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✦ गे माई चंद्रमुखी सन — सम्पूर्ण गीत ✦
॥ विद्यापति गीत ॥
मूल पाठ — मैथिली में
गे माई चंद्रमुखी सन, गौरी हमर छथि
सुरुज सन करितौं जमाई - 3
गे माई चंद्रमुखी सन, गौरी हमर छथि
सुरुज सन करितौं जमाई ।
गे माई चंद्रमुखी सन, गौरी हमर छथि
नारद के हम की रे बिगाड़लौं, जिन बूढ़ आनल जमाई - 2
गे माई एहेन सुनरि धिया
तिनको केहेन पिया,
नारद आनल उठाई,
गे माई एहेन सुनरि धिया
तिनको केहेन पिया,
नारद आनल उठाई,
परिछन चलली माई सुनैना, वर देखि खसलि झमाई - 2
गे माई हम नै बियाहब ईहो तपसि वर
मोरी धिया रहती कुमारी,
गे माई हम नै बियाहब ईहो तपसि वर
मोरी धिया रहती कुमारी,
कहथिन गौड़ी सुनू हे सदाशिव एक बेर रूप देखाऊ, - 2
गे माई देखी जुड़ाईती माई सुनैना
देखत नगर समाज
गे माई जुड़ाईती माई सुनैना
देखत नगर समाज
भनहि विद्यापति सुनु हे सुनैना, इहो थिका त्रिभुवन नाथ, - 2
गे माई करम लिखल छल
ईहो तपसि वर लिखल मेटल नहि जाय
गे माई करम लिखल छल
ईहो तपसि वर लिखल मेटल नहि जाय
गे माई चंद्रमुखी सन, गौरी हमर छथि
सुरुज सन करितौं जमाई
Ge Mai Chandramukhi San, Gauri Hamar Chhathi | Suruj San Karitaun Jamai ...
☽ भावार्थ एवं शब्दार्थ ☽
गे माई
GE MĀĪ
हे माँ! — सम्बोधन
चंद्रमुखी सन
CHANDRAMUKHĪ SAN
चंद्रमुखी (गौरी) के संग
गौरी हमर छथि
GAURĪ HAMAR CHHATHI
गौरी हमारी हैं
सुरुज सन करितौं जमाई
SURUJ SAN KARITAUN JAMĀĪ
सूर्य से करते हैं संबंध (विवाह)
नारद
NĀRADA
देवर्षि नारद — विवाह कराने वाले
तपसि वर
TAPASI VARA
तपस्वी वर (शिव)
करम लिखल छल
KARAM LIKHAL CHHAL
भाग्य में लिखा था
✦ सम्पूर्ण अर्थ (मैथिली + हिंदी) ✦
हे माँ! चंद्रमुखी गौरी हमारी पुत्री हैं, और हम सूर्य देव से उसका विवाह करने वाले हैं। नारद जी ने षड्यंत्र रचकर क्या बिगाड़ दिया? वे एक तपस्वी वर (शिव) को ले आए। मैया सुनैना (पार्वती) परीक्षा के लिए चलीं, वर को देखकर मूर्छित हो गईं। गौरी ने कहा: मैं इस तपस्वी से विवाह नहीं करूंगी। तब सदाशिव ने अपना दिव्य रूप दिखाया — देखते ही सुनैना की आँखें जुड़ गईं। विद्यापति कहते हैं — सुनो सुनैना, यही त्रिभुवननाथ शिव हैं, भाग्य की लेखनी नहीं मिटती।
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☽ गीत की महिमा एवं प्रसंग ☽
☽ विद्यापति के शिव-पार्वती पद
यह गीत महाकवि विद्यापति (१३५२-१४४८) की पदावली का अनमोल रत्न है। इसमें गौरी के पिता (हिमालय) की उद्विग्नता और शिव से विवाह की लीला का चित्रण है। "सुरुज सन करितौं जमाई" कहकर वे सूर्य को दामाद बनाना चाहते थे, परंतु नारद के कहने पर शिव आए — तपस्वी रूप में। अंत में शिव का साक्षात्कार और सब कर्मबद्ध है।
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विद्यापति की शैलीप्रेम, श्रृंगार और भक्ति का अद्भुत मिश्रण। मैथिली साहित्य के शिखर कवि।
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शिव का रहस्यगीत में शिव को पहले तपस्वी (विरूप) फिर त्रिभुवननाथ के रूप में दिखाया गया है — बाहरी रूप से परे सत्य का बोध।
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लोकप्रियतायह गीत आज भी मैथिली समारोहों, विवाहों और शिवरात्रि में गाया जाता है।