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✦ कालिकाष्टकम् — सम्पूर्ण ८ श्लोक ✦
ॐ क्रीं काल्यै नमः।
श्रीकालिकायै नमः॥
माँ कालिका को नमस्कार। जगदम्बा महाकाली को साष्टांग प्रणाम।
॥ श्लोक १ ॥
गलद्रक्त — काली का भयंकर रूप
गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमाला
विलोलोर्ध्वकेशी शवासाधिवासा।
विकृत्तात्तवक्त्रा महाकालकान्ता
दिगम्बा भवानी ममाभीष्टदा स्यात्॥
Galad-Rakta-Muṇḍāvalī-Kaṇṭha-Mālā Vilolōrdhva-Keśī Śavāsādhi-Vāsā | Vikṛttātta-Vaktrā Mahā-Kāla-Kāntā Digambā Bhavānī Mamābhīṣṭa-Dā Syāt
जय काली करालवदने महाकालकान्ते
जिनके कण्ठ में रक्त टपकते मुण्डों की माला है, जिनके केश ऊपर की ओर बिखरे हुए हैं, जो शव पर आसीन हैं, जिनका मुख विकराल है, महाकाल की प्रिया, दिगम्बरी भवानी — वे मेरी अभीष्ट सिद्धि करें।
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॥ श्लोक २ ॥
करवालखेटक — चतुर्भुजा काली
करवालखेटान्वितां नरमुण्डं
दधानां करे चाभयं वरदां च।
शिवोपरि संस्थां त्रिनेत्रां त्रिशूलां
भजे त्वां महाकालि नीलां नमामि॥
Karavāla-Kheṭānvitāṃ Nara-Muṇḍaṃ Dadhānāṃ Kare Cābhayaṃ Varadāṃ Ca | Śivopari Saṃsthāṃ Tri-Netrāṃ Tri-Śūlāṃ Bhaje Tvāṃ Mahākāli Nīlāṃ Namāmi
जय काली करालवदने महाकालकान्ते
जो एक हाथ में तलवार-ढाल, दूसरे में नर-मुण्ड, अभय-मुद्रा और वरद-मुद्रा धारण किए हैं — शिव के ऊपर खड़ी, त्रिनेत्रा, त्रिशूलधारिणी नीली महाकाली को मैं भजता हूँ।
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॥ श्लोक ३ ॥
ललज्जिह्व — विकराल-मुखी
ललज्जिह्वमत्युग्ररूपां महाघोरां
प्रचण्डट्टहासां महाभैरवीं त्वाम्।
सदा सर्वदुर्गाणि नाशय माता
नमस्ते नमस्ते नमस्ते कलि त्वाम्॥
Lalaj-Jihvam-Atyugra-Rūpāṃ Mahāghorāṃ Pracaṇḍa-Ṭṭa-Hāsāṃ Mahābhairavīṃ Tvām | Sadā Sarva-Durgāṇi Nāśaya Mātā Namaste Namaste Namaste Kali Tvām
जय काली करालवदने महाकालकान्ते
जिनकी जिह्वा लपलपाती है, अत्यन्त उग्र रूप, महाघोर, प्रचण्ड अट्टहास करने वाली महाभैरवी — हे माता! सदा सर्व-दुर्गों का नाश करो। तुम्हें तीन बार नमस्कार है।
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॥ श्लोक ४ ॥
श्मशानवासिनि — शिव-प्रिया
श्मशानवासिनि नमो महाकाले
प्रचण्डचण्डे जय जय प्रमाथे।
महाभयोद्भवकारिणि त्वं
महेश्वरप्रिये जगदम्बिके नमः॥
Śmaśāna-Vāsini Namo Mahākāle Pracaṇḍa-Caṇḍe Jaya Jaya Pramāthe | Mahābhayod-Bhava-Kāriṇi Tvaṃ Maheśvara-Priye Jagadambike Namaḥ
जय काली करालवदने महाकालकान्ते
हे श्मशान-वासिनी! हे महाकाले! नमस्कार। हे प्रचण्ड चण्डे! जय हो! हे प्रमाथे! महाभय उत्पन्न करने वाली, महेश्वर की प्रिया, जगदम्बिके — आपको नमस्कार।
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॥ श्लोक ५ ॥
क्रीं-बीज — साधना रूप
क्रीं क्रीं क्रीं बीजरूपे जगन्मातर्
क्रीं बीजमेव त्वं परमा प्रकृतिः।
ह्रीं ह्रीं ह्रीं शक्तिरूपे नमस्ते
महाकालि क्रीं ह्रीं स्वाहा नमामि॥
Krīṃ Krīṃ Krīṃ Bīja-Rūpe Jagan-Mātar Krīṃ Bījam-Eva Tvaṃ Paramā Prakṛtiḥ | Hrīṃ Hrīṃ Hrīṃ Śakti-Rūpe Namaste Mahākāli Krīṃ Hrīṃ Svāhā Namāmi
जय काली करालवदने महाकालकान्ते
हे जगन्माता! क्रीं-बीज रूपे — आप ही परम-प्रकृति हैं। ह्रीं-शक्ति रूपे नमस्कार। हे महाकाली! क्रीं ह्रीं स्वाहा — आपको प्रणाम।
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॥ श्लोक ६ ॥
मुक्तकेशी — तारिणी रूप
मुक्तकेशी महाचण्डी भयापहे
महादेव्यै च विद्महे शिवशक्त्यै।
तन्नः काली प्रचोदयात् सर्वदा मां
भवार्णवे तारय तारय माता॥
Mukta-Keśī Mahā-Caṇḍī Bhayāpahe Mahā-Devyai Ca Vidmahe Śiva-Śaktyai | Tannaḥ Kālī Pracodayāt Sarvadā Māṃ Bhavārṇave Tāraya Tāraya Mātā
जय काली करालवदने महाकालकान्ते
हे मुक्तकेशी! महाचण्डी! भय-हारिणी! महादेवी, शिव-शक्ति स्वरूप — काली हमें प्रेरित करें। हे माता! भवसागर से बार-बार तारण करो।
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॥ श्लोक ७ ॥
सर्वसिद्धि — वरदायिनी
सर्वसिद्धिप्रदे देवि सर्वशत्रु-
विनाशिनि जयेशानि जगन्मातः।
अणिमादिसिद्धिदे त्वं मम देवि
प्रसीद प्रसीद कृपां कुरु माता॥
Sarva-Siddhi-Prade Devi Sarva-Śatru-Vināśini Jaye'śāni Jagan-Mātaḥ | Aṇimādi-Siddhi-De Tvaṃ Mama Devi Prasīda Prasīda Kṛpāṃ Kuru Mātā
जय काली करालवदने महाकालकान्ते
हे देवी! सर्व-सिद्धि प्रदान करने वाली, सर्व-शत्रु-विनाशिनी, जगन्माता! अणिमा आदि अष्टसिद्धि देने वाली — प्रसन्न हों, प्रसन्न हों, कृपा करें हे माता।
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॥ श्लोक ८ ॥
ब्रह्मस्वरूपा — चिदानन्दमयी
त्वमेव ब्रह्म त्वमेव विष्णु-
स्त्वमेव रुद्रस्त्वमेव साक्षात्।
त्वमेव सर्वं सचराचरं च
नमामि त्वां काल्यहमादिशक्तिम्॥
Tvam-Eva Brahma Tvam-Eva Viṣṇus-Tvam-Eva Rudras-Tvam-Eva Sākṣāt | Tvam-Eva Sarvaṃ Sa-Carācaraṃ Ca Namāmi Tvāṃ Kāly-Aham-Ādi-Śaktim
जय काली करालवदने महाकालकान्ते
आप ही ब्रह्म हैं, आप ही विष्णु हैं, आप ही साक्षात् रुद्र हैं। चर-अचर सहित यह सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं। हे काली! आदिशक्ति — आपको मैं नमस्कार करता हूँ।
✦ कालिकाष्टक फल श्रुति ✦
कालिकाष्टकमिदं पुण्यं शङ्करेण विनिर्मितम्।
यः पठेत् प्रातरुत्थाय सर्वान् कामान् अवाप्नुयात्॥
सर्वदुःखपरिक्षीणो जायते नात्र संशयः।
काली प्रसन्ना भवति भक्तानां शीघ्रमेव च॥
Kālikāṣṭakam-Idaṃ Puṇyaṃ Śaṅkareṇa Vinirmitam | Yaḥ Paṭhet Prātar-Utthāya Sarvān Kāmān Avāpnuyāt
शंकराचार्य द्वारा रचित इस पवित्र कालिकाष्टकम् का जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर पाठ करता है — वह सभी इच्छाएँ प्राप्त करता है, समस्त दुःखों से मुक्त होता है, और माँ काली शीघ्र प्रसन्न होती हैं।
💀 कालिकाष्टकम् — परिचय
कालिकाष्टकम् की रचना आदि शंकराचार्य ने की है। यह तान्त्रिक परम्परा का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्तोत्र है जिसमें माँ काली के भयंकर किन्तु मङ्गलकारी रूप की स्तुति की गई है।
इस अष्टकम् में माँ काली के श्मशान-वासिनी, मुण्डमालिनी, शव पर आसीन — इन रूपों का वर्णन है जो अन्ततः चिदानन्दमयी ब्रह्मस्वरूप हैं।
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काली का अर्थ"काल" + "ई" — जो काल को भी नियन्त्रित करती हैं। अनन्त आकाश जैसा नीला रूप जो सब कुछ आत्मसात् करता है।
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मुण्डमाला५१ मुण्डों की माला — ५१ संस्कृत वर्णों का प्रतीक। काली समस्त ध्वनि और ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं।
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शव-आसन"शव" निर्गुण ब्रह्म, "शक्ति" सगुण। शक्ति के बिना शिव भी "शव" हैं — यह द्वैत-अद्वैत का रहस्य है।
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श्मशान-वासिनीश्मशान = अहंकार का अन्त। काली की उपासना अहंकार के पूर्ण विसर्जन का मार्ग है।