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✦ शिव चालीसा — सम्पूर्ण पाठ ✦
✦ दोहा — मंगलाचरण ✦
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुख दूर करि, कीजे नाथ निहाल॥
हे गणेश, गिरिजा (पार्वती) के पुत्र — आप मंगलकारी और कृपालु हैं। दीन-दुखियों के कष्ट दूर करके उन्हें प्रसन्न कीजिए।
✦ दोहा २ ✦
जय गिरिजापति दीनदयाला।
सदा करत संतन प्रतिपाला॥
हे गिरिजापति (पार्वती के पति शिव), आप दीनों पर दया करने वाले हैं, सदा संतों की रक्षा और पालन करते हैं।
चौपाई १–२
भाल चंद्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाए। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
माथे पर चंद्रमा सुन्दर लगता है, कानों में नागफन के कुण्डल हैं। अंग गोरे हैं, शीश पर गंगा बह रही है, मुण्डमाला धारण किए और शरीर पर भस्म लगाए हुए हैं।
चौपाई ३–४
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की ह्वे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
बाघ की खाल का वस्त्र सुन्दर लग रहा है, उनकी छवि देखकर नाग का मन भी मोहित हो जाता है। मैना की प्रिय पुत्री पार्वती बाईं ओर विराजकर अनुपम छवि बना रही हैं।
चौपाई ५–६
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नंदी गणेश सोहैं तहं कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
हाथ में त्रिशूल सुन्दर लगता है जो सदा शत्रुओं का नाश करता है। नंदी और गणेश वहाँ ऐसे सुशोभित हैं जैसे सागर के बीच में कमल खिले हों।
चौपाई ७–८
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
कार्तिकेय, श्याम और गणेश की उस छवि का कोई वर्णन नहीं कर सकता। जब भी देवताओं ने पुकारा, प्रभु ने तुरंत उनके दुखों का निवारण किया।
चौपाई ९–१०
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहि जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायो। लव निमेष महं मारि गिरायो॥
तारकासुर ने भारी उपद्रव किया, तब सभी देवताओं ने मिलकर आपको प्रणाम किया। तुरंत आपने षडानन (कार्तिकेय) को भेजा जिन्होंने पल भर में उसे मार गिराया।
चौपाई ११–१२
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
आपने जलंधर असुर का संहार किया, आपकी यश-कीर्ति सारे संसार में विख्यात है। त्रिपुरासुर से युद्ध करके आपने सब पर कृपा करते हुए सबकी रक्षा की।
चौपाई १३–१४
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
भागीरथ ने भारी तपस्या की, तब पुरारि (शिव) ने उनकी प्रतिज्ञा पूर्ण की। दानियों में आपके समान कोई नहीं है — सेवक सदा आपकी स्तुति करते रहते हैं।
चौपाई १५–१६
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
वेद आपकी महिमा गाते हैं, फिर भी आप अकथनीय और अनादि हैं — आपका भेद कोई नहीं पा सका। समुद्र-मंथन में जब ज्वाला (विष) प्रकट हुई, देवता-असुर सब व्याकुल हो गए।
चौपाई १७–१८
कीन्ह दया तहं करी सहाई। नीलकंठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
वहाँ दया करके सहायता की और विष पीकर नीलकंठ नाम पाया। जब रामचंद्र ने आपकी पूजा की, तब लंका जीतकर विभीषण को दी।
चौपाई १९–२०
सहस कमल मेहं हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
राम एक हजार कमल धारण किए हुए थे, तब पुरारि ने परीक्षा ली। प्रभु ने एक कमल छिपा दिया — राम अपना कमल-नयन (नेत्र) अर्पित करने को तैयार हो गए।
चौपाई २१–२२
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घट वासी॥
प्रभु शंकर ने यह कठिन भक्ति देखकर प्रसन्न होकर मनचाहा वर दिया। जय जय जय — अनंत, अविनाशी, सब पर कृपा करने वाले और सबके हृदय में निवास करने वाले।
चौपाई २३–२४
दुष्ट सकल नित मोहि सताव। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आव॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यह अवसर मोहि आन उबारो॥
दुष्ट लोग नित्य मुझे सताते हैं, भटकते-भटकते मुझे चैन नहीं मिलता। मैं पुकार रहा हूँ — त्राहि त्राहि, हे नाथ! इस अवसर पर आकर मुझे बचा लीजिए।
चौपाई २५–२६
लाय उबारो दीन हौ भाई। करहुं कृपा अब हे मोर राई॥
लाय उबारो दीनदयाला। जो कोई जपे पावे ततकाला॥
हे भाई दीनों को उबारने वाले, अब मुझ पर कृपा कीजिए, मेरे स्वामी। हे दीनदयाला, मुझे उबारिए — जो कोई आपका जाप करे वह तत्काल फल पाता है।
चौपाई २७–२८
आसन नंद बैल पर राजे। शंकर मेरु कैलास विराजे॥
आसन नंद बैल पर बैठे। चले विचित्र वाहन सब ऐंठे॥
नंदी बैल पर विराजमान शंकर कैलाश पर्वत पर सुशोभित हैं। नंदी बैल पर बैठकर चले, सभी विचित्र वाहन उनके साथ थे।
चौपाई २९–३०
बनत बनत बन बहुत बनाई। कहे मतंग चतुरानन भाई॥
मस्त मस्त मस्त शिव सोहे। देखि रूप सब जन मन मोहे॥
वन में अनेक रूप बनाकर, ब्रह्मा ने कहा — हे भाई! मस्त, मस्त, मस्त शिव सुशोभित हैं, उनका रूप देखकर सबके मन मोहित हो जाते हैं।
चौपाई ३१–३२
चले बहुत रत्नाभूषण धारी। देखत बनत अपार सवारी॥
कहि न सकत कछु मेरी रसना। इच्छा करत सुनहुं जन मसना॥
अनेक रत्नाभूषण धारण करके वह सवारी निकली, देखते-देखते वह असंख्य हो गई। मेरी जिह्वा उनका वर्णन नहीं कर सकती — इच्छा है कि जन-जन यह सुनें।
चौपाई ३३–३४
सब गुरुजन की बड़ि है माया। जो जपे शिव सो सुख पाया॥
पार्वती गिरि सुता महारानी। सोहत सुंदर देखन मनमानी॥
सभी गुरुजनों की महान माया है — जो शिव का जाप करे वह सुख पाता है। पर्वत-पुत्री पार्वती महारानी हैं, सुन्दर रूप से मनमानी शोभा बिखेर रही हैं।
चौपाई ३५–३६
देख महेश चले मन लाई। करहुं कृपा जगत पितु माई॥
महिमा अपरम्पार की कीजे। दर्शन देहु मोहि भव तीजे॥
महेश का दर्शन मन लगाकर करते हैं — हे जगत के पिता और माता, कृपा कीजिए। आपकी महिमा असीमित है — मुझे दर्शन दीजिए, भव-सागर से पार कीजिए।
चौपाई ३७–३८
चंद्र गौर रूप छवि धारी। वाम भाग सोहत छवि भारी॥
करहुं कृपा प्रभु दीन विपाती। जो तव पद पंकज कर रहाती॥
चंद्रमा और गौर वर्ण की छवि धारण किए हुए, बायीं ओर की भारी छवि सुशोभित है। हे प्रभु, दीन और विपत्ति में पड़े उन पर कृपा कीजिए जो आपके चरण-कमलों में आश्रय लेते हैं।
चौपाई ३९–४०
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल करहु विघ्न सब त्रासन॥
योग ध्यान जो ध्यावे नित्य। ताको होत शिव पद की प्राप्ति॥
हे शंकर, संकट के नाशक — मंगल करें और सब विघ्नों को दूर करें। जो प्रतिदिन योग और ध्यान से ध्याता है, उसे शिव के पद की प्राप्ति होती है।
✦ फलश्रुति — Concluding Doha ✦
इति श्री शिव चालीसा, शिव शंकर के दास।
पाठ करे और सुने नित, होवे मंगल प्रकाश॥
यह श्री शिव चालीसा शिव शंकर के सेवकों द्वारा रचित है। जो नित्य इसका पाठ करे और सुने — उसके जीवन में मंगल और प्रकाश व्याप्त हो जाता है।