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✦ श्री रामरक्षास्तोत्रम् — सम्पूर्ण ३८ श्लोक ✦
॥ विनियोगः ॥
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य। बुधकौशिक ऋषिः।
श्रीसीतारामचन्द्रो देवता। अनुष्टुप् छन्दः।
सीता शक्तिः। श्रीमद्हनुमान् कीलकम्।
श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
इस श्री रामरक्षा स्तोत्र मंत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, देवता श्री सीतारामचन्द्र हैं, छन्द अनुष्टुप् है, शक्ति सीता हैं, कीलक श्रीमान् हनुमान हैं। श्री रामचन्द्र की प्रसन्नता हेतु जप में विनियोग है।
॥ ध्यानम् ॥
राम का ध्यान — नीलोत्पल श्याम रूप
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं
बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासोवसानम्।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्-
लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तम्॥
उन श्री राम का ध्यान करें जो आजानुबाहु हैं, धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, पद्मासन में विराजमान हैं, पीत वस्त्र धारण किए हुए हैं। वाम अंक में सीता विराजमान हैं जिनका मुख कमल के समान है, नेत्र मिलाए हुए हैं, मेघ-श्यामल वर्ण के हैं और नाना आभूषणों से दीप्त हैं।
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॥ श्लोक १ ॥
रामकथा — पातकनाशन
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥
Caritaṃ Raghunāthasya Śatakoṭi-Pravistaram | Ekaikam-Akṣaraṃ Puṃsāṃ Mahāpātaka-Nāśanam
रघुनाथ जी का चरित सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत है। उनके चरित का एक-एक अक्षर मनुष्यों के महापातकों का नाश करने वाला है।
॥ श्लोक २-३ ॥
राम का ध्यान-स्वरूप
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥
Dhyātvā Nīlotpala-Śyāmaṃ Rāmaṃ Rājīva-Locanam | Jānakī-Lakṣmaṇopetaṃ Jaṭā-Mukuṭa-Maṇḍitam
नीले कमल के समान श्यामवर्ण, राजीव (कमल) लोचन, जानकी और लक्ष्मण से युक्त, जटामुकुट से मण्डित श्री राम का ध्यान करके — जो तूणीर, धनुष और बाण धारण किए हैं, निशाचरों के नाशक हैं, अपनी लीला से जगत की रक्षा के लिए प्रकट हुए हैं, अजन्मा और विभु हैं।
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॥ श्लोक ४-९ ॥
वज्रपञ्जर — सर्वाङ्ग रक्षाकवच
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥
Rāmarakṣāṃ Paṭhet-Prājñaḥ Pāpaghnīṃ Sarvakāmadām | Śiro Me Rāghavaḥ Pātu Bhālaṃ Daśarathātmajaḥ
शिर (Head)
राघवः
श्री राघव रक्षा करें
भाल (Forehead)
दशरथात्मजः
दशरथ-पुत्र रक्षा करें
नेत्र (Eyes)
कौसल्येयः
कौसल्या-पुत्र रक्षा करें
कर्ण (Ears)
विश्वामित्रप्रियः
विश्वामित्र-प्रिय रक्षा करें
घ्राण (Nose)
मखत्राता
यज्ञ-रक्षक रक्षा करें
मुख (Mouth)
सौमित्रिवत्सलः
लक्ष्मण-प्रिय रक्षा करें
जिह्वा (Tongue)
विद्यानिधिः
विद्यानिधि रक्षा करें
कण्ठ (Throat)
भरतवन्दितः
भरत-पूजित रक्षा करें
स्कन्ध (Shoulder)
दिव्यायुधः
दिव्य-आयुध रक्षा करें
भुज (Arms)
भग्नेशकार्मुकः
धनुष-भंजक रक्षा करें
हृदय (Heart)
जामदग्न्यजित्
परशुराम-विजेता रक्षा करें
नाभि (Navel)
जाम्बवदाश्रयः
जाम्बवान्-आश्रय रक्षा करें
पाद (Feet)
विभीषणश्रीदः
विभीषण-भाग्यदाता रक्षा करें
सर्वाङ्ग (All body)
रामः
श्री राम सम्पूर्ण रक्षा करें
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॥ श्लोक १०-१५ ॥
फलश्रुति — वज्रपञ्जर महिमा
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः॥
Etāṃ Rāma-Balopetāṃ Rakṣāṃ Yaḥ Sukṛtī Paṭhet | Sa Cirāyuḥ Sukhī Putrī Vijayī Vinayī Bhavet
जो सुकृती इस रामबल से युक्त रक्षा का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयी होता है। पाताल, भूतल और आकाश में विचरण करने वाले छद्मवेशी प्राणी भी उसे नहीं देख सकते जो रामनाम से रक्षित है। राम, रामभद्र, रामचन्द्र — इनमें से जो भी स्मरण करे, वह पापों से नहीं लिपटता और भुक्ति-मुक्ति पाता है।
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॥ श्लोक १६-३८ ॥
रामायण-सार — राम नाम महिमा
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः॥
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम्।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥
राम-राजमणि सदा विजयी होते हैं, मैं रमापति राम का भजन करता हूँ। राम ने निशाचरों की सेना का संहार किया, उन राम को नमस्कार। राम से बढ़कर कोई परायण नहीं है, मैं राम का दास हूँ। मेरा चित्त सदा राम में लीन रहे, हे राम! मुझे उद्धार कर।
भगवान शिव माँ पार्वती से कहते हैं — "हे वरानने! मैं राम-राम करता हुआ राम में रमण करता हूँ। एक रामनाम सहस्रनाम के तुल्य है।"
✦ रामरक्षा स्तोत्र फल — Phala Shruti ✦
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥
जो सुकृती इस रामबल-सम्पन्न रक्षा का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयी होता है। जो इस वज्रपञ्जर नामक रामकवच का स्मरण करता है, उसकी आज्ञा कहीं भी बाधित नहीं होती और वह सर्वत्र जय तथा मंगल को प्राप्त करता है।