ShivMarg · व्रत एवं पर्व

एकादशी व्रत तिथि, विधि और कथा

भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी व्रत की संपूर्ण जानकारी — पिछले वर्ष, वर्तमान वर्ष और अगले वर्ष की तिथियाँ, पारण समय, व्रत विधि, कथा और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न, सब एक ही स्थान पर।

जानकारी लोड हो रही है…

एकादशी क्या है?

"एकादशी" संस्कृत के शब्द एक (एक) और दशी (दस) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ग्यारहवीं तिथि। हिंदू चंद्र पंचांग के अनुसार हर माह में दो एकादशी आती हैं — एक शुक्ल पक्ष (चंद्रमा के बढ़ते चरण) में और एक कृष्ण पक्ष (घटते चरण) में। इस प्रकार एक सामान्य वर्ष में 24 और अधिकमास वाले वर्ष में 26 एकादशी होती हैं। प्रत्येक एकादशी का अपना नाम, कथा और महत्व है, और सभी भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित हैं।

मान्यता है कि एकादशी स्वयं एक देवी हैं, जो भगवान विष्णु के तेज से प्रकट हुई थीं। जो भी श्रद्धापूर्वक इस दिन व्रत रखता है, उसे पापों से मुक्ति, मानसिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है — ऐसा पद्म पुराण सहित कई ग्रंथों में वर्णित है।

एकादशी तिथि सूची — 2025, 2026, 2027

ⓘ सभी तिथियाँ एवं समय नई दिल्ली, भारत के अनुसार (IST) दर्शाए गए हैं। तिथि आरंभ/समाप्ति क्षेत्रवार थोड़ी भिन्न हो सकती है, अपने शहर के पंचांग से पुष्टि अवश्य करें। जहाँ एकादशी दो दिन फैलती है, वहाँ पहली तिथि स्मार्त (गृहस्थ) और दूसरी वैष्णव संप्रदाय के लिए मानी जाती है। 2027 के शेष माह की तिथियाँ शीघ्र जोड़ी जाएँगी।

एकादशी व्रत विधि

1. दशमी तिथि (एक दिन पहले)

  1. दशमी की शाम को हल्का सात्विक भोजन करें, रात्रि में देर से भोजन न करें।
  2. प्याज़, लहसुन, मांस, मसूर दाल जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन न करें।
  3. अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले) उठने का संकल्प लें।

2. एकादशी के दिन

  1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  2. भगवान विष्णु की पूजा करें — तुलसी दल, पीले फूल, पंचामृत एवं धूप-दीप अर्पित करें।
  3. "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करें, विष्णु सहस्रनाम या एकादशी माहात्म्य का पाठ/श्रवण करें।
  4. अन्न, चावल, गेहूं, दाल का पूर्ण त्याग करें। फलाहार अथवा निर्जला — अपनी क्षमता अनुसार व्रत रखें।
  5. दिन में क्रोध, झूठ व निंदा से बचें, यथासंभव दान-पुण्य करें।
  6. रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन में समय व्यतीत करना विशेष फलदायी माना गया है।

3. द्वादशी तिथि (पारण)

  1. अगले दिन सूर्योदय के पश्चात, शास्त्रोक्त पारण मुहूर्त में ही व्रत खोलें।
  2. हरि वासर (द्वादशी के प्रथम चतुर्थांश) समाप्त होने से पहले पारण न करें।
  3. सादा सात्विक भोजन से व्रत खोलें, ब्राह्मणों व जरूरतमंदों को दान दें।

क्या खाएं, क्या न खाएं

वर्जित पदार्थग्रहण करने योग्य पदार्थ
चावल, गेहूं, सभी अनाजफल (सभी प्रकार), दूध व दुग्ध उत्पाद (पनीर, घी, दही)
दाल, चना, राजमा आदिमखाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, राजगिरा आटा
प्याज़, लहसुनसेंधा नमक (केवल फलाहारी व्रत में, वैकल्पिक)
शराब व अन्य नशीले पदार्थसूखे मेवे — बादाम, किशमिश, काजू
मांस-मछली, अंडासाबूदाना खिचड़ी (कुछ परंपराओं में मान्य)

कुछ भक्त संपूर्ण निर्जला व्रत रखते हैं (जल भी वर्जित)। यह अत्यंत कठोर व्रत है — गर्भवती महिलाओं, वृद्धजनों और अस्वस्थ व्यक्तियों को इससे बचना चाहिए एवं आवश्यकतानुसार चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।

एकादशी व्रत कथा (संक्षेप में)

प्राचीन कथा के अनुसार, मुर नामक एक शक्तिशाली असुर ने भगवान विष्णु को योगनिद्रा में देखकर उन पर आक्रमण करना चाहा। उस समय भगवान विष्णु के तेज से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई, जिसने असुर मुर का संहार कर भगवान की रक्षा की। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उस कन्या को "एकादशी" नाम दिया और वरदान दिया कि जो भी श्रद्धापूर्वक इस तिथि को व्रत रखेगा, वह समस्त पापों से मुक्त होकर सुख, समृद्धि और अंततः मोक्ष प्राप्त करेगा।

प्रत्येक एकादशी की अपनी पृथक कथा भी है — जैसे निर्जला एकादशी भीम की कथा से जुड़ी है, देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु की योगनिद्रा से, और देवउठनी एकादशी उनके जागरण से। हर एकादशी के पृष्ठ पर आगे चलकर विस्तृत कथा जोड़ी जाएगी।

एकादशी व्रत के प्रकार

निर्जला: संपूर्ण दिन जल व अन्न दोनों का त्याग — सबसे कठोर प्रकार, जैसे निर्जला एकादशी।

सजल: दिनभर जल, फलों के रस व तरल पदार्थों पर आधारित उपवास।

फलाहारी: फल, दूध व अनाज-रहित पदार्थों का सेवन कर व्रत रखना — अधिकांश गृहस्थ इसी प्रकार का पालन करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

एकादशी व्रत क्या है?

एकादशी हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह के दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की ग्यारहवीं तिथि है। यह दिन भगवान विष्णु की आराधना और उपवास के लिए समर्पित माना जाता है। वर्ष में सामान्यतः 24 और अधिकमास वाले वर्ष में 26 एकादशी आती हैं।

एकादशी व्रत में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?

व्रत में अनाज, चावल, दाल, प्याज़-लहसुन वर्जित माने जाते हैं। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू व सिंघाड़े का आटा, मखाना और सूखे मेवे ग्रहण किए जा सकते हैं। कुछ भक्त निर्जला व्रत भी रखते हैं जिसमें जल भी वर्जित होता है।

एकादशी व्रत का पारण कब करना चाहिए?

व्रत का पारण द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद, शास्त्रों में बताए गए पारण मुहूर्त के भीतर करना चाहिए। हरि वासर समाप्त होने से पहले पारण नहीं करना चाहिए।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?

जब एकादशी तिथि दो दिन फैलती है, तो गृहस्थ (स्मार्त) परिवार पहले दिन व्रत रखते हैं, जबकि वैष्णव संप्रदाय और संन्यासी दूसरे दिन व्रत रखते हैं, जिसे वैष्णव एकादशी कहा जाता है।

क्या गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग एकादशी व्रत रख सकते हैं?

गर्भवती महिलाओं, अत्यंत वृद्ध और अस्वस्थ व्यक्तियों को कठोर या निर्जला व्रत रखने की सलाह नहीं दी जाती। वे फलाहार या सामान्य व्रत रखकर श्रद्धा अनुसार पूजन कर सकते हैं।

निर्जला एकादशी क्या है?

निर्जला एकादशी सबसे कठिन मानी जाती है, जिसमें जल का त्याग भी किया जाता है। मान्यता है कि इसे विधिपूर्वक करने से वर्ष की सभी 24 एकादशियों का फल प्राप्त होता है।

देवशयनी और देवउठनी एकादशी का क्या महत्व है?

देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु के चार माह के योगनिद्रा में जाने के साथ चातुर्मास आरंभ होता है। देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी पर भगवान विष्णु जागते हैं और मांगलिक कार्य पुनः आरंभ होते हैं।

क्या हर महीने दो एकादशी होती हैं?

हाँ, प्रत्येक हिंदू माह में दो एकादशी आती हैं — एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। जिस वर्ष अधिकमास होता है उसमें दो अतिरिक्त एकादशी (पद्मिनी और परमा) भी जुड़ जाती हैं।

ShivMarg.live के बारे में

ShivMarg एक हिंदी एवं मैथिली भक्ति मंच है, जो मंत्र, स्तोत्र, भजन, आरती, पंचांग तथा वैदिक ज्योतिष से जुड़ी प्रामाणिक जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध कराता है। हमारा उद्देश्य है — सनातन परंपरा की समृद्ध विरासत को हर श्रद्धालु तक सहज रूप से पहुँचाना, चाहे वे किसी भी क्षेत्र या भाषा-भाषी हों।

एकादशी, पंचांग, व्रत-त्योहार और मैथिली विद्यापति गीत जैसी विशेष सामग्री के साथ, ShivMarg निरंतर नई एवं सटीक जानकारी जोड़ता रहता है। हमारा प्रयास है कि हर पृष्ठ न केवल तिथि बताए, बल्कि विधि, महत्व और परंपरा को भी सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करे।

सुझाव, सुधार अथवा किसी एकादशी विशेष की विस्तृत कथा हेतु अनुरोध के लिए आप हमसे संपर्क पृष्ठ के माध्यम से जुड़ सकते हैं।