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✦ हनुमान बाहुक — सम्पूर्ण पाठ ✦
✦ रचना की पृष्ठभूमि ✦
काशी में तुलसीदास जी की बाँह में भयंकर पीड़ा उठी।
तब उन्होंने हनुमानजी से अपना दर्द कहा —
और यह अनमोल "हनुमान बाहुक" रचा॥
तब उन्होंने हनुमानजी से अपना दर्द कहा —
और यह अनमोल "हनुमान बाहुक" रचा॥
गोस्वामी तुलसीदास जी वाराणसी में थे जब उनके बाहु (हाथ/कन्धे) में असहनीय वेदना हुई। अपनी पीड़ा को श्लोकों में व्यक्त करते हुए उन्होंने हनुमानजी की स्तुति की। इस स्तोत्र का पाठ शारीरिक कष्टों में अत्यन्त लाभकारी है।
॥ छन्द १ ॥
प्रारम्भिक स्तुति
काल-कराल-मराल-माला उरे।
मत्त मातंग-माल-मर्दन-परे॥
दानव-दल-दरिद्र-दारुण-हरे।
बजरंग-बान हनुमान नमस्करे॥
मत्त मातंग-माल-मर्दन-परे॥
दानव-दल-दरिद्र-दारुण-हरे।
बजरंग-बान हनुमान नमस्करे॥
हनुमान महाबली, बाहुक पीर हरो।
काल के कराल जबड़े वाले हंसों की माला धारण करने वाले, मत्त हाथियों के दल का मर्दन करने वाले, दानव-दल, दारिद्र्य और संकट हरने वाले बजरंगबाण हनुमान को नमस्कार।
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॥ छन्द २ ॥
तुलसीदास की विनती
बाँह जुड़ाय बाँधिय बैरी बाँहि।
बाहुक पीर हरो हनुमान॥
मारुत-पुत्र तुम्हरे प्रताप ते।
सब संकट मिटत छिन माँहि॥
बाहुक पीर हरो हनुमान॥
मारुत-पुत्र तुम्हरे प्रताप ते।
सब संकट मिटत छिन माँहि॥
हनुमान महाबली, बाहुक पीर हरो।
बाँह की ऐंठन मिटाओ, बाहु-पीड़ा (बाँह का दर्द) हरो हे हनुमान! हे मारुत-पुत्र! आपके प्रताप से पल में सब संकट मिट जाते हैं।
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॥ छन्द ३ ॥
रोग-नाश प्रार्थना
रोग-दोष-दुख-दारिद हरो।
पवन-पुत्र हरो पीर मोरी॥
जेहिके जरे अंग सब जारे।
ऐसे बाहुक दुःख मम टारे॥
पवन-पुत्र हरो पीर मोरी॥
जेहिके जरे अंग सब जारे।
ऐसे बाहुक दुःख मम टारे॥
ॐ हं हनुमते नमः।
रोग-नाशाय, पीड़ा-शमनाय नमः॥
रोग-नाशाय, पीड़ा-शमनाय नमः॥
यह विशेष मंत्र हनुमान बाहुक के साथ जपने से शारीरिक पीड़ा में विशेष लाभ होता है।
रोग, दोष, दुःख और दारिद्र्य हरो — हे पवन-पुत्र! मेरी पीड़ा हरो। जिससे सब अंग जल रहे हों, ऐसे बाहुक (बाँह) के दुःख मेरे दूर करो।
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॥ छन्द ४ ॥
शक्ति की याद
सुमिरि पवन-सुत पावन नाम।
अपने जन के संकट हरो हनुमान॥
जाके बल से गिरिवर उखारे।
खल-दल बिदारे लंक जरारे॥
अपने जन के संकट हरो हनुमान॥
जाके बल से गिरिवर उखारे।
खल-दल बिदारे लंक जरारे॥
हनुमान महाबली, बाहुक पीर हरो।
पवन-सुत के पवित्र नाम का स्मरण करते हुए — हे हनुमान! अपने भक्त के संकट हरो। जिनके बल से पर्वत उखड़ते हैं, दुष्ट-दल विदारित होते हैं और लंका जलती है।
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॥ छन्द ५ ॥
तुलसीदास का समर्पण
तुलसी विपत्ति में तुम ही पुकारे।
और को याद न आत हमारे॥
तुम जगत-पितु तुम जगत-माता।
तुम सखा, तुम ही हो विधाता॥
और को याद न आत हमारे॥
तुम जगत-पितु तुम जगत-माता।
तुम सखा, तुम ही हो विधाता॥
हनुमान महाबली, बाहुक पीर हरो।
तुलसीदास विपत्ति में केवल आपको पुकारते हैं — और कोई याद नहीं आता। आप जगत के पिता, माता, मित्र और विधाता हैं।
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॥ छन्द ६ ॥
बाहु-शक्ति प्रदान करने की विनती
बाहु बल बाढ़ो हनुमान हमारो।
बाधा दूर हरो कष्ट निवारो॥
राम-नाम बल तुम्हरे पासा।
पूर करो सेवक की आसा॥
बाधा दूर हरो कष्ट निवारो॥
राम-नाम बल तुम्हरे पासा।
पूर करो सेवक की आसा॥
हनुमान महाबली, बाहुक पीर हरो।
हे हनुमान! मेरे बाहु-बल को बढ़ाओ, बाधाएँ दूर करो, कष्ट मिटाओ। राम-नाम का बल आपके पास है — सेवक की आशा पूर्ण करो।
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॥ छन्द ७ ॥
औषधि — संजीवनी स्मरण
जैसे लखन को संजीवनी दीन्ही।
वैसे हमहूँ दीजे वैद्य-रस॥
रोग-दोष-जर-जरा हरो।
काया नीकी करो कपि नंदन॥
वैसे हमहूँ दीजे वैद्य-रस॥
रोग-दोष-जर-जरा हरो।
काया नीकी करो कपि नंदन॥
हनुमत वैद्य-राज नमामि।
सर्व-रोग-विनाशाय नमः॥
सर्व-रोग-विनाशाय नमः॥
हनुमानजी वैद्यराज हैं — संजीवनी के देवता। सभी रोगों के विनाशक को नमस्कार।
जैसे लक्ष्मण को संजीवनी दी — वैसे ही हमें भी औषधि-रस दीजिए। रोग, दोष, बुखार और वृद्धावस्था की पीड़ा हरो। हे कपि-नन्दन! काया को स्वस्थ करो।
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॥ छन्द ८ ॥
कर्म-क्षय प्रार्थना
पूरब जन्म के पाप-प्रहारे।
रोग बनि आये तन में हमारे॥
तुलसी की विनती यही एक है।
हनुमान कृपा करो अब मेरे॥
रोग बनि आये तन में हमारे॥
तुलसी की विनती यही एक है।
हनुमान कृपा करो अब मेरे॥
हनुमान महाबली, बाहुक पीर हरो।
पूर्व जन्म के पापों के प्रहार से रोग शरीर में आए हैं। तुलसीदास की एक ही विनती है — हे हनुमान! अब मुझ पर कृपा करो।
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॥ छन्द ९ ॥
वायु-पुत्र — प्राण-शक्ति
वायु वेग तन में जब भरे।
सब रोग दूर ताड़ हरे॥
हनुमत तेरी कृपा से पाऊँ।
रोग-मुक्त जग में विचरूँ॥
सब रोग दूर ताड़ हरे॥
हनुमत तेरी कृपा से पाऊँ।
रोग-मुक्त जग में विचरूँ॥
हनुमान महाबली, बाहुक पीर हरो।
जब वायु का वेग शरीर में भर जाए, तब सभी रोग दूर भाग जाएँ। हे हनुमान! तेरी कृपा से रोग-मुक्त होकर संसार में विचरूँ।
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॥ छन्द १० ॥
अन्तिम प्रार्थना
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
बाहुक की पीर सब हरो।
तुलसीदास को आसरो दियो॥
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
बाहुक की पीर सब हरो।
तुलसीदास को आसरो दियो॥
हनुमान महाबली, बाहुक पीर हरो।
जय-जय-जय हनुमान गोसाईं! गुरुदेव के समान कृपा करें। बाहुक (हाथ-जोड़ों) की सारी पीड़ा हरो। तुलसीदास को आसरा (सहारा) दीजिए।
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
हनुमान बाहुक पढ़े जो कोई।
ताके बाहु पीर दूर होई॥
रोग-दोष सब नास हो जाहीं।
हनुमत कृपा बरसे तन माहीं॥
ताके बाहु पीर दूर होई॥
रोग-दोष सब नास हो जाहीं।
हनुमत कृपा बरसे तन माहीं॥
जो कोई भी हनुमान बाहुक का पाठ करे, उसकी बाहु-पीड़ा (हाथ, कन्धे, जोड़ों का दर्द) दूर हो जाती है। सभी रोग और दोष नष्ट हो जाते हैं और हनुमानजी की कृपा शरीर में वर्षा करती है।
💪 हनुमान बाहुक — परिचय
गोस्वामी तुलसीदास जी ने काशी में जब अपने हाथ (बाहु) में असहनीय वेदना का अनुभव किया, तब उन्होंने इस स्तोत्र की रचना की। "बाहुक" शब्द का अर्थ है — बाँह/भुजा से सम्बन्धित। यह स्तोत्र शारीरिक कष्टों, विशेषतः जोड़ों के दर्द, हाथ-पाँव की पीड़ा और संधि-वात (आर्थराइटिस) में अत्यन्त प्रभावशाली माना जाता है।
इस स्तोत्र में तुलसीदासजी ने अपना दर्द बड़ी मार्मिकता से व्यक्त किया है — यही इसकी विशेषता है। भक्त का पूर्ण समर्पण और हनुमानजी पर अटूट विश्वास इस रचना का प्राण है।
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बाहु-पीड़ा नाशजोड़ों का दर्द, गठिया, संधि-वात, हाथ-कन्धे की पीड़ा — इन सबके लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से रचा गया है।
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संजीवनी-स्मरणस्तोत्र में हनुमानजी के संजीवनी लाने का विशेष स्मरण है — इसी से वे वैद्यराज माने जाते हैं।
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तुलसीदास का अनुभवयह केवल सैद्धान्तिक स्तोत्र नहीं — स्वयं रचयिता के वास्तविक कष्ट की उपज है, इसीलिए इसकी शक्ति अप्रतिम है।
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समग्र रोग-नाशकेवल बाहु-पीड़ा नहीं — सभी प्रकार के शारीरिक कष्टों में इस स्तोत्र का पाठ लाभदायक है।