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✦ श्री राम आरती — सम्पूर्ण दोनों आरतियाँ ✦
✦ आरती १ — रामलला की आरती ✦
आरती कीजे श्रीरामलला की।
पूण निपुण धनुवेद कला की॥
श्री रामलला की आरती करें — जो धनुर्वेद की कला में पूर्ण निपुण हैं।
॥ पद १-४ ॥
राम-दरबार का दृश्य
धनुष वाण कर सोहत नीके। शोभा कोटि मदन मद फीके॥
सुभग सिंहासन आप बिराजैं। वाम भाग वैदेही राजैं॥
कर जोरे रिपुहन हनुमाना। भरत लखन सेवत बिधि नाना॥
शिव अज नारद गुण गन गावैं। निगम नेति कह पार न पावैं॥
आरती कीजे श्रीरामलला की। पूण निपुण धनुवेद कला की॥
हाथ में धनुष-बाण सुशोभित हैं, करोड़ कामदेव भी उनकी शोभा के सामने फीके हैं। वे सुन्दर सिंहासन पर विराजमान हैं और वाम भाग में वैदेही (सीता) राजती हैं। हाथ जोड़े हनुमान, भरत, लक्ष्मण सेवा कर रहे हैं। शिव, ब्रह्मा, नारद गुण-गान करते हैं — वेद नेति-नेति कह पार नहीं पाते।
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॥ पद ५-१० ॥
राम की करुणा और कृपा
नाम प्रभाव सकल जग जानैं। शेष महेश गनेस बखानैं॥
भगत कामतरु पूरणकामा। दया क्षमा करुना गुण धामा॥
सुग्रीवहुँ को कपिपति कीन्हा। राज विभीषण को प्रभु दीन्हा॥
खेल खेल महु सिंधु बधाये। लोक सकल अनुपम यश छाये॥
दुर्गम गढ़ लंका पति मारे। सुर नर मुनि सबके भय टारे॥
देवन थापि सुजस विस्तारे। कोटिक दीन मलीन उधारे॥
आरती कीजे श्रीरामलला की। पूण निपुण धनुवेद कला की॥
राम के नाम का प्रभाव सम्पूर्ण जगत जानता है। शेषनाग, महेश और गणेश उनका बखान करते हैं। वे भक्तों के कल्पवृक्ष हैं, दया-क्षमा-करुणा के धाम हैं। उन्होंने सुग्रीव को वानरराज बनाया, विभीषण को राज दिया। खेल-खेल में समुद्र पर सेतु बाँधा, लंका के दुर्गम किले के पति रावण को मारकर देव-नर-मुनि के भय दूर किए।
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॥ पद ११-१५ ॥
भक्त-वात्सल्य — आरती-समापन
कपि केवट खग निसचर केरे। करि करुणा दुःख दोष निवेरे॥
देत सदा दासन्ह को माना। जगतपूज भे कपि हनुमाना॥
आरत दीन सदा सत्कारे। तिहुपुर होत राम जयकारे॥
कौसल्यादि सकल महतारी। दशरथ आदि भगत प्रभु झारी॥
सुर नर मुनि प्रभु गुण गन गाई। आरति करत बहुत सुख पाई॥
धूप दीप चन्दन नैवेदा। मन दृढ़ करि नहिं कवनउ भेदा॥
राम लला की आरती गावै। राम कृपा अभिमत फल पावै॥
राम लला की आरती गावै। राम कृपा अभिमत फल पावै॥
वानर, केवट, पक्षी और निशाचरों को भी करुणा से दुःख-दोष से मुक्त किया। दासों को सम्मान देते हैं — हनुमान जगत-पूज्य हो गए। आर्त और दीन का सदा सत्कार करते हैं — तीनों लोकों में राम की जय-जयकार। माँ कौसल्या, पिता दशरथ और सब भक्त उनकी आरती करते हैं। धूप-दीप-चन्दन-नैवेद्य से जो आरती गाता है, उसे राम की कृपा से अभीष्ट फल मिलता है।
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✦ आरती २ — श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन ✦
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन
हरण भवभय दारुणम्।
नव कंज लोचन कंज मुख
करकंज पद कंजारुणम्॥
हे मन! श्री रामचन्द्र का भजन कर जो कृपालु हैं और भवभय का नाश करने वाले हैं। जिनके नव-कमल-नेत्र, कमल-मुख, करकमल और चरण-कमल अरुण-आभा से युक्त हैं।
॥ पद १-५ ॥
राम का अलौकिक सौन्दर्य — तुलसीदास
कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट पीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि नौमि जनकसुतावरम्॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्यवंश निकन्दनम्।
रघुनन्द आनन्द कंद कोशलचन्द दशरथनन्दनम्॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणम्।
आजानुभुज शर चाप-धर संग्राम-जित खरदूषणम्॥
इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनम्।
मम हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनम्॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन। हरण भवभय दारुणम्॥
असंख्य कामदेवों से अधिक सुन्दर, नव-नील-कमल के समान सुन्दर, पीले वस्त्र बिजली-सी चमक से शुचि — ऐसे जनक-पुत्री के पति को नमस्कार। दीनबन्धु, दिनेश, दैत्यवंश-नाशक, रघुनन्द, आनन्द-कन्द, कौशलचन्द दशरथनन्दन का भजन करो। शिरोमुकुट, कुण्डल, तिलक से सुशोभित, आजानुबाहु, धनुष-बाण धारी, खरदूषण को हरानेवाले। तुलसीदास कहते हैं — हे कामादि दुष्टों के नाशक! मेरे हृदय-कमल में निवास करो।
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॥ छन्द — गौरी-आशीर्वाद ✦
सिय-वर-दर्शन
मन जाहि राच्यो मिलिहि सो वरु सहज सुन्दर साँवरो।
करुना निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो॥
एही भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हिय हरषी अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली॥
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन। हरण भवभय दारुणम्॥
माँ गौरी ने आशीर्वाद दिया — 'जिसे तेरा मन चाहता है वह सहज सुन्दर साँवला वर मिलेगा जो करुणा-निधान, सुजान, शीलवान और तुम्हारा स्नेह जानने वाला है।' यह सुनकर सीता जी सखियों सहित हृदय में हर्षित हुईं। तुलसीदास कहते हैं — भवानी की पूजा कर मन में मुदित हुए मंदिर की ओर चलीं। गौरी को अनुकूल जानकर सीता जी का हर्ष अवर्णनीय हो गया।
✦ आरती का फल ✦
राम लला की आरती गावै।
राम कृपा अभिमत फल पावै॥
धूप दीप चन्दन नैवेदा।
मन दृढ़ करि नहिं कवनउ भेदा॥
जो धूप, दीप, चन्दन और नैवेद्य सहित दृढ़ मन से राम लला की आरती गाता है, उसे राम की कृपा से अभीष्ट फल (मनचाहा वर) मिलता है। आरती में कोई भेद नहीं — भक्ति-भाव ही मुख्य है।