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✦ शिव कवचम् — सम्पूर्ण सर्वांग रक्षा ✦
ॐ नमो भगवते रुद्राय।
विश्वेश्वराय वेदान्तवेद्याय।
त्रिलोकनाथाय त्रिशूलपाणये।
नमः शिवाय शाश्वताय॥
Oṃ Namo Bhagavate Rudrāya | Viśveśvarāya Vedānta-Vedyāya | Triloka-Nāthāya Triśūla-Pāṇaye | Namaḥ Śivāya Śāśvatāya
ॐ — भगवान रुद्र को नमस्कार। विश्वेश्वर, वेदान्त द्वारा जाने जाने वाले, तीनों लोकों के नाथ, त्रिशूलपाणि — शाश्वत शिव को नमस्कार।
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रुद्रो मे मस्तकं पातु
ललाटं चन्द्रशेखरः।
भ्रुवौ पातु सदाशम्भुः
नेत्रे पातु त्रिलोचनः॥
Rudro me mastakam pātu | Lalāṭam candraśekharaḥ | Bhruvau pātu sadāśambhuḥ | Netre pātu trilocanaḥ
रुद्र मेरे मस्तक की रक्षा करें — चन्द्रशेखर ललाट की।
रुद्र मेरे मस्तक की रक्षा करें, चन्द्रशेखर मेरे ललाट की। सदाशम्भु भौंहों की रक्षा करें और त्रिलोचन (तीन नेत्रों वाले शिव) मेरे नेत्रों की रक्षा करें।
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॥ कवच २ ॥
👂 कर्ण • नासिका • मुख
श्रोत्रे पातु जगत्पतिः
घ्राणं पातु सुरेश्वरः।
मुखं पातु महादेवो
जिह्वां पातु महेश्वरः॥
Śrotre pātu jagatpatiḥ | Ghrāṇam pātu sureśvaraḥ | Mukham pātu mahādevo | Jihvām pātu maheśvaraḥ
जगत्पति कर्णों की रक्षा करें — सुरेश्वर नासिका की।
जगत्पति (संसार के स्वामी) मेरे कानों की रक्षा करें, सुरेश्वर नासिका की। महादेव मेरे मुख की और महेश्वर मेरी जिह्वा की रक्षा करें।
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✦ कण्ठ एवं स्कन्ध-रक्षा ✦
॥ कवच ३ ॥
🔵 कण्ठ • स्कन्ध
नीलकण्ठो गलं पातु
स्कन्धौ पातु महाभुजः।
बाहू पातु शिवः साक्षाद्
हस्तौ पातु पिनाकधृक्॥
Nīlakaṇṭho galam pātu | Skandhau pātu mahābhujaḥ | Bāhū pātu śivaḥ sākṣād | Hastau pātu pinākadhṛk
नीलकंठ मेरे गले की रक्षा करें — महाभुज स्कन्धों की।
नीलकंठ (विष धारण करने वाले) मेरे कण्ठ की रक्षा करें, महाभुज (विशाल भुजाओं वाले) स्कन्धों की। साक्षात् शिव भुजाओं की और पिनाकधृक (पिनाक-धनुषधारी) मेरे हाथों की रक्षा करें।
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वक्षः पातु वृषाङ्कः मे
हृदयं पातु शंकरः।
पार्श्वौ पातु जगद्वन्द्यो
नाभिं पातु विश्वेश्वरः॥
Vakṣaḥ pātu vṛṣāṅkaḥ me | Hṛdayam pātu śaṃkaraḥ | Pārśvau pātu jagadvandyo | Nābhim pātu viśveśvaraḥ
वृषाङ्क मेरे वक्ष की रक्षा करें — शंकर हृदय की।
वृषाङ्क (वृषभ-चिह्नधारी) मेरे वक्ष की रक्षा करें, शंकर हृदय की। जगद्वन्द्य (जगत् द्वारा वंदित) दोनों पार्श्वों की और विश्वेश्वर नाभि की रक्षा करें।
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पृष्ठं पातु महेशानो
कटिं पातु कपर्द्दिनः।
गुह्यं पातु पशुपतिः
सक्थिनी पातु भैरवः॥
Pṛṣṭham pātu maheśāno | Kaṭim pātu kapardinaḥ | Guhyam pātu paśupatiḥ | Sakthinī pātu bhairavaḥ
महेशान पृष्ठ की रक्षा करें — कपर्दी कटि की।
महेशान (महान् ईश्वर) मेरी पीठ की रक्षा करें, कपर्दी (जटाधारी) कमर की। पशुपति गुप्त अंगों की और भैरव जाँघों की रक्षा करें।
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॥ कवच ६ ॥
🦵 जानु • जंघा • चरण
जानुनी पातु दिगम्बरो
जङ्घे पातु वृषध्वजः।
गुल्फौ पातु गिरीशो मे
पादौ पातु पुरान्तकः॥
Jānunī pātu digambaro | Jaṅghe pātu vṛṣadhvajaḥ | Gulphau pātu girīśo me | Pādau pātu purāntakaḥ
दिगम्बर घुटनों की रक्षा करें — वृषध्वज जंघाओं की।
दिगम्बर (आकाश-वस्त्रधारी) मेरे घुटनों की रक्षा करें, वृषध्वज (नंदी-ध्वज वाले) जंघाओं की। गिरीश (पर्वत-राज) टखनों की और पुरान्तक (त्रिपुर-नाशक) मेरे चरणों की रक्षा करें।
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प्राच्यां पातु भवः सर्वान्
आग्नेय्यां पातु भर्गवः।
याम्यां पातु महाकालो
नैर्ऋत्यां पातु शूलभृत्॥
Prācyāṃ pātu bhavaḥ sarvān | Āgneyy āṃ pātu bhārgavaḥ | Yāmyāṃ pātu mahākālo | Nairṛtyāṃ pātu śūlabhṛt
पूर्व में भव रक्षा करें — आग्नेय में भार्गव।
पूर्व दिशा में भव (शिव का एक नाम) सबकी रक्षा करें, आग्नेय में भार्गव (भृगु-वंशज)। दक्षिण में महाकाल और नैर्ऋत्य में शूलधारी शिव रक्षा करें।
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॥ कवच ८ ॥
🧭 वायव्य • उत्तर • ईशान
वारुण्यां पातु वरुणो
वायव्यां मारुताशनः।
उदीच्यां पातु सोमेशो
ईशान्यां पातु ईश्वरः॥
Vāruṇyāṃ pātu varuṇo | Vāyavyāṃ mārutāśanaḥ | Udīcyāṃ pātu someśo | Īśānyāṃ pātu īśvaraḥ
वरुण पश्चिम की रक्षा करें — मारुताशन वायव्य की।
पश्चिम में वरुण रक्षा करें, वायव्य में मारुताशन (वायु-भक्षक सर्प)। उत्तर में सोमेश (चन्द्र के ईश) और ईशान कोण में ईश्वर (शिव) रक्षा करें।
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✦ सर्वांग एवं सर्वकाल-रक्षा ✦
॥ कवच ९ ॥
☀️ दिन • रात • सर्वकाल
अहं पातु विरूपाक्षो
रात्रौ पातु स्वयम्प्रभः।
संध्ययोः पातु शर्वश्च
सर्वदा पातु शङ्करः॥
Ahaṃ pātu virūpākṣo | Rātrau pātu svayamprabhaḥ | Sandhyayoḥ pātu śarvaśca | Sarvadā pātu śaṅkaraḥ
दिन में विरूपाक्ष रक्षा करें — रात्रि में स्वयम्प्रभ।
दिन में विरूपाक्ष (विचित्र नेत्रों वाले शिव) रक्षा करें, रात्रि में स्वयम्प्रभ (स्वतः प्रकाशित)। दोनों संध्याओं में शर्व (शिव का नाम) और सर्वदा शंकर रक्षा करें।
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॥ कवच १० ॥
🛡️ मार्ग • स्वप्न • संकट
मार्गे पातु महेशानः
स्वप्ने पातु उमापतिः।
आपद्भ्यः पातु त्रिपुरारिः
मृत्योः पातु वृषध्वजः॥
Mārge pātu maheśānaḥ | Svapne pātu umāpatiḥ | Āpadbhyaḥ pātu tripurāriḥ | Mṛtyoḥ pātu vṛṣadhvajaḥ
मार्ग में महेशान रक्षा करें — स्वप्न में उमापति।
मार्ग चलते समय महेशान रक्षा करें, स्वप्न में उमापति (पार्वती के पति)। आपदाओं से त्रिपुरारि और मृत्यु से वृषध्वज रक्षा करें।
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॥ कवच ११ ॥
✨ सर्वांग • सर्वत्र
सर्वांगं मे सदाशिवः
पातु पातु जगत्पतिः।
ओंकाररूपो भगवान्
सर्वत्रात्मा सनातनः॥
Sarvāṅgaṃ me sadāśivaḥ | Pātu pātu jagatpatiḥ | Oṃkārarūpo bhagavān | Sarvatrātmā sanātanaḥ
सदाशिव मेरे सर्वांग की रक्षा करें — जगत्पति सर्वत्र।
सदाशिव मेरे सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करें, जगत्पति सर्वत्र रक्षा करें। ओंकार-स्वरूप भगवान — सर्वत्र आत्मा के रूप में विराजमान सनातन शिव — सदा रक्षा करें।
✦ फलश्रुति — कवच का फल ✦
इदं शिवस्य कवचं पठेद्यः प्रयतः शुचिः।
तस्य सर्वभयं नश्येत् सर्वविघ्नाश्च दारुणाः॥
वज्रसारमिदं ज्ञेयं शिवस्य कवचं परम्।
येन जप्तेन नश्यन्ति सर्वशत्रुभयादिकाः॥
Idaṃ śivasya kavacam paṭhed yaḥ prayataḥ śuciḥ | Tasya sarvabhayam naśyet sarvatvighnāśca dāruṇāḥ | Vajrasāram idaṃ jñeyaṃ śivasya kavacam param | Yena japtena naśyanti sarvaśatrubhayādikāḥ
जो भी शुद्ध चित्त और संयम से इस शिव-कवच का पाठ करता है, उसके समस्त भय और दारुण विघ्न नष्ट हो जाते हैं। यह शिव-कवच वज्र-सार (वज्र जैसा दृढ़ और अभेद्य) है — इसके जप से समस्त शत्रु-भय आदि विनष्ट होते हैं।
🛡️ शिव कवचम् — अभेद्य दिव्य रक्षा
"कवच" का अर्थ है — कवच, ढाल, सुरक्षा-चक्र। शिव कवचम् में शिव के विभिन्न नामों और रूपों को शरीर के विशिष्ट अंगों, दिशाओं और कालों का रक्षक नियुक्त किया गया है। यह एक प्रकार की दिव्य कल्पना है जिसमें उपासक अपने चारों ओर शिव-शक्ति की अदृश्य सुरक्षा-दीवार खड़ी करता है।
कवच परम्परा अत्यंत प्राचीन है — ऋग्वेद के रुद्र-सूक्त से लेकर तंत्र-शास्त्र तक यह अविच्छिन्न रूप से चली आई है। "वज्रसारमिदं" — यह कवच वज्र के समान दृढ़ है, कोई शत्रु या विघ्न इसे भेद नहीं सकता।
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मस्तक — रुद्ररुद्र सबसे पहले मस्तक की रक्षा करते हैं — क्योंकि मस्तक में बुद्धि और आत्म-ज्ञान का निवास है। रुद्र ही रोग और शत्रु को रुलाते हैं।
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कण्ठ — नीलकंठनीलकंठ ने स्वयं विष-पान किया — इसलिए वे कण्ठ के सर्वश्रेष्ठ रक्षक हैं। विष, रोग और शत्रु के आक्रमण से कण्ठ सुरक्षित रहता है।
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दिशा-रक्षाआठों दिशाओं में शिव के विभिन्न रूप रक्षक हैं — यह वैदिक दिक्पाल परम्परा का शैव स्वरूप है। किसी भी दिशा से आने वाला संकट रोका जाता है।
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वज्रसार कवचफलश्रुति में "वज्रसार" कहा गया — अर्थात् यह कवच वज्र की तरह अभेद्य है। शत्रु, भय, विघ्न, मृत्यु-भय — सब इसके सामने असमर्थ हो जाते हैं।