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✦ काली चालीसा — सम्पूर्ण पाठ ✦
श्री काली ध्यानम् — श्याम वर्ण तन काली की, मुण्डमाल गल डाल।
शव के ऊपर खड़ी हैं, महाकाल की बाल॥
ध्यान — श्याम शरीर वाली काली जिनके गले में मुण्डों की माला है, जो शव के ऊपर खड़ी हैं — वे महाकाल की प्रिया हैं।
✦ चौपाई — प्रथम भाग ✦
॥ चौपाई १ ॥
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
माँ काली की जय! माँ जगदम्बे की जय! हे शिव की प्रिया! हे जगत की माता!
॥ चौपाई २ ॥
काली काली महाकाली। भव भय हरनी कृपा वाली॥
काली, महाकाली — संसार के भय का नाश करने वाली, अत्यन्त कृपालु माता।
॥ चौपाई ३ ॥
नील वर्ण तव रूप विशाला। शीश सुशोभित मुण्डमाला॥
आपका रूप नील वर्ण विशाल है और शीश पर मुण्डमाला सुशोभित है।
॥ चौपाई ४ ॥
चार भुजा तव शोभा पाती। खड्ग त्रिशूल लिए माँ ताती॥
आपकी चार भुजाएँ अत्यन्त शोभायमान हैं जिनमें खड्ग और त्रिशूल सुशोभित हैं।
॥ चौपाई ५ ॥
नर मुण्ड धारिणि भव भामा। जग से ऊँची तेरी धामा॥
नर-मुण्ड धारण करने वाली माँ का धाम इस जगत से परे और श्रेष्ठ है।
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
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॥ चौपाई ६ ॥
शव के ऊपर खड़ी महारानी। महाकाल की शक्ति भवानी॥
शव के ऊपर खड़ी महारानी काली महाकाल की शक्ति-स्वरूपा भवानी हैं।
॥ चौपाई ७ ॥
त्रिनयनी तुम त्रिभुवन माई। अष्टभुजी महाशक्ति आई॥
त्रिनेत्रों वाली, तीनों लोकों की माता, अष्टभुजाधारिणी महाशक्ति का आगमन हुआ।
॥ चौपाई ८ ॥
लाल जिह्वा लपलपाती। घोर घोर ध्वनि गरजाती॥
जिनकी लाल जिह्वा लपलपाती है और जो घोर-घोर ध्वनि से गर्जना करती हैं।
॥ चौपाई ९ ॥
दानव दल को नाश किया। भक्त जनों को मोक्ष दिया॥
दानवों के समूह का नाश करने वाली, भक्तजनों को मोक्ष देने वाली माँ काली।
॥ चौपाई १० ॥
चण्ड मुण्ड का संहार किया। रक्तबीज को मार दिया॥
चण्ड-मुण्ड का संहार और रक्तबीज का वध करके जगत की रक्षा की।
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
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✦ चौपाई — द्वितीय भाग ✦
॥ चौपाई ११ ॥
शुम्भ निशुम्भ को मार गिराया। जग में माया जाल फैलाया॥
शुम्भ-निशुम्भ दानवों का वध करके जगत में अपनी माया फैलाई।
॥ चौपाई १२ ॥
देवों की तुमने रक्षा की। दानवों की करी परीक्षा की॥
देवताओं की रक्षा की और दानवों की शक्ति की परीक्षा करके उनका नाश किया।
॥ चौपाई १३ ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश पुकारें। काली माँ की जय जयकारें॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश सभी माँ काली की जय-जयकार करते हैं।
॥ चौपाई १४ ॥
श्मशान में तव वास है माई। तांत्रिकों की परम सहाई॥
श्मशान में आपका निवास है, तांत्रिक साधकों की परम सहायिका हैं।
॥ चौपाई १५ ॥
रामकृष्ण तेरे भक्त महाना। जिन्होंने तेरा रूप पहचाना॥
रामकृष्ण परमहंस जैसे महान भक्त थे जिन्होंने माँ काली का साक्षात् दर्शन किया।
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
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॥ चौपाई १६ ॥
दस महाविद्या में तुम अग्रा। काली रूप धरे जगदम्बा॥
दस महाविद्याओं में आप प्रथम हैं — काली रूप में जगदम्बा प्रकट हैं।
॥ चौपाई १७ ॥
कालीघाट में रूप विराजे। दक्षिणेश्वर में महिमा गाजे॥
कालीघाट में आपका दिव्य रूप विराजमान है और दक्षिणेश्वर में आपकी महिमा गूँजती है।
॥ चौपाई १८ ॥
काशी में तुम विश्वेश्वरी। भक्त की मनोकामना हरी॥
काशी में आप विश्वेश्वरी हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।
॥ चौपाई १९ ॥
सिद्धिदात्री सर्व कामनी। जन्म मृत्यु की तुम सुहागनी॥
सिद्धि देने वाली, सर्व-कामनाएँ पूर्ण करने वाली, जन्म-मृत्यु की स्वामिनी।
॥ चौपाई २० ॥
क्रोध में तुम भैरवी भारी। शान्त में तुम आनन्दकारी॥
क्रोध में आप भयंकर भैरवी हैं और शान्त होने पर आनन्द की वर्षा करने वाली।
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
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✦ चौपाई — तृतीय भाग ✦
॥ चौपाई २१ ॥
अभय मुद्रा से भय हरती। वरद हस्त से सुख भरती॥
अभय-मुद्रा से भय दूर करती हैं और वरद हस्त से सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।
॥ चौपाई २२ ॥
पाप ताप और कष्ट मिटाती। भव बन्धन से मुक्त कराती॥
पाप, ताप और कष्ट मिटाती हैं तथा भव-बन्धन से मुक्त कराती हैं।
॥ चौपाई २३ ॥
भक्त जो तुमको ध्याता है। वो तेरा आशीर्वाद पाता है॥
जो भक्त आपका ध्यान करता है उसे आपका आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है।
॥ चौपाई २४ ॥
निर्धन को तुम धन देती हो। रोगी को आरोग्य देती हो॥
निर्धनों को धन, रोगियों को स्वास्थ्य और दुखियों को सुख प्रदान करती हैं।
॥ चौपाई २५ ॥
विद्यार्थी को विद्या देती। सन्तानहीन को सन्तान देती॥
विद्यार्थियों को विद्या और सन्तानहीनों को सन्तान-सुख प्रदान करने वाली।
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
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॥ चौपाई २६ ॥
शत्रु को तुम नाश करती। प्रेत पिशाच दूर करती॥
शत्रुओं का नाश और प्रेत-पिशाच जैसी बाधाओं को दूर करने वाली।
॥ चौपाई २७ ॥
तन्त्र मन्त्र तव नाम से सिद्धे। साधक को होती सब सिद्धे॥
तंत्र-मंत्र आपके नाम से ही सिद्ध होते हैं और साधक को सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
॥ चौपाई २८ ॥
क्रीं बीज तव जाप कराया। साधक ने सब कुछ पाया॥
जो क्रीं-बीज का जाप करता है उस साधक ने सब कुछ पा लिया।
॥ चौपाई २९ ॥
अष्टमी को तव पूजन होता। भक्त का मन प्रफुल्लित होता॥
अष्टमी को आपकी पूजा होती है और भक्त का मन अत्यन्त प्रफुल्लित हो जाता है।
॥ चौपाई ३० ॥
दीपावली में काली पूजा होती। तमस हटे जग में ज्योति होती॥
दीपावली की रात काली पूजन से अन्धकार मिटता है और जगत में प्रकाश होता है।
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
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✦ चौपाई — चतुर्थ भाग ✦
॥ चौपाई ३१ ॥
बंगाल में तुम्हारी पूजा होती। महाकाली की जय-जय होती॥
बंगाल में आपकी पूजा विशेष रूप से होती है और महाकाली की जय-जयकार होती है।
॥ चौपाई ३२ ॥
सती के अंग जहाँ-जहाँ गिरे। शक्तिपीठ वहाँ-वहाँ बिखरे॥
जहाँ-जहाँ सती माँ के अंग गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए।
॥ चौपाई ३३ ॥
एकावन पीठ में काली विराजे। भक्त आएँ माँ महिमा गाजे॥
इक्यावन शक्तिपीठों में काली विराजमान हैं, भक्त आते हैं और महिमा गाते हैं।
॥ चौपाई ३४ ॥
तारापीठ में तारा स्वरूपा। भैरवी रूप में सर्व अनूपा॥
तारापीठ में तारा स्वरूप और भैरवी रूप में — आप अनुपम और अद्वितीय हैं।
॥ चौपाई ३५ ॥
जय जय जय माँ काली भारी। जग की हो तुम नाथ हमारी॥
जय-जय-जय माँ काली! आप इस जगत की और हमारी नाथ हैं।
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
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॥ चौपाई ३६ ॥
भव-सागर से पार लगाओ। मोह-माया से मुक्त कराओ॥
हे माँ! भवसागर से पार लगाओ और मोह-माया से मुक्त कराओ।
॥ चौपाई ३७ ॥
तुम्हारे चरण शरण में आया। कर अपना ले माँ दिखाया॥
आपके चरणों की शरण में आया हूँ, मुझे अपना लो माँ — यही विनती है।
॥ चौपाई ३८ ॥
पाप ताप जन्मों के हरना। माँ मेरे हृदय में तू भरना॥
जन्म-जन्मों के पाप-ताप हरो और माँ मेरे हृदय में बस जाओ।
॥ चौपाई ३९ ॥
तेरे दर से कोई न जाए खाली। जय जय माँ दक्षिण काली॥
आपके दरबार से कोई भी खाली हाथ न जाए। जय हो माँ दक्षिण काली।
॥ चौपाई ४० ॥
काली चालीसा जो नित पढ़े। माँ काली के चरणों में पड़े॥
जो नित्य काली चालीसा पढ़ता है वह माँ काली के चरणों में समर्पित हो जाता है।
जय काली जय जगदम्बे। शिव की प्रिय हे जगत की अम्बे॥
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काली चालीसा पाठ से, होती सर्व मनोकाम।
माँ की कृपा से मिलत है, मोक्ष सहित आराम॥
काली चालीसा के पाठ से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और माँ की कृपा से मोक्ष सहित सुख-शान्ति प्राप्त होती है।