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✦ आदि शंकराचार्य रचित ✦

Lakshmyashtakam

लक्ष्म्यष्टकम्
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जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित लक्ष्मी की यह आठ-श्लोकी स्तुति क्षीरसागर से उत्पन्न, विष्णु-वक्षस्थलनिवासिनी और परम सौभाग्य प्रदायिनी माँ लक्ष्मी का अद्भुत वर्णन है।

श्लोक
शंकर
रचयिता
संस्कृत
भाषा
शुक्रवार
पाठ दिन
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ऐश्वर्य प्राप्ति
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मोक्ष प्राप्ति
💰
धन समृद्धि
🏠
सौभाग्य वृद्धि
🌸
लक्ष्मी कृपा

✦ स्तोत्र परिचय

लक्ष्म्यष्टकम् जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित वह अपूर्व स्तोत्र है जिसमें माँ लक्ष्मी के आठ दिव्य रूपों का वर्णन है। इस स्तोत्र में लक्ष्मी को क्षीरसागर की पुत्री, विष्णु-वक्षस्थल-निवासिनी और ब्राह्मणों की प्रिया बताया गया है। यह स्तोत्र श्री विद्या परम्परा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

✦ सम्पूर्ण अष्टकम् ✦
लक्ष्म्यष्टकम् — आदि शंकराचार्य
✦ अष्ट श्लोक ✦
श्लोक ॥ १ ॥
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्ररत्नसम्भवां गौरीं विभावासवे ।
विप्रप्रियां विष्णुवक्षःस्थलस्थितां भक्त्या नमाम्यालयम् ॥
Lakshmim Kshirasamudraratna-Sambhavam Gaurim Vibhavasave |
Viprpriyam Vishnu-Vakshah-Sthala-Sthitam Bhaktya Namamy-Alayam ||
अर्थ: मैं भक्तिपूर्वक उन लक्ष्मी को प्रणाम करता हूँ जो क्षीरसमुद्र के रत्नों से उत्पन्न हुई हैं, गौरी स्वरूपा हैं, दीपक के समान प्रकाशमान हैं, ब्राह्मणों को प्रिय हैं और जो भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर विराजमान हैं।
श्लोक ॥ २ ॥
क्षीराब्धितनयां समुद्रतनयां संग्राहिणीं सम्पदाम् ।
पद्माक्षीं सुरवन्दितां विशदवर्णां सर्वप्रियां सर्वदाम् ॥
Kshiraabdhi-Tanayam Samudra-Tanayam Sangrahini Sampadam |
Padmaksim Sura-Vanditam Vishada-Varnam Sarvapriyam Sarvadaam ||
अर्थ: क्षीरसागर की पुत्री, समुद्र की कन्या, सम्पदाओं की संग्राहिणी, कमल के समान नेत्र वाली, देवताओं द्वारा वन्दित, विशद (उज्ज्वल) वर्ण वाली, सबको प्रिय और सबको देने वाली लक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक ॥ ३ ॥
पद्मासनां पद्मकराां पद्मालयां मन्दस्मिताम् ।
दिव्यां सितच्छविरचितां भूषाविभूषां हरेः प्रियाम् ॥
Padmasanam Padmakaraam Padmalayam Mandasmitam |
Divyam Sitachchhavi-Rachitam Bhusha-Vibhusham Hareh Priyam ||
अर्थ: जो कमलासन पर विराजित हैं, जिनके हाथों में कमल हैं, जिनका निवास कमल में है, जो मंद मुस्कुरा रही हैं, जो दिव्य श्वेत कान्ति से विभूषित हैं और जो भगवान हरि की प्रिया हैं — उन लक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक ॥ ४ ॥
कमलवासिनीं विष्णुपत्नीं शान्तां सनातनीम् ।
शरणागतवत्सलां जगन्मयीं माँ लक्ष्मीं श्रयाम्यहम् ॥
Kamala-Vasini Vishnu-Patnim Shantam Sanathanim |
Sharanagata-Vatsalam Jaganmayim Mam Lakshmim Shrayamy-Aham ||
अर्थ: मैं उन माँ लक्ष्मी की शरण लेता हूँ जो कमल में निवास करती हैं, विष्णु-पत्नी हैं, शांत और सनातन हैं, शरणागतों पर वात्सल्य रखती हैं और जगन्मयी हैं।
श्लोक ॥ ५ ॥
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥
Hiranya-Varnam Harinim Suvarna-Rajata-Srajam |
Chandram Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha ||
अर्थ: स्वर्णिम वर्ण वाली, हरिणी के समान सुन्दर, सोने-चाँदी की मालाओं से सुशोभित, चन्द्रमा के समान शीतल और स्वर्णमयी लक्ष्मी का मैं ध्यान करता हूँ।
श्लोक ॥ ६ ॥
धनदा धनपत्नी च धनधान्यसमृद्धिदा ।
सौभाग्यदा सौम्यरूपा महालक्ष्मि नमोस्तुते ॥
Dhanada Dhanapatni Cha Dhana-Dhanya-Samriddhida |
Saubhagyada Saumyarupa Mahalakshmi Namostute ||
अर्थ: धन देने वाली, धन की स्वामिनी, धन-धान्य-समृद्धि प्रदान करने वाली, सौभाग्य देने वाली, सौम्य रूपधारिणी महालक्ष्मी — आपको नमस्कार है।
श्लोक ॥ ७ ॥
नमस्तेऽस्तु महालक्ष्मि नमस्ते कमलालये ।
नमस्ते विष्णुपत्न्यै च नमो भगवति शुभे ॥
Namastestu Mahalakshmi Namaste Kamalaalaye |
Namaste Vishnu-Patnyai Cha Namo Bhagavati Shubhe ||
अर्थ: हे महालक्ष्मी! आपको नमस्कार। हे कमलालये! आपको नमस्कार। हे विष्णु-पत्नी! आपको नमस्कार। हे शुभ भगवती! आपको नमस्कार।
श्लोक ॥ ८ ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ॥
Sarva-Mangala-Mangalye Shive Sarvaartha-Sadhike |
Sharanye Tryambake Gauri Narayani Namostu Te ||
अर्थ: हे सभी मंगलों में श्रेष्ठ मंगल! शिवस्वरूपिणी, सभी अर्थों को साधने वाली, शरण देने वाली, त्र्यम्बके, गौरी और नारायणी — आपको नमस्कार।
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✦ फलश्रुति ✦

लक्ष्म्यष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् भक्तिमान्नरः ।
श्रिया युक्तः सुखं नित्यं राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥

जो भक्त इस पवित्र लक्ष्म्यष्टकम् का पाठ करता है, वह सदैव लक्ष्मी और सुख से युक्त रहता है और सर्वदा राज्यसुख को प्राप्त करता है।

पाठ काल
प्रातःकाल ब्राह्म मुहूर्त में या शुक्रवार की सन्ध्या को। दीपावली और लक्ष्मी पञ्चमी पर विशेष फलदायी।
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ध्यान विधि
पाठ से पूर्व माँ लक्ष्मी का ध्यान करें। कमल पर विराजित, स्वर्णिम आभा से घिरी माँ का स्वर्णिम रूप ध्यान में लाएँ।
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पूजा सामग्री
कमल पुष्प, श्वेत पुष्प, धूप, दीपक अर्पित करें। माँ को पीली वस्तुएँ और मिष्टान्न अर्पण करें।
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जप
पाठ के बाद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः का एक माला (१०८) जप करें। इससे विशेष फल प्राप्त होता है।

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