैशान्यां शूलधारिणी॥
कौबेरी चोत्तरे रक्षेत्
पश्चिम में वारुणी और वायु-देवता, उत्तर में कौबेरी और ईशान कोण में शूलधारिणी देवी मेरी रक्षा करें।
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पूर्व
ऐन्द्री
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आग्नेय
अग्नि देवता
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दक्षिण
वाराही
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नैर्ऋत्य
खड्गधारिणी
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पश्चिम
वारुणी
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वायव्य
वायु देवता
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उत्तर
कौबेरी
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ईशान
शूलधारिणी
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॥ श्लोक ५ ॥
ऊर्ध्व और अधो दिशा की रक्षा
ऊर्ध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा।
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शवहारिणी॥
चामुण्डा शवहारिणी
ऊपर से ब्राह्मणी और नीचे से वैष्णवी मेरी रक्षा करें। इस प्रकार दसों दिशाओं में शव-वाहिनी चामुण्डा रक्षा करें।
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॥ श्लोक ६ ॥
शिर एवं ललाट की रक्षा
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः।
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता॥
जया विजया अजिता अपराजिता
आगे से जया, पीछे से विजया, बायीं ओर से अजिता और दाहिनी ओर से अपराजिता मेरी रक्षा करें।
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॥ श्लोक ७ ॥
शिरोभाग की रक्षा
शिखां मे द्योतिनी रक्षेन्मस्तकं मे सुरेश्वरी।
फालं रक्षतु कल्याणी नेत्रे रक्षतु चण्डिका॥
नेत्रे रक्षतु चण्डिका
शिखा की द्योतिनी, मस्तक की सुरेश्वरी, ललाट की कल्याणी और नेत्रों की चण्डिका रक्षा करें।
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॥ श्लोक ८ ॥
कर्ण, नासिका और दन्त रक्षा
कर्णौ रक्षेत्कुमारी च नासिकां चण्डिकेश्वरी।
कपोलौ तारिणी रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी॥
कपोलौ तारिणी रक्षेत्
कानों की कुमारी, नासिका की चण्डिकेश्वरी, कपोलों (गालों) की तारिणी और कानों की जड़ में शङ्करी रक्षा करें।
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॥ श्लोक ९ ॥
मुख, ओष्ठ और दन्त रक्षा
नखान् श्रीर्मे समस्तांश्च कण्ठं मे रक्षतु भैरवी।
दन्तान् रक्षतु कौमारी जिह्वां मे सरस्वती॥
जिह्वां मे सरस्वती
समस्त नखों की श्री (लक्ष्मी), कण्ठ की भैरवी, दाँतों की कौमारी और जीभ की सरस्वती रक्षा करें।
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॥ श्लोक १० ॥
स्कन्ध, भुज और हस्त रक्षा
स्कन्धौ महादेवी रक्षेद्बाहू मे वज्रधारिणी।
हस्तौ मे पद्महस्तातु करौ मे वरदायिनी॥
बाहू मे वज्रधारिणी
कंधों की महादेवी, भुजाओं की वज्रधारिणी, हाथों की पद्महस्ता (लक्ष्मी) और दोनों करों की वरदायिनी रक्षा करें।
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॥ श्लोक ११ ॥
वक्ष, हृदय और उदर रक्षा
वक्षः श्रीधारिणी रक्षेद्धृदयं ललिताम्बिका।
उदरे शूलधारिणी पार्श्वे पातु वनदेवता॥
हृदयं ललिताम्बिका
वक्ष की श्रीधारिणी, हृदय की ललिताम्बिका, उदर की शूलधारिणी और पार्श्व (बगल) की वनदेवता रक्षा करें।
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॥ श्लोक १२ ॥
कटि, नाभि और जंघा रक्षा
कट्यां भगवती रक्षेजjanū me vindhyavāsinī।
जङ्घे महाबला रक्षेत्पादौ भूमिसुता तथा॥
पादौ भूमिसुता तथा
कमर की भगवती, घुटनों की विन्ध्यवासिनी, जंघाओं की महाबला और पैरों की भूमिसुता रक्षा करें।
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॥ श्लोक १३ ॥
समस्त अंगों की रक्षा
सर्वाङ्गेषु सदा रक्षेद्देवी सर्वेश्वरी सदा।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु॥
देवी सर्वेश्वरी सदा
देवी सर्वेश्वरी सदा समस्त अंगों की रक्षा करें। जो स्थान इस कवच से वर्जित (रक्षारहित) रह जाए — उसे भी देवी आच्छादित करें।
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॥ श्लोक १४ ॥
समस्त अवस्थाओं में रक्षा
तत्र तत्र स्थिता देवी तत्र तत्र प्रपूजयेत्।
जाग्रतः स्वपतश्चैव मार्गे वा विकटे स्थले॥
जाग्रतः स्वपतश्चैव
जहाँ जहाँ देवी स्थित हैं, वहाँ वहाँ उनकी पूजा करें। जागते समय, सोते समय और कठिन मार्ग पर — सर्वत्र रक्षा होती है।
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॥ श्लोक १५ ॥
समस्त भयों से मुक्ति
देव्यास्तु कवचं पुण्यं पठेद्यस्तु विचक्षणः।
न तस्य जायते क्वापि भयं देवि सुरेश्वरि॥
न तस्य जायते क्वापि भयम्
हे देवि! हे सुरेश्वरि! जो विद्वान् इस पवित्र देवी-कवच का पाठ करता है, उसे कहीं भी किसी प्रकार का भय नहीं होता।
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॥ श्लोक १६ ॥
रोग और शत्रु का नाश
रोगार्ताश्च विमुच्यन्ते बन्धनान्मुच्यते नरः।
विपदो नाशमायान्ति कवचं यस्य वर्तते॥
विपदो नाशमायान्ति
जिसके पास यह कवच है, उसके रोग दूर होते हैं, बंधन कट जाते हैं और सभी विपदाएँ नष्ट हो जाती हैं।
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॥ श्लोक १७ ॥
ग्रह-बाधा से मुक्ति
ग्रहबाधाश्च नश्यन्ति ग्रहाः शान्ता भवन्ति च।
दिव्यं कवचमिदं पुण्यं देव्याश्चण्डिकया कृतम्॥
दिव्यं कवचमिदं पुण्यम्
ग्रह-बाधाएँ नष्ट होती हैं, ग्रह शांत हो जाते हैं। यह चण्डिका देवी द्वारा निर्मित दिव्य और पुण्यमय कवच है।
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॥ श्लोक १८ ॥
कवच पाठ का महाफल
ये त्विदं कवचं देव्याः पठन्ति श्रद्धयान्विताः।
क्षुद्रा बाधाः प्रशाम्यन्ति सर्वे सत्त्वाः प्रसीदन्ति॥
सर्वे सत्त्वाः प्रसीदन्ति
जो श्रद्धापूर्वक इस देवी-कवच का पाठ करते हैं, उनकी क्षुद्र बाधाएँ शांत होती हैं और समस्त सत्त्व प्रसन्न होते हैं।
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
देव्याः कवचमित्येतद्यः पठेत्सततं नरः।
सर्वापद्भ्यो न बाध्येत परत्र च सुखी भवेत्।
सर्वत्र जयमाप्नोति विजयो विजयी भवेत्॥
जो मनुष्य इस देवी-कवच का सतत पाठ करता है, वह किसी भी आपदा से पीड़ित नहीं होता, परलोक में सुखी रहता है, सर्वत्र जय प्राप्त करता है और विजयी होता है।

🛡️ देवी कवचम् — परिचय एवं महत्व

देवी कवचम् दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है जो प्रथम चरित्र के अन्तर्गत आता है। इसमें ब्रह्मा मार्कण्डेय को यह परम गुह्य कवच बताते हैं जो दसों दिशाओं और शरीर के समस्त अंगों की रक्षा करता है।

इस कवच की विशेषता यह है कि यह दिशा-रक्षा और अंग-रक्षा — दोनों को एक साथ साधता है। प्रत्येक दिशा में एक विशेष देवी और प्रत्येक अंग की रक्षा के लिए एक विशेष शक्ति का आह्वान किया जाता है।

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दिशा रक्षादसों दिशाओं में दस देवियों का आह्वान — ऐन्द्री, वाराही, चामुण्डा आदि — जो समस्त दिशाओं से रक्षा करती हैं।
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सर्वांग रक्षासिर से पैर तक प्रत्येक अंग की रक्षा — नेत्र, कर्ण, नासिका, हृदय, भुज, पाद — सभी की विशेष देवी रक्षिका हैं।
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सप्तशती पाठ विधिदुर्गा सप्तशती के पाठ में कवच, अर्गला, कीलक — तीनों का पाठ आवश्यक है। इसे "त्रयंग" पाठ कहते हैं।
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नवरात्रि में विशेषनवरात्रि में प्रतिदिन देवी कवचम् का पाठ करने से समस्त भय, रोग और शत्रु-बाधा नष्ट होती है।
DEVI KAVACHAM
Sarvanga Raksha • Saptashati