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✦ रावण-विरचितम् • Composed by Ravana ✦

Shiva Tandava Stotram

शिव ताण्डव स्तोत्रम्
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महाराज रावण द्वारा कैलाश के नीचे दबे हुए क्षण में रचित — शिव के महाताण्डव का अद्वितीय वर्णन। ब्रह्माण्ड की लय, महाकाल का नृत्य।

रचयिता : लंकेश्वर रावण • ताण्डव मेटर • १७ श्लोक
डमड् डमड् डमड् डमड्…
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले🔱 डमड्डमड्डमड्डम निनादवड्डमर्वयम्🔱 चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्🔱 हर हर महादेव🔱 कदा सदाशिवं भजे🔱 जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले🔱 डमड्डमड्डमड्डम निनादवड्डमर्वयम्🔱 चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्🔱 हर हर महादेव🔱 कदा सदाशिवं भजे🔱
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✦ शिव ताण्डव स्तोत्रम् — सम्पूर्ण १७ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
जटा में गंगा, गले में नाग-माला
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
Jaṭāṭavī-galajjala-pravāha-pāvita-sthale | Gale'valambya lambitāṃ bhujaṅga-tuṅga-mālikām | Ḍamaḍ-ḍamaḍ-ḍamaḍ-ḍaman-nināda-vaḍḍamarvayaṃ | Cakāra caṇḍa-tāṇḍavaṃ tanotu naḥ śivaḥ śivam
जिनकी जटाओं के वन से गिरती गंगाजल की धारा से कंठ पवित्र है, जिनके गले में ऊँची नाग-माला लटकती है — डमड् डमड् डमड् डमड् की ध्वनि से डमरू बजाते हुए जिन्होंने चण्ड-ताण्डव किया — वे शिव हमें शिवत्व (कल्याण) प्रदान करें।
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॥ श्लोक २ ॥
ललाट-अग्नि से दिशाएँ प्रज्वलित
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्जलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
Jaṭā-kaṭāha-sambhrama-bhraman-nilimpa-nirjharī | Vilola-vīci-vallarī-virājamāna-mūrdhani | Dhagad-dhagad-dhagaj-jalal-lalāṭa-paṭṭa-pāvake | Kiśora-candra-śekhare ratiḥ pratiṣaṇaṃ mama
जिनके जटाओं के घड़े में घूमती देव-नदी की चंचल तरंगें मस्तक पर विराजती हैं — धगद् धगद् धगद् करती ललाट-पट्टिका की अग्नि में — बाल-चंद्र के शेखर वाले शिव में मेरी रति (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ती रहे।
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॥ श्लोक ३ ॥
कंठ में हलाहल, कभी-कभी शिव का भजन करूँगा
धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबान्धव-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
Dharā-dharendra-nandinī-vilāsa-bandhu-bāndhava | Sphurad-diganta-santati-pramoda-māna-mānase | Kṛpā-kaṭākṣa-dhoraṇī-niruddha-durdhara-āpadi | Kvacid-digambare mano vinodametu vastuni
पर्वत-राज की पुत्री पार्वती के विलास के परम बन्धु — जिनका मन दिशाओं के प्रसार से प्रमुदित है, जो कृपा-कटाक्ष की धारा से दुर्धर विपत्तियों को रोकते हैं — उन दिगम्बर शिव में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।
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॥ श्लोक ४ ॥
नाग-कुण्डल, भस्म-शरीर
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
Jaṭā-bhujaṅga-piṅgala-sphurat-phaṇā-maṇi-prabhā | Kadamba-kuṅkuma-drava-praliptā-dig-vadhū-mukhe | Madāndha-sindhura-sphurattva-guttarīya-medure | Mano vinodamadbhutaṃ bibhartu bhūta-bhartari
जटाओं में लिपटे पीले सर्प के फन की मणि की चमक से जिन्होंने कुंकुम-द्रव की भाँति दिशाओं के मुख को रंग दिया है — मत्त हाथी की खाल को उत्तरीय बनाने वाले — उन भूतपति शिव में मेरे मन को अद्भुत विनोद मिले।
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॥ श्लोक ५ ॥
कामदेव को भस्म करने वाले
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक-
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥
Sahasra-locana-prabhṛtya-śeṣa-lekha-śekhara | Prasūna-dhūli-dhoraṇī-vidhūsara-aṅghri-pīṭha-bhūḥ | Bhujaṅga-rāja-mālayā nibaddha-jāṭa-jūṭakaḥ | Śriyai cirāya jāyatāṃ cakora-bandhu-śekharaḥ
इंद्र और समस्त देवताओं के मुकुट की फूल-धूलि से जिनके पाद-पीठ पर धूसरता छाई है — नागराज की माला से जटाजूट बांधे हुए — चकोर के मित्र (चंद्रमा) को शिरोभूषण बनाने वाले शिव चिरकाल तक मुझे संपत्ति प्रदान करें।
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॥ श्लोक ६ ॥
विष-कंठ, त्रिनेत्र, त्रिशूलधारी
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः॥
Lalāṭa-catvara-jvalad-dhanañjaya-sphuliṅga-bhā | Nipīta-pañca-sāyakaṃ naman-nilimpa-nāyakam | Sudhā-mayūkha-lekhayā virājamāna-śekharaṃ | Mahā-kapāli-sampade-śiro-jaṭālam-astu naḥ
ललाट के चत्वर में जलती अग्नि की चिनगारियों से कामदेव को भस्म करने वाले, देव-नायकों को नमाने वाले — अमृत-किरणों की रेखा (चंद्रमा) से मस्तक पर विराजमान — महा-कपाली शिव की जटा हमें संपत्ति प्रदान करे।
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॥ श्लोक ७ ॥
कदा सदाशिवं भजे — रावण की प्रार्थना
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
Karāla-bhāla-paṭṭikā-dhagad-dhagad-dhagaj-jalad | Dhanañjaya-āhutī-kṛta-pracaṇḍa-pañca-sāyake | Dharā-dharendra-nandinī-kuca-agra-citra-patraka | Prakalpa-naika-śilpini tri-locane ratir-mama
भयंकर ललाट-पट्टिका की धगद्-धगद् जलती अग्नि में कामदेव को आहुति देने वाले — पर्वत-पुत्री पार्वती के उर पर चित्र-पत्र बनाने में एकमात्र शिल्पी — उन त्रिनेत्र शिव में मेरी रति (प्रेम) है।
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॥ श्लोक ८ ॥
नवीन मेघ जैसी कांति वाले
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥
Navīna-megha-maṇḍalī-niruddha-durdhara-sphurat | Kuhū-niśīthinī-tamaḥ-prabandha-baddha-kandharaḥ | Nilimpa-nirjharī-dharas-tanotu kṛtti-sindhurakha | Kalā-nidhāna-bandhuraḥ śriyaṃ jagad-dhurandharaḥ
नए मेघ-मंडल की घटा जैसे अमावस की रात के घने अंधकार से जिनका कंठ बंधा हुआ है — देवनदी गंगाधर, व्याघ्रचर्मधारी — कलाओं के निधान से सुशोभित, जगत का बोझ वहन करने वाले शिव हमें संपत्ति प्रदान करें।
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॥ श्लोक ९ ॥
सर्वत्र समभाव रखकर सदाशिव का भजन
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥
Praphulla-nīla-paṅkaja-prapañca-kālima-prabhā | Valambī-kaṇṭha-kandalī-ruci-prabaddha-kandharam | Smara-cchidaṃ pura-cchidaṃ bhava-cchidaṃ makha-cchidaṃ | Gaja-cchidāndha-ka-cchidaṃ tam-anta-ka-cchidaṃ bhaje
खिले नीले कमल की गहरी श्यामलता की प्रभा से लटकती गले की कंदली (केले की तरह) की शोभा से बंधे हुए — कामदेव के नाशक, त्रिपुर के नाशक, संसार के नाशक, यज्ञ के नाशक — गज के नाशक, अंधकासुर के नाशक, यमराज के नाशक — उन शिव को भजता हूँ।
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॥ श्लोक १० ॥
अखिल विश्व के आदि-अन्त
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥
Akharva-sarva-maṅgalā-kalā-kadamba-mañjarī | Rasa-pravāha-mādhurī-vijṛmbhaṇā-madhu-vratam | Smara-antakaṃ purā-antakaṃ bhava-antakaṃ makha-antakaṃ | Gajānta-kāndhaka-antakaṃ tam-anta-kāntakaṃ bhaje
अखिल मंगल कलाओं के कदम्ब-मंजरी के रस-प्रवाह की मधुरता में भ्रमर की भाँति रमने वाले — काम के अंत करने वाले, पुर के अंत करने वाले, संसार के अंत करने वाले, यज्ञ के अंत करने वाले — गज, अंधक और यमराज के अंत करने वाले — उन शिव को भजता हूँ।
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॥ श्लोक ११ ॥
जगत-नाशक और कल्याणकर्ता
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गलं
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥
Jayatva-dabbhra-vibhrama-bhramad-bhujaṅgama-śvasa | Dvinirgamat-krama-sphurat-karāla-bhāla-havya-vāṭ | Dhimid-dhimid-dhimidhvanan-mṛdaṅga-tuṅga-maṅgalaṃ | Dhvani-krama-pravartita-pracaṇḍa-tāṇḍavaḥ śivaḥ
आकाश में घूमते सर्प की श्वास से धधकती ललाट-अग्नि वाले — धिमिद् धिमिद् धिमिद् की गूँजती मंगलकारी मृदंग की ताल पर — प्रचण्ड ताण्डव करते शिव की जय हो।
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॥ श्लोक १२ ॥
पत्थर-सोना समान देखने वाले
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे॥
Dṛṣad-vicitra-talpayoḥ bhujaṅga-mauktika-srajor | Gariṣṭha-ratna-loṣṭhayoḥ suhṛd-vipakṣa-pakṣayoḥ | Tṛṣṇā-aravinda-cakṣuṣoḥ prajā-mahī-mahendra-yoḥ | Samaṃ pravartayan-manaḥ kadā sadāśivaṃ bhaje
विचित्र शय्या और साधारण भूमि में, नाग-माला और मोती-माला में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, तृष्णा और कमल-नयन में, प्रजा और राजा में — समान भाव रखते हुए मेरा मन कब सदाशिव का भजन करेगा?
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॥ श्लोक १३ ॥
अरण्य में रहने वाले वैराग्यमूर्ति
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्॥
Kadā nilimpa-nirjharī-nikuñja-koṭare vasan | Vimukta-durmatiḥ sadā śiraḥ-stha-mañjaliṃ vahan | Vimukta-lola-locano lalāma-bhāla-lagnakaḥ | Śiveti mantra-muccaran kadā sukhī bhavāmyaham
कब देव-नदी के निकुंज-कोटर में निवास करते हुए, दुर्बुद्धि से मुक्त होकर, सदा सिर पर अञ्जलि उठाए — चंचल नेत्रों से मुक्त, सुंदर ललाट पर ध्यान लगाते हुए — "शिव" मंत्र का उच्चारण करते हुए मैं सुखी होऊँगा?
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॥ श्लोक १४ ॥
निर्वाण की प्राप्ति के लिए प्रार्थना
निलिम्पनाथनागरी कदम्बमौलिमल्लिका-
निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहर्निशं
परिश्रयप्रदेशमन्तरं च सन्निधत्तु नः॥
Nilimpa-nātha-nāgarī-kadamba-mauli-mallikā | Nigumpha-nirbhara-kṣaran-madhūṣṇikā-manoharaḥ | Tanotu no mano-mudaṃ vinodiniṃ mahārniśaṃ | Pariśraya-pradeśam-antaraṃ ca sannidhatttu naḥ
देव-नगरी की कदम्ब-माला की कलियों के गुच्छों से टपकते मधु की सुगंध से मनोहर — हमारे मन को दिन-रात आनंद और विनोद प्रदान करें — और हमें अपने शरण-स्थल के निकट रखें।
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॥ श्लोक १५ ॥
शिव में ही आश्रय — अंतिम याचना
प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूतजल्पना।
विमुक्तवाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायते॥
Pracaṇḍa-vāḍava-anala-prabhā-śubha-pracāraṇī | Mahāṣṭa-siddhi-kāminī janā-vahūta-jalpanā | Vimukta-vāma-locano vivāha-kālika-dhvaniḥ | Śiveti mantra-bhūṣago jagaj-jayāya jāyate
प्रचण्ड वडवाग्नि की प्रभा की भाँति शुभ संचार करने वाले — महाअष्ट-सिद्धियों की कामना करने वालों को बुलाने में निपुण — मुक्त वामनेत्र और विवाह-काल की ध्वनि — शिव के मंत्र से सुशोभित होने वाले जगत की जय के लिए प्रकट हैं।
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॥ श्लोक १६ — फलश्रुति ॥
पाठ-फल — इस स्तोत्र के जप का फल
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥
Imaṃ hi nityam-evam-uktam-uttamottamaṃ stavaṃ | Paṭhan-smaran-bruvan-naro viśuddhi-meti-santataṃ | Hare gurau subhaktim-āśu yāti nānvathā gatiṃ | Vimohanaṃ hi dehināṃ suśaṅkarasya cintanam
इस उत्तम से उत्तम स्तोत्र को जो नित्य पढ़ता, स्मरण करता और बोलता है — वह निरंतर पवित्र होता रहता है। हरि-गुरु में उसकी शीघ्र सच्ची भक्ति होती है, अन्य कोई गति नहीं होती। शंकर का चिंतन प्राणियों के मोह का नाश करता है।
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॥ श्लोक १७ — फलश्रुति ॥
प्रदोष-काल में पाठ का विशेष फल
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥
Pūjā-avasāna-samaye daśa-vaktra-gītaṃ | Yaḥ śambhu-pūjana-paraṃ paṭhati pradoṣe | Tasya sthirāṃ ratha-gajendra-turaṅga-yuktāṃ | Lakṣmīṃ sadaiva sumukhīṃ pradadāti śambhuḥ
पूजा की समाप्ति पर प्रदोष-काल (सूर्यास्त के डेढ़ घंटे के भीतर) में जो दशमुख रावण द्वारा रचित इस शम्भु-पूजा-परायण स्तोत्र का पाठ करता है — उसे शम्भु सदा रथ, गजराज और घोड़ों सहित स्थिर लक्ष्मी और प्रसन्न मुख प्रदान करते हैं।
॥ इति श्रीदशकण्ठ-रावण-विरचितं शिव-ताण्डव-स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

🔱 शिव ताण्डव — रावण की भक्ति-कथा

शिव ताण्डव स्तोत्र की रचना लंकापति रावण ने उस क्षण की है जब उन्होंने कैलाश पर्वत को अपने बीस हाथों से उठाने का प्रयास किया। भगवान शिव ने एक पैर के अँगूठे से कैलाश को दबा दिया और रावण उसके नीचे दब गया। असहनीय पीड़ा में रावण ने एक-एक सिर काटकर वीणा की तार बनाई और इस अद्वितीय स्तोत्र की रचना की।

शिव ताण्डव स्तोत्र शिखरिणी छंद में है — इसकी तीव्र, प्रवाहमान लय स्वयं ताण्डव के वेग को प्रतिबिंबित करती है। प्रत्येक श्लोक में संस्कृत की अद्भुत ध्वनि-सुंदरता है — "डमड्डमड्", "धगद्धगद्", "धिमिद्धिमिद्" — ये ध्वनियाँ ही ब्रह्माण्ड की लय हैं।

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डमरू की लय"डमड् डमड् डमड् डमड्" — यह ध्वनि ही सृष्टि का आदि-नाद है, जिससे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई।
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अग्नि और शक्तिललाट की अग्नि से कामदेव का भस्म होना — अहंकार और वासना का नाश ही मोक्ष-मार्ग है।
प्रदोष-काल में पाठसूर्यास्त के डेढ़ घंटे के भीतर पाठ करने से शम्भु स्थिर लक्ष्मी और समृद्धि प्रदान करते हैं।
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समभाव की शिक्षाश्लोक १२ — पत्थर और सोने में, मित्र और शत्रु में, राजा और प्रजा में समान दृष्टि — यही सदाशिव की भक्ति है।
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SHIVA TANDAVA STOTRAM
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