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✦ कीलक स्तोत्रम् — सम्पूर्ण पाठ ✦
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच —
ॐ — माँ चण्डिका को नमस्कार। मार्कण्डेय ऋषि ने कहा —
॥ श्लोक १ ॥
विशुद्धज्ञान — शिव-वन्दना
विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥
Viśuddha-Jñāna-Dehāya Trivedī-Divya-Cakṣuṣe | Śreyaḥ-Prāpti-Nimittāya Namaḥ Somārdha-Dhāriṇe
जिनका शरीर विशुद्ध ज्ञान से बना है, जिनके तीन नेत्र तीनों वेदों के समान दिव्य हैं, जो कल्याण की प्राप्ति के हेतु हैं और जो अर्धचन्द्र धारण करते हैं — ऐसे शिव को नमस्कार।
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॥ श्लोक २ ॥
सर्वस्वरूपे — देवी की सर्वव्यापकता
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
Sarva-Svarūpe Sarveśe Sarva-Śakti-Samanvite | Bhayebhyas-Trāhi No Devi Durge Devi Namo'stu Te
हे सर्वस्वरूपा! हे सर्वेश्वरी! हे समस्त शक्तियों से युक्त! हे देवि दुर्गे! सभी भयों से हमारी रक्षा करें — आपको नमस्कार।
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॥ श्लोक ३ ॥
एतत्ते वदनं — देवी का सौम्य मुख
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु नः सर्वभूतेभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
Etat-Te Vadanaṃ Saumyaṃ Locana-Traya-Bhūṣitam | Pātu Naḥ Sarva-Bhūtebhyaḥ Kātyāyani Namo'stu Te
हे कात्यायनि! आपका यह सौम्य मुख तीन नेत्रों से विभूषित है — वह हमें सभी प्राणियों के भय से बचाए। आपको नमस्कार।
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॥ श्लोक ४ ॥
ज्वालाकरालम् — त्रिशूल की रक्षा
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥
Jvālā-Karāla-Matyugram Aśeṣā-Sura-Sūdanam | Triśūlaṃ Pātu No Bhīter Bhadra-Kāli Namo'stu Te
हे भद्रकाली! ज्वालाओं से भयानक, अत्यन्त उग्र और समस्त असुरों का नाश करने वाला आपका त्रिशूल हमें भय से बचाए। आपको नमस्कार।
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॥ श्लोक ५ ॥
हिनस्ति — घण्टा का रक्षण
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव॥
Hinasti Daitya-Tejāṃsi Svanenāpūrya Yā Jagat | Sā Ghaṇṭā Pātu No Devi Pāpebhyo Naḥ Sutāniva
हे देवि! जो घण्टा अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके दैत्यों के तेज को नष्ट करती है — वह घण्टा हमें पापों से उसी तरह बचाए जैसे माँ अपने पुत्रों को।
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॥ श्लोक ६ ॥
असुरासृग्वसापङ्क — खड्ग की वन्दना
असुरासृग्वसापङ्कचर्चिताऽस्ते करोज्ज्वलाः।
शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नताः स्म हे॥
Asurāsṛg-Vasā-Paṅka-Carcitā'ste Karojjvalāḥ | Śubhāya Khaḍgo Bhavatu Caṇḍike Tvāṃ Natāḥ Sma He
हे चण्डिके! असुरों के रक्त और मांस से लिप्त, आपके चमकीले हाथों में जो खड्ग है — वह हमारे कल्याण के लिए हो। हम आपको प्रणाम करते हैं।
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॥ श्लोक ७ ॥
रोगानशेषान् — रोग-निवारण का वरदान
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥
Rogān-Aśeṣān-Apahaṃsi Tuṣṭā Ruṣṭā Tu Kāmān Sakalān-Abhīṣṭān | Tvāmāśritānāṃ Na Vipannarāṇāṃ Tvāmāśritā Hy-Āśrayatāṃ Prayānti
प्रसन्न होने पर आप समस्त रोगों का नाश करती हैं, क्रुद्ध होने पर सभी अभीष्ट कामनाओं को नष्ट करती हैं। जो आपकी शरण में हैं उनका कभी पतन नहीं होता — आपके शरणागत स्वयं दूसरों के आश्रय बन जाते हैं।
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॥ श्लोक ८ ॥
देव्याः प्रीतिकरम् — सर्वमङ्गल
एतत्कृतं यत्कर्म तद्ब्रवीम्यखिलं शृणु।
देव्याः प्रीतिकरं लोके सर्वमङ्गलकारकम्॥
Etat-Kṛtaṃ Yat-Karma Tad-Bravīmy-Akhilaṃ Śṛṇu | Devyāḥ Prīti-Karaṃ Loke Sarva-Maṅgala-Kārakam
जो कर्म किया गया है, उसे मैं सम्पूर्ण रूप से बता रहा हूँ — सुनो। यह देवी को प्रसन्न करने वाला और इस लोक में सर्वमंगलकारक है।
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॥ श्लोक ९ ॥
गुह्यातिगुह्य — सिद्धि की प्रार्थना
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि॥
Guhyāti-Guhya-Goptrī Tvaṃ Gṛhāṇāsmat-Kṛtaṃ Japam | Siddhir-Bhavatu Me Devi Tvat-Prasādāt-Sureśvari
ओम् नमश्चण्डिकायै
हे सुरेश्वरि! आप गुह्य से भी गुह्य की रक्षक हैं। हमारे द्वारा किए गए जप को स्वीकार करें। हे देवि! आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो।
✦ कीलकोद्धाटन फल — Kilaka Phala ✦
कीलकं समाप्तम् — यः पठेत् सर्वकामार्थी।
सप्तशत्या विनिर्मुक्तः सर्वबाधाविवर्जितः॥
देव्याः प्रसादं सम्पाद्य सर्वान् कामानवाप्नुयात्।
नमश्चण्डिकायै सततं भक्तियुक्तेन चेतसा॥
Kīlakaṃ Samāptam — Yaḥ Paṭhet Sarva-Kāmārthī | Saptaśatyā Vinirmuktaḥ Sarva-Bādhā-Vivarjitaḥ
कीलक स्तोत्रम् सम्पूर्ण हुआ। जो इसे सभी कामनाओं की पूर्ति के लिए पढ़ता है, वह सप्तशती के सभी अवरोधों से मुक्त होकर समस्त बाधाओं से रहित हो जाता है। देवी की कृपा से वह सभी कामनाओं को पाता है।
🔐 कीलक स्तोत्रम् — परिचय एवं रहस्य
कीलक स्तोत्रम् दुर्गा सप्तशती (देवी महात्म्य) का एक महत्वपूर्ण पूर्वाङ्ग है। "कीलक" का अर्थ है कील — यह स्तोत्र सप्तशती पाठ में लगी सभी बाधाओं और अवरोधों को दूर करके उसे सम्पूर्ण फलदायक बनाता है।
मार्कण्डेय ऋषि ने इस स्तोत्र को माँ चण्डिका की स्तुति के रूप में रचा। सप्तशती पाठ से पूर्व कवचम्, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ अनिवार्य माना जाता है — ये तीनों मिलकर "त्रिक" बनाते हैं।
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कीलक का अर्थ"कीलक" अर्थात् अवरोध-निवारक — यह स्तोत्र सप्तशती के पाठ में आने वाली समस्त बाधाओं की कील को निकालता है।
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सप्तशती पूर्वाङ्गकवचम्, अर्गला और कीलकम् — ये तीन पूर्वाङ्ग मिलकर सप्तशती पाठ को सुरक्षित और सम्पूर्ण बनाते हैं।
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मार्कण्डेय ऋषियह स्तोत्र मार्कण्डेय पुराण का भाग है। मार्कण्डेय ऋषि ने राजा सुरथ और वैश्य समाधि को यह ज्ञान दिया।
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नवरात्रि में विशेषनवरात्रि में नित्य सप्तशती पाठ के पूर्व कीलक स्तोत्र का पाठ करने से देवी की विशेष कृपा और पाठ निर्विघ्न सम्पन्न होता है।