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✦ महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् — सम्पूर्ण पाठ ✦

अयि गिरिनन्दिनि

AIGIRI NANDINI

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माँ दुर्गा की दिव्य स्तुति — महिषासुर का नाश करने वाली देवी की जय
रचयिता : आदि शंकराचार्य • Adi Shankaracharya
🌺 सम्पूर्ण २१ श्लोक • All 21 Stanzas • Full Stotram
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✦ महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् — सम्पूर्ण २१ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
पर्वत-पुत्री, जगत-आनन्ददायिनी
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते।
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते॥
Ayi Giri-Nandini Nandita-Medini Vishva-Vinodini Nandi-Nute | Giri-Vara-Vindhya-Shiro-Adhini-Vasini Vishnu-Vilasini Jishnu-Nute
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे पर्वत-पुत्री! जो सारी पृथ्वी को आनंद देती हैं, जो समस्त विश्व को प्रसन्न करती हैं और नंदी द्वारा स्तुत हैं — जो विन्ध्याचल की चोटी पर विराजमान हैं, भगवान विष्णु को आनंद देने वाली और इंद्र द्वारा वंदित हैं — हे भगवती! शिव की कुटुम्बिनी, अपार बन्धुओं वाली — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि! सुंदर जटाधारिणी, शैलपुत्री!
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॥ श्लोक २ ॥
दानव-नाशिनी, त्रिभुवन-पोषिणी
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते।
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते॥
Sura-Vara-Varshini Durdhara-Dharshini Durmukha-Marshini Harsha-Rate | Tri-Bhuvana-Poshini Shankara-Toshini Kilbisha-Moshini Ghosha-Rate
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जो देवताओं पर वर वर्षाती हैं, दुर्धर और दुर्मुख असुरों को दंड देती हैं, तीनों लोकों का पालन करती हैं, शंकर को संतुष्ट करती हैं, पापों का हरण करती हैं — दानवों को क्रोध से दण्डित करने वाली, दैत्यों पर कोप करने वाली, उनके दुर्मद का शोषण करने वाली — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक ३ ॥
मधु-कैटभ विनाशिनी
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते।
शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते॥
Ayi Jagadamba Madamba Kadamba-Vana-Priya-Vasini Hasa-Rate | Shikhari-Shiromani Tunga-Himalaya-Shringa-Nijalaya-Madhya-Gate
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे जगत की माता! मेरी माता! कदम्ब वन में हँसती हुई विहार करने वाली — ऊँचे हिमालय के शिरोमणि शिखर पर अपने आलय में विराजमान — मधु के समान मधुर, मधु और कैटभ का गर्व चूर करने वाली, उनका भञ्जन करने वाली — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक ४ ॥
चण्ड-मुण्ड विनाशिनी
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते।
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते॥
Ayi Shata-Khanda Vikhandita-Runda Vitundita-Shunda Gaja-Adhipate | Ripu-Gaja-Ganda Vidarana-Chanda Parakrama-Shunda Mriga-Adhipate
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिन्होंने शत्रु के हाथियों की सूंड़ें काटकर उनके सिरों को सौ-सौ टुकड़ों में विखण्डित किया — जिनका सिंह शत्रु हाथियों के कपोल फाड़ता है — अपनी भुजाओं की दण्ड से चण्ड-मुण्ड का मर्दन करने वाली — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक ५ ॥
शिव को दूत बनाने वाली
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते।
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते॥
Ayi Rana-Durmada Shatru-Vadhod-ita Durdhara-Nirjara Shakti-Bhrite | Chatura-Vichara Dhurina Mahashiva Duta-Krita Pramatha-Adhipate
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
युद्ध के उन्माद में शत्रुओं का वध करने को प्रकट होने वाली, अपराजेय शक्ति धारण करने वाली — जिन्होंने स्वयं महाशिव को अपना दूत बनाया (शुम्भ के पास) — दुरात्माओं के दूत को नष्ट करने वाली — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक ६ ॥
शरणागत को अभयदायिनी
अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे।
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे॥
Ayi Sharanagata Vairi-Vadhu-Vara Vira-Varabhaya Dayakare | Tri-Bhuvana-Mastaka Shula-Virodhi Shiro-Dhikritamala Shulakare
दुमिदुमितामर दुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत दिङ्मकरे।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
शरण में आने वाले शत्रु-वीरों को भी अभय देने वाली — तीनों लोकों के राजाओं को त्रिशूल से पराजित करने वाली — विजय-उत्सव में दुन्दुभि की दुम-दुम ध्वनि से दिशाओं को मुखरित करने वाली — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक ७ ॥
धूम्रलोचन, रक्तबीज, शुम्भ-निशुम्भ नाशिनी
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते।
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते॥
Ayi Nija-Hunkrti Matra-Nirakrita Dhumra-Vilochana Dhumra-Shate | Samara-Vishoshita Shonita-Bija Samudbhava-Shonita Bija-Late
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
अपनी हुंकार मात्र से धूम्रलोचन को सौ धुएं के टुकड़ों में बदल देने वाली — रणभूमि में रक्तबीज और उससे उत्पन्न सभी क्लोनों का रक्त सोख लेने वाली — शुम्भ-निशुम्भ के महायज्ञ से भूत-पिशाचों को तृप्त करने वाली — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक ८ ॥
चतुरंग सेना-नाशिनी
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके।
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके॥
Dhanur-Anushanga Rana-Kshana-Sanga Parisphuradanga Natatkatake | Kanaka-Pishanga Prishatkani-Shanga Rasadbhata-Shrunga Hatabatuke
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
रण के प्रत्येक क्षण में धनुष की प्रत्यञ्चा से जिनकी चमकती भुजाओं का कड़ा नाचता है — जिनके सुनहरे बाण रक्तरंजित होकर चिल्लाते शत्रुओं का नाश करते हैं — जिन्होंने चारों ओर से घेरी हुई चतुरंग सेना को क्षीण कर दिया — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक ९ ॥
दिव्य नृत्य-रास में रमने वाली
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते।
कृतकुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते॥
Sura-Lalana Tatatheyi Tatheyi Kritabhinayodara Nritya-Rate | Krita Kukuthah Kukutho Gadadaadika-Tala Kutuhala Gana-Rate
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिनके महारण की ताल पर देवांगनाएँ तथेयि-तथेयि की लय में नृत्य करती हैं — जिनकी विजय के उत्साह में कु-कुथः और गड-दाद के तालों पर संगीत गाया जाता है — जिनके पराक्रम के साथ मृदंग की धुध-कुट, धिम-धिम ध्वनि गूँजती है — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १० ॥
शिव के अर्धांग में विराजमान
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते।
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते॥
Jaya Jaya Japya Jaye-Jaya-Shabda Para-Stuti Tatpara-Vishva-Nute | Jhana-Jhana-Jhinjhimi Jhinkrita Nupura-Shinjita-Mohita Bhuta-Pate
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
समस्त विश्व जिनकी "जय-जय" की स्तुति में तत्पर है — जिनके नूपुर की झण-झण ध्वनि भूतपति शिव को मोहित करती है — जो शिव के अर्धांग में नटी बनकर विराजमान हैं, जहाँ नर और नारी एकरूप हैं — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक ११ ॥
सुंदर मन और रूप की स्वामिनी
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते।
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते॥
Ayi Sumanah-Sumanah-Sumanah Sumanah-Sumanohara-Kanti-Yute | Shrita-Rajani Rajani-Rajani Rajani-Rajani Kara-Vaktra-Vrite
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे सुंदर मन वाली! जिनका रूप सुंदर फूलों की भाँति है — जिनका मुख चंद्रमा की चाँदनी को भी मात करता है — जिनके नयन भ्रमर की सुंदरता को जीत लेते हैं — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १२ ॥
चमेली-सी कोमल योद्धाओं की स्वामिनी
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते।
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते॥
Sahita-Mahahava Malla-Matallika Mallita-Rallaka Malla-Rate | Virachita-Vallika Pallika-Mallika Jhillika-Bhillika Varga-Vrite
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जो महायुद्ध में श्रेष्ठ योद्धाओं के विरुद्ध चमेली-सी कोमल किन्तु वीर बालाओं से घिरी हैं — जो भील जनजाति की कोमल लताओं जैसी युवतियों के समूह से युक्त हैं — जिनके मुखमण्डल पर अरुणोदय की भाँति प्रफुल्लित मुस्कान है — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १३ ॥
गालों पर चाँद की चमक वाली
अविरलगण्ड गलन्मदमेद उरं घनगन्धघुरा घुरते।
मदगजराज परिक्षित मत्त परिघातकरालिक हालिकते॥
Avirala-Ganda Galanmada-Meda Uram-Ghana-Gandha-Ghura Ghurate | Mada-Gaja-Raja Parikshita-Matta Paragha-Takaralika Halikate
जनरञ्जिनि जनविभ्रमकारिणि जनविमोहिनि जानकिते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिनके गालों से अनवरत मद बहता है, जो सुगंधित हैं, जो मतवाले गजराज के समान प्रतापशाली हैं — जो जनसमूह को आनंद देती हैं, भ्रमित करती हैं और मोहित करती हैं — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १४ ॥
कमल-नयनी, असुरमर्दिनी
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते।
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले॥
Kamala-Dalamala Komala-Kanti Kala-Kalitamala Bhala-Late | Sakala-Vilasa Kala-Nilayak-Rama Keli-Chalatkala Hamsa-Kule
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
कमल की पंखुड़ियों जैसे कोमल और उज्ज्वल कान्तिवाली — ललाट पर कला से अलंकृत — समस्त कलाओं की निलय और क्रीड़ा में चलते हंसों के समूह से युक्त — नीले कमलों के मण्डल में भ्रमर-कुल से सुशोभित — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १५ ॥
मुरली-नाद से भुवन मोहिनी
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते।
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते॥
Kara-Murali-Rava Vijita-Kujita Lajjita-Kokila Manju-Mate | Milita-Pulinda Manohara-Gunjita Ranjita-Shaila Nikunja-Gate
निजगुणभूत महाशबरीगण रम्यरमाण निरञ्जनते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिनकी हाथ की मुरली की ध्वनि से कोयल भी लज्जित हो जाती है — जो पर्वतीय निकुञ्जों में भील-समूह की मनोहर गुंजन से सुशोभित हैं — जिनके गुण महाशबरी गण को रमणीय लगते हैं — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १६ ॥
पीताम्बर धारिणी, सिंहवाहिनी
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयूखतिरस्कृत चन्द्ररुचे।
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे॥
Katitata-Pita Dukula-Vichitra Mayukha-Tiraskrita Chandra-Ruche | Pranata-Surasura Mauli-Mani-Sphura Damshula-Sannakha Chandra-Ruche
जितकनकाचल मौलिपदोर्जित निर्जितकुञ्जर कुञ्जरभुजे।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
कमर पर पीत दुकूल धारण की है जिसकी चमक चंद्रमा को भी मात करती है — प्रणाम करते देव-असुरों के मुकुट-मणि की प्रभा से जिनके नाखून चंद्रमा-सी शोभा पाते हैं — स्वर्ण पर्वत शिखर से भी श्रेष्ठ — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १७ ॥
सहस्र-नेत्रों वाले सूर्य को जीतने वाली
विजितसहस्रकराइक सहस्रकर एककरैककरे।
कृतसुरतारकसङ्गरतारक सङ्गरतारकसूनुसुते॥
Vijita-Sahasra-Karaika Sahasra-Kara Eka-Karaika-Kare | Krita-Sura-Taraka-Sangara-Taraka Sangara-Taraka-Sunu-Sute
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिन्होंने एक हाथ से हजार-हाथों वाले सूर्य को जीत लिया — जिन्होंने देव-सेनापति तारकासुर के विरुद्ध युद्ध में अपने पुत्र कार्तिकेय को विजय दिलाई — जो समाधि में रत रहने वाले सुरथ के समान ध्यान में लीन हैं — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १८ ॥
चरण-कमल में आश्रय देने वाली
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे।
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्॥
Pada-Kamalam Karunaa-Nilaye Varivasyati Yo-Anudionam Sushive | Ayi Kamale Kamala-Nilaye Kamala-Nilayah Sa Katham Na Bhavet
तव पदमेव परं पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे कल्याणकारी! जो प्रतिदिन करुणा की सागर आपके चरण-कमलों की सेवा करता है — हे लक्ष्मी निलया! वह कमल के समान पवित्र क्यों नहीं हो जाएगा? हे शिवे! आपका चरण ही परम पद है — इसका अनुशीलन करने वाले को क्या प्राप्त नहीं होगा? — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक १९ ॥
सुवर्ण-कांति वाली देवी
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुण रङ्गभुवम्।
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम्॥
Kanaka-Lasat-Kala-Sindhu-Jalai-Anushinchhati Te-Guna Ranga-Bhuvam | Bhajati Sa Kim Na Shachi-Kucha-Kumbha-Tati-Parirambha-Sukha-Anubhavam
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवे।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जो आपके गुण-गान रूपी सुवर्ण-जल से अपने मन को सींचता है — क्या वह इंद्र की शची के आलिंगन-सुख को नहीं प्राप्त करेगा? हे शिवे! देवताओं की वाणी से वंदित आपके चरणों की मैं शरण लेता हूँ — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक २० ॥
चंद्र-वंश की दीपिका
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते।
किमु पुरुहूत पुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते॥
Tava Vimala-Indu-Kulam Vadana-Indu-Malam Sakalam Nanu Kulayate | Kimu Puruhuta Puri-Indu-Mukhi Sumukhhibhirasau Vimukhik-Riyate
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
आपके उज्ज्वल चंद्रकुल-रूपी मुखमण्डल की दीप्ति से सम्पूर्ण जगत प्रकाशित होता है — क्या इंद्र की नगरी की चंद्रमुखी सुंदरियाँ भी आपसे मुख मोड़ सकती हैं? मेरा मत है कि शिव-नामधन से युक्त भवती की कृपा से क्या नहीं होता? — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि!
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॥ श्लोक २१ — अन्तिम प्रार्थना ॥
दीनों पर करुणा की वर्षा करने वाली
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे।
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते॥
Ayi Mayi Dina Dayalutaya Kripaya-Eva Tvaya Bhavitavyam-Ume | Ayi Jagato Janani Kripayasi Yathasi Tathanumitasira-Te
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे उमे! आपको मुझ दीन-हीन पर अपनी करुणा बरसानी ही होगी — हे जगत-जननी! जैसी आप हैं, उसी के अनुसार जानी-मानी आपकी कृपा होती है — जो यहाँ उचित हो, वही करें — मेरे महान दुख को दूर करें — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि! रम्यकपर्दिनि! शैलसुते!!

🌺 महिषासुरमर्दिनि — पूर्ण परिचय

महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् (Aigiri Nandini) आदि शंकराचार्य द्वारा लगभग ८१० ई. में रचित माँ दुर्गा का सबसे शक्तिशाली स्तोत्र है। इसमें कुल २१ श्लोक हैं, जिनमें प्रत्येक माँ की अलग-अलग शक्ति और विजय का वर्णन करता है। हर श्लोक का अंत "जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते" से होता है।

इस स्तोत्र में माँ दुर्गा के महिषासुर, मधु-कैटभ, धूम्रलोचन, रक्तबीज, चण्ड-मुण्ड और शुम्भ-निशुम्भ के वध का विवरण है। देवी की घोषणा है — "जहाँ प्रतिदिन महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र का गान होगा, वहाँ मैं सदा विद्यमान रहूँगी।"

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शक्ति और साहसइस स्तोत्र के नित्य पाठ से जीवन में अपार शक्ति, साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है।
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बुराई का नाशजैसे देवी ने महिषासुर का वध किया, यह मंत्र जीवन की सभी नकारात्मकताओं और बुराइयों का नाश करता है।
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नवरात्रि में विशेषनवरात्रि के नौ दिनों में प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करने से देवी की असीम कृपा प्राप्त होती है।
मोक्षदायिनीश्लोक १८-२१ में भक्त की प्रार्थना है — देवी का चरण ही परम पद है, उनकी कृपा से मोक्ष निश्चित है।
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AIGIRI NANDINI — सम्पूर्ण पाठ
21 Stanzas • Mahishasura Mardini