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✦ विद्यापति पदावली • शिव-पार्वती लीलागीत ✦

Jogiya Ek Hum Dekhlaun Ge Mai

जोगिया एक हम देखलौं गए माई
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जोगिया एक हम देखलौं गए माई
जोगिया एक हम देखलौं गए माई

विद्यापति के अमर गीत में शिव की अद्भुत रूपवर्णना। पंचमुखी, त्रिनेत्री शिव का दर्शन जो दुख दूर करता है। भावभीनी मैथिली कविता।

रचनाकार: महाकवि विद्यापति • १४वीं शताब्दी • मैथिली कविता
श्रवण
✦ मन को शांति
भाव
✦ शिव दर्शन
रस
✦ संगीतमयी भक्ति
जोगिया एक हम देखलौं गए माईअनहद रूप कहलों नहि जाईपंच बदन तिन नयन विसालाभन विद्यापति
✦ जोगिया एक हम देखलौं गए माई — सम्पूर्ण गीत ✦
॥ विद्यापति गीत ॥
मूल पाठ — मैथिली में
जोगिया एक हम देखलौं गए माई
जोगिया एक हम देखलौं गए माई

विद्यापति
जोगिया एक हम देखलौं गए माई।

अनहद रूप कहलों नहि जाई।
पंच बदन तिन नयन विसाला।

बसन बिहुन ओढ़न बघछाना॥
सिर बहे गंग तिलक सोहे चंदा।

देखि सरूप मिटल दुख दंदा।
जाहि जोगिया लै रहलि भवानी।

मन आनलि बर कौन गुन जानी॥
कुछ नहि सिल नहिं तात महतारी।

बएस दिनक थिक लछ जुग चारी।
भन विद्यापति सुन ए मनाइनि।

एहो जोगिया थिक त्रिभुवन दानि॥
Jogiya Ek Hum Dekhlaun Ge Mai...
☽ भावार्थ एवं शब्दार्थ ☽
जोगिया
JOGIYĀ
योगी, तपस्वी (शिव)
एक हम देखलौं
EK HUM DEKHLAUN
हमने एक देखा
गए माई
GE MĀĪ
गए माँ (पार्वती से)
अनहद रूप
ANAHAD RŪP
अनंत रूप
पंच बदन
PANCH BADAN
पाँच मुख
तिन नयन
TIN NAYAN
तीन नेत्र
भवानी
BHAVĀNĪ
पार्वती देवी
त्रिभुवन दानि
TRIBHUVAN DĀNĪ
त्रिभुवन का दानी
✦ सम्पूर्ण अर्थ (मैथिली + हिंदी) ✦
हे माँ! हमने एक योगी को देखा जो आपके पास गया। उसका रूप अनंत है, पाँच मुख और तीन नेत्र हैं। शरीर पर बाघछाला, सिर पर गंगा बहती है, तिलक चंद्रमा। उस रूप को देखकर दुख और दर्द मिट गया। जिस योगी को भवानी (पार्वती) ले गईं, मन में आया कि कौन गुण जाने। न कुछ संपत्ति, न पिता-माता। बस चार युगों से लछ्मी रूप में स्थित। विद्यापति कहते हैं — सुनो मनाई, यही योगी त्रिभुवन का दानी है।
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☽ गीत की महिमा एवं प्रसंग ☽

☽ विद्यापति के शिव गीत

यह गीत महाकवि विद्यापति की रचना में शिव के विराट रूप का वर्णन है। पार्वती द्वारा शिव को योगी के रूप में देखा जाना और उसका मन मोहित होना।

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शिव रूपपंचमुखी, त्रिनेत्री शिव का वर्णन — भक्ति का सार।
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दर्शन लाभशिव दर्शन से दुख दूर, मोक्ष की प्राप्ति।
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लोकप्रियतामैथिली भक्तिमय गीतों में प्रमुख स्थान।