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✦ ऋग्वेद • श्री सूक्तम् ✦

Shri Suktam

श्री सूक्तम्
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ऋग्वेद के खिलानि से लिया गया सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मी स्तुति — माँ लक्ष्मी को आवाहन करने वाला यह प्राचीनतम वैदिक मंत्र धन, समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करता है।

१५
ऋचा
ऋग्वेद
स्रोत
श्रीं
बीज मंत्र
शुक्रवार
पाठ दिन
💰
धन प्राप्ति
🌺
सौभाग्य वृद्धि
🏠
गृह समृद्धि
🌟
पाप नाश
🪷
लक्ष्मी कृपा

✦ श्री सूक्तम् परिचय

श्री सूक्तम् ऋग्वेद के खिलानि में संग्रहीत माँ लक्ष्मी को समर्पित सर्वप्रथम और सर्वप्रसिद्ध वैदिक स्तुति है। इसे अग्नि देव के माध्यम से माँ लक्ष्मी का आवाहन करने के लिए रचा गया है। प्रत्येक शुक्रवार और दीपावली पर इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। इस सूक्त में माँ लक्ष्मी को हिरण्यवर्णा (स्वर्णिम रंग वाली), कमलासना (कमल पर विराजित) और समृद्धि की अधिष्ठात्री के रूप में वर्णित किया गया है।

✦ संपूर्ण पाठ ✦
श्री सूक्तम् — सम्पूर्ण
✦ प्रथम ऋचा ✦
ऋचा ॥ १ ॥
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥
Hiranya-Varnam Harinim Suvarna-Rajata-Srajam |
Chandram Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha ||
अर्थ: हे अग्निदेव! उन लक्ष्मी को मेरे पास आवाहन करो जो स्वर्णिम वर्ण वाली हैं, हरिणी के समान चपल हैं, सोने और चाँदी की मालाओं से सुशोभित हैं, चन्द्रमा के समान शीतल और स्वर्णमयी हैं।
ऋचा ॥ २ ॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥
Tam Ma Avaha Jatavedo Lakshmim-Anapagaminim |
Yasyam Hiranyam Vindeya Gam-Ashvam Purushan-Aham ||
अर्थ: हे अग्निदेव! उन लक्ष्मी को मेरे पास बुलाओ जो कभी भी जाती नहीं हैं — जिनकी कृपा से मुझे स्वर्ण, गौ, अश्व और उत्तम सेवक प्राप्त हों।
ऋचा ॥ ३ ॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥
Ashva-Purvam Ratha-Madhyam Hastinada-Prabodhinim |
Shriyam Devim-Upahvaye Shrir-Ma Devi Jushatam ||
अर्थ: मैं उस देवी श्री (लक्ष्मी) का आवाहन करता हूँ जिनके आगे घोड़े हैं, मध्य में रथ है और जिन्हें हाथियों की गर्जना जगाती है। हे देवी श्री! आप मुझ पर प्रसन्न हों।
ऋचा ॥ ४ ॥
कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥
Kam Sosmitam Hiranya-Prakaraam-Ardram Jvalantim Triptam Tarpayantim |
Padme Sthitam Padma-Varnam Tami-Hopahvaye Shriyam ||
अर्थ: मैं उस देवी श्री का आवाहन करता हूँ जो मुस्कुरा रही हैं, स्वर्णिम आभा से घिरी हैं, करुणा से सिक्त हैं, प्रकाशमान हैं, स्वयं तृप्त हैं और सबको तृप्त करती हैं, जो कमल पर विराजित हैं और कमल के वर्ण वाली हैं।
ऋचा ॥ ५ ॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये ऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥
Chandram Prabhasam Yashasa Jvalantim Shriyam Loke Deva-Jushtam-Udaram |
Tam Padminim-Im Sharanam-Aham Prapadye Alakshmirme Nashyatam Tvam Vrne ||
अर्थ: मैं उन देवी लक्ष्मी की शरण लेता हूँ जो चन्द्रमा के समान प्रकाशमान हैं, यश से प्रज्वलित हैं, देवताओं द्वारा पूजित हैं और उदार हैं। हे देवि! मेरी दरिद्रता का नाश हो, मैं आपको वरण करता हूँ।
ऋचा ॥ ६ ॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥
Aditya-Varne Tapaso-Dhijato Vanaspatistava Vrksho-Tha Bilvah |
Tasya Phalani Tapasa Nudantu Mayantarayash-Cha Bahya Alakshmih ||
अर्थ: हे सूर्य के समान कान्तिमयी देवी! आपका प्रिय वृक्ष बिल्व है, जो तपस्या से उत्पन्न हुआ है। उस वृक्ष के फल आपकी तपस्या से अलक्ष्मी (दरिद्रता) को बाहर से और भीतर से दूर करें।
ऋचा ॥ ७ ॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥
Upaitu Mam Deva-Sakhah Kirtish-Cha Manina Saha |
Pradurbhuto-Asmi Rashtre-Asmin Kirtim-Riddhim Dadatu Me ||
अर्थ: देवों के मित्र कीर्ति और मणि के साथ मेरे पास आएँ। इस राष्ट्र में मेरा प्रादुर्भाव हुआ है, मुझे यश और समृद्धि प्रदान करें।
ऋचा ॥ ८ ॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥
Kshut-Pipasa-Malam Jyestham-Alakshmim Nashayamy-Aham |
Abhutim-Asamriddhim Cha Sarvam Nirnuda Me Grahat ||
अर्थ: मैं भूख-प्यास के मैल से युक्त, ज्येष्ठा (अलक्ष्मी) का नाश करता हूँ। हे देवि! समस्त अभाव और दरिद्रता को मेरे घर से दूर करो।
ऋचा ॥ ९ ॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥
Gandha-Dvaram Duradharsham Nitya-Pushtam Karishinim |
Ishvarim Sarva-Bhutanam Tam-Iho-Pahvaye Shriyam ||
अर्थ: मैं उस देवी श्री का आवाहन करता हूँ जिनका द्वार सुगंध से युक्त है, जो अजेय हैं, जो सदा पुष्ट हैं, जिनकी कृपा गौओं के समान शुद्ध है और जो समस्त प्राणियों की ईश्वरी हैं।
ऋचा ॥ १० ॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥
Manasah Kamam-Akutim Vacah Satyam-Ashimahi |
Pashunaam Rupam-Annasya Mayi Shrih Shrayatam Yashah ||
अर्थ: हम मन की इच्छाएँ, संकल्प, वाणी की सत्यता, पशुओं की संपत्ति और अन्न की प्राप्ति करें। मुझमें लक्ष्मी और यश का वास हो।
ऋचा ॥ ११ ॥
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥
Kardamena Praja-Bhuta Mayi Sambhava Kardama |
Shriyam Vasaya Me Kule Mataram Padma-Malinim ||
अर्थ: हे कर्दम! (लक्ष्मी-पुत्र) आप मुझमें प्रकट हों। माँ श्री (लक्ष्मी) जो कमलों की माला धारण करती हैं, उन्हें मेरे वंश में स्थापित करो।
ऋचा ॥ १२ ॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥
Apah Srijantu Snigdhani Chiklit Vasa Me Grhe |
Ni Cha Devim Mataram Shriyam Vasaya Me Kule ||
अर्थ: जल स्नेहयुक्त पदार्थ उत्पन्न करे। हे चिक्लीत! मेरे घर में निवास करो। देवी माँ श्री (लक्ष्मी) को मेरे कुल में स्थापित करो।
ऋचा ॥ १३ ॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥
Ardram Pushkarinim Pushtim Pingalam Padma-Malinim |
Chandram Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha ||
अर्थ: हे अग्निदेव! उस लक्ष्मी को मेरे पास आवाहन करो जो आर्द्र (करुणामयी) हैं, कमल से युक्त हैं, पुष्टिकारी हैं, पीत वर्ण वाली हैं, कमलमाला धारण करती हैं और चन्द्रमा के समान स्वर्णिम हैं।
ऋचा ॥ १४ ॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥
Ardram Yah Karinim Yashtim Suvarnaam Hema-Malinim |
Suryam Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha ||
अर्थ: हे अग्निदेव! उस लक्ष्मी को आवाहन करो जो सदैव आर्द्र हैं, हाथी पर सवार हैं, दण्ड-धारिणी हैं, सुवर्ण-मालिनी हैं और सूर्य के समान तेजस्वी हैं।
ऋचा ॥ १५ ॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥
Tam Ma Avaha Jatavedo Lakshmim-Anapagaminim |
Yasyam Hiranyam Prabhutam Gavo Dasyo-Ashvan Vindeya Purushan-Aham ||
अर्थ: हे अग्निदेव! उन लक्ष्मी को मेरे पास बुलाओ जो कभी भी नहीं जाती हैं — जिनकी कृपा से मुझे प्रचुर स्वर्ण, गौ, दासियाँ, अश्व और उत्तम मनुष्य प्राप्त हों।
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✦ फलश्रुति ✦

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥

जो व्यक्ति पवित्र होकर प्रतिदिन घी से हवन करता है और इस पंद्रह ऋचाओं वाले सूक्त का निरंतर जप करता है, उसकी श्री (लक्ष्मी) की इच्छा पूर्ण होती है।

✦ पाठ विधि ✦
उत्तम समय
प्रातःकाल सूर्योदय पर या शुक्रवार की संध्या को। दीपावली रात्रि को पाठ सर्वोत्तम माना जाता है।
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पूजा सामग्री
घी का दीपक, लाल पुष्प, कमल, हल्दी, कुमकुम। माँ लक्ष्मी के चित्र या विग्रह के समक्ष बैठकर पाठ करें।
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जप संख्या
प्रत्येक ऋचा को ३, ७ या ११ बार जप करें। सम्पूर्ण सूक्त को एक बार नित्य पढ़ना भी अत्यंत लाभकारी है।
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संकल्प
पाठ से पूर्व संकल्प लें। मन में माँ लक्ष्मी का स्वर्णिम रूप ध्यान करते हुए श्रद्धापूर्वक पाठ करें।

✦ अन्य लक्ष्मी मंत्र एवं स्तोत्र ✦

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