🐍
✦ आदि शङ्कराचार्य विरचितम् • भुजङ्गप्रयात छन्द ✦

Ram Bhujanga Stotram

श्री राम भुजङ्ग स्तोत्रम्
✦ ✦ ✦

जगद्गुरु आदि शङ्कराचार्य द्वारा रचित वेदसार — २९ श्लोक भुजङ्गप्रयात छन्द में। अद्वैत-भावना और राम-भक्ति का अपूर्व संगम। जो नित्य पाठ करे, वह स्वयं रामचन्द्र को प्राप्त होता है।

रचयिता: जगद्गुरु आदि शङ्कराचार्य • २९ श्लोक
विशुद्धं परं सच्चिदानन्दरूपं
गुणाधारमाधारहीनं वरेण्यम्॥
विशुद्धं परं सच्चिदानन्दरूपम्🐍 भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्🐍 हरे राम सीतापते रावणारे🐍 भुजङ्गप्रयातं परं वेदसारम्🐍 विशुद्धं परं सच्चिदानन्दरूपम्🐍 भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्🐍 हरे राम सीतापते रावणारे🐍 भुजङ्गप्रयातं परं वेदसारम्🐍
🐍🐍 🐍🐍
✦ श्री रामभुजङ्गस्तोत्रम् — सम्पूर्ण २९ श्लोक ✦
विशुद्धं परं सच्चिदानन्दरूपं
गुणाधारमाधारहीनं वरेण्यम्।
महान्तं विभान्तं गुहान्तं गुणान्तं
सुखान्तं स्वयं धाम रामं प्रपद्ये॥ १॥
मैं उस राम की शरण लेता हूँ जो विशुद्ध, परम, सच्चिदानन्द-स्वरूप हैं, गुणों के आश्रय हैं, फिर भी निराश्रय हैं, वरण-योग्य हैं। जो महान्, विभासमान, हृदय-गुहा में प्रकाशमान, गुणातीत, सुखातीत और स्वयं धाम-स्वरूप हैं।
॥ श्लोक २ ॥
तारकाख्य — मोक्ष-मन्त्र
शिवं नित्यमेकं विभुं तारकाख्यं
सुखाकारमाकारशून्यं सुमान्यम्।
महेशं कलेशं सुरेशं परेशं
नरेशं निरीशं महीशं प्रपद्ये॥
Śivaṃ Nityam-Ekaṃ Vibhuṃ Tārakākhyaṃ Sukhākāram-Ākāra-Śūnyaṃ Sumānyam
मैं उस राम की शरण लेता हूँ जो शिव (मंगल), नित्य, एक, विभु और तारक नाम से प्रसिद्ध हैं। जो सुख-स्वरूप हैं किन्तु आकार-शून्य भी हैं। जो महेश (महान् ईश्वर), नरेश, महीश और सबके ईश हैं।
~ 🐍 ~
॥ श्लोक ३ ॥
काशी में राम-नाम — शिव का उपदेश
यदावर्णयत्कर्णमूलेऽन्तकाले
शिवो राम रामेति रामेति काश्याम्।
तदेकं परं तारकब्रह्म रामं
भजे सच्चिदानन्दरूपं नमामि॥
Yadāvarṇayat-Karṇa-Mūle'ntakāle Śivo Rāma Rāmeti Rāmeti Kāśyām
अन्तकाल में काशी में भगवान शिव जिसके कानों में 'राम राम राम' का उपदेश देते हैं — उस एक परम तारकब्रह्म राम का भजन करता हूँ, सच्चिदानन्द-स्वरूप राम को नमन।
~ 🐍 ~
॥ श्लोक ४-१० ॥
राम-भक्त-वात्सल्य — मुक्ति-दाता
भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव रामम् अव्ययम्॥

सदा भावयामि प्रसन्नं मुखाम्भोज-माधुर्य-पीयूष-पूर्णम्।
शरत्पूर्णचन्द्र-प्रभाधारणाभ्यां जनानन्द-दानक्षमाभ्यां च युक्तम्॥

अहं रामनाम्नेव सर्वत्र याचे
स्वदेहे ध्रुवे वा पदे वा विमुक्तौ।
परं राम-रामेति वाचं चराम-
याधिकं किं वदामि स्वयं ते पुरस्तात्॥
Bhaje Viśeṣa-Sundaraṃ Samasta-Pāpa-Khaṇḍanam | Svabhakta-Citta-Rañjanaṃ Sadaiva Rāmam Avyayam
मैं उस विशेष सुन्दर, समस्त पापों के खण्डन करने वाले, अपने भक्तों के चित्त को आनन्दित करने वाले अव्यय राम का भजन करता हूँ। सदा प्रसन्नमुख, शरद्-पूर्णचन्द्र की आभा से युक्त, जनों को आनन्द देने में समर्थ राम का मैं ध्यान करता हूँ। मैं केवल राम-नाम ही माँगता हूँ — राम-राम कहते हुए जीऊँ।
~ 🐍 ~
॥ श्लोक ११-१८ ॥
भक्त-मुक्ति के उदाहरण
शिलापि त्वदङ्घ्रिक्षमासंगिरेणु-
स्पृशन्ती तरी जाहली पापभारात्।
त्वमेवासि दैवं परं मे यदेकम्
प्रसादादि चैतन्यमादत्त राम॥

नमस्ते सुमित्रासुपुत्राभिवन्द्य
नमस्ते सदा कैकेयीनन्दनेद्य।
नमस्ते सदा वानराधीशबन्धो
नमस्ते नमस्ते सदा रामचन्द्र॥
Śilāpi Tvadaṅghri-Kṣamā-Saṅgi-Reṇu-Spṛśantī Tarī Jāhalī Pāpa-Bhārāt
आपके चरण-धूलि का स्पर्श करके पत्थर (अहिल्या) भी पापभार से मुक्त हो गया। हे राम! आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं। सुमित्रा-पुत्र (लक्ष्मण) को नमन, कैकेयी-नन्दन (भरत) को नमन, वानरराज के मित्र को नमन — हे रामचन्द्र! बार-बार नमन।
~ 🐍 ~
॥ श्लोक १९-२५ ॥
प्रसीद प्रार्थना — रामचन्द्र की कृपा-याचना
प्रसीद प्रसीद प्रचण्डप्रताप
प्रसीद प्रसीद प्रचण्डारिकाल।
प्रसीद प्रसीद प्रपन्नानुकम्पिन्
प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचन्द्र॥

हरे राम सीतापते रावणारे
खरारे मुरारे असुरारे परेति।
लपन्तं नयन्तं सदा कालमेवं
समालोकयालोकय शेषबन्धो॥
Prasīda Prasīda Pracaṇḍa-Pratāpa Prasīda Prasīda Pracaṇḍāri-Kāla
हे प्रचण्ड-प्रताप वाले! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए! हे शत्रुओं के काल! प्रसन्न होइए! हे शरणागत पर अनुकम्पा करने वाले रामचन्द्र! प्रसन्न होइए। 'हरे राम सीतापते रावणारे खरारे' — इस प्रकार सदा कहते हुए, हे सेतु-बन्धक! मुझ पर कटाक्ष कीजिए।
~ 🐍 ~
॥ श्लोक २६-२९ ॥
अन्तिम श्लोक — भुजङ्गप्रयात फल
भुजङ्गप्रयातं परं वेदसारं
मुदा रामचन्द्रस्य भक्त्या च नित्यम्।
पठन्सन्ततं चिन्तयन्प्रान्तरङ्गे
स एव स्वयं रामचन्द्रः स धन्यः॥
Bhujaṅga-Prayātaṃ Paraṃ Veda-Sāraṃ Mudā Rāmacandrasya Bhaktyā Ca Nityam | Paṭhan-Santataṃ Cintayan-Prānta-Raṅge Sa Eva Svayaṃ Rāmacandraḥ Sa Dhanyaḥ
जो भुजङ्गप्रयात छन्द में रचित इस परम वेदसार को रामचन्द्र की भक्ति से आनन्दपूर्वक नित्य पढ़ता है और हृदय में सदा चिन्तन करता है — वह स्वयं रामचन्द्र बन जाता है और धन्य हो जाता है।
मुक्त भक्त
अहिल्या
चरण-स्पर्श से शाप-मुक्त
मुक्त भक्त
विभीषण
राम-शरण से लंकापति
मुक्त भक्त
सुग्रीव
राम-मैत्री से वानरराज
मुक्त भक्त
जटायु
राम-दर्शन से परम-धाम
मुक्त भक्त
रावण
राम-हस्त से वैरी-मुक्ति
मुक्त भक्त
हनुमान
राम-नाम से चिरंजीवी
✦ भुजङ्ग स्तोत्र फल ✦
भुजङ्गप्रयातं परं वेदसारं
मुदा रामचन्द्रस्य भक्त्या च नित्यम्।
पठन्सन्ततं चिन्तयन्प्रान्तरङ्गे
स एव स्वयं रामचन्द्रः स धन्यः॥
जो इस परम वेदसार स्तोत्र का नित्य पाठ और हृदय-चिन्तन करता है, वह स्वयं रामचन्द्र-स्वरूप हो जाता है और परम धन्य हो जाता है। यह स्तोत्र अद्वैत-वेदान्त का व्यावहारिक आचरण है।

🐍 रामभुजङ्ग स्तोत्र — परिचय

यह स्तोत्र जगद्गुरु आदि शङ्कराचार्य द्वारा रचित है। भुजङ्गप्रयात छन्द में रचित होने से इसे 'भुजङ्ग स्तोत्र' कहते हैं। 'भुजङ्ग' का अर्थ है — सर्प जैसी लहराती गति, जो इस छन्द की विशेषता है।

🕉️
अद्वैत + भक्तिशङ्कराचार्य ने इस स्तोत्र में अद्वैत-वेदान्त और राम-भक्ति का अद्भुत समन्वय किया है। राम सच्चिदानन्द-ब्रह्म हैं — यही स्तोत्र का केन्द्रबिन्दु है।
🐍
भुजङ्गप्रयात छन्दयह छन्द चार Y-माला (यगण) से बनता है। 'भुजङ्ग' (सर्प) की लहरदार गति जैसी ध्वनि-सुषमा इसकी विशेषता है — शङ्कर के अनेक स्तोत्र इसी छन्द में हैं।
📜
वेदसारअन्तिम श्लोक में इसे 'परं वेदसार' (वेदों का परम सार) कहा गया है। नित्य पाठ करने वाला 'स्वयं रामचन्द्र' बन जाता है।
🌿
सर्वभक्त-उद्धारस्तोत्र में दिखाया है कि राम ने वानर, निशाचर, पत्थर (अहिल्या) — सभी को मुक्त किया। कोई भेद नहीं।