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✦ श्री हरिदास कृत • ४० चौपाई ✦

Shri Ram Chalisa

श्री राम चालीसा
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मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम की स्तुति में रचित चालीस चौपाइयाँ। नित्य पाठ से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और वैकुण्ठ-धाम की प्राप्ति होती है।

रचयिता: श्री हरिदास • ४० चौपाई + ३ दोहा
श्री रघुवीर भक्त हितकारी।
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
श्री रघुवीर भक्त हितकारी सुन लीजै प्रभु📿 जय जय जय रघुनाथ कृपाला📿 राम नाम है अपरम्पारा📿 राम चालीसा जो पढ़े राम शरण चित लाय📿 श्री रघुवीर भक्त हितकारी सुन लीजै प्रभु📿 जय जय जय रघुनाथ कृपाला📿 राम नाम है अपरम्पारा📿 राम चालीसा जो पढ़े राम शरण चित लाय📿
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✦ श्री राम चालीसा — ४० चौपाई सम्पूर्ण ✦
✦ दोहा — मंगलाचरण ✦
आदौ राम तपोवनादि गमनम्
हत्वा मृगं काञ्चनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं
सुग्रीव सम्भाषणम्॥
बाली निर्दलनं समुद्र तरणं
लङ्कापुरी दाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्ण हननम्
एतद्धि रामायणम्॥
आदि में राम का वनगमन, सोने के हिरण का वध, सीता-हरण, जटायु का मरण, सुग्रीव से मिलन, बाली का वध, समुद्र को पार करना, लंका-दहन और अन्त में रावण-कुम्भकर्ण का संहार — यही रामायण है।
॥ चौपाई १-४ ॥
राम-स्तुति आरम्भ
श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं॥
जय जय जय रघुनाथ कृपाला। सदा करो सन्तन प्रतिपाला॥
हे श्री रघुवीर, भक्तों के हितकारी! हमारी प्रार्थना सुनिए। जो दिन-रात आपका ध्यान धरता है, उसके समान कोई भक्त नहीं। शिवजी मन में आपका ध्यान धरते हैं, ब्रह्मा और इन्द्र भी आपकी पार नहीं पाते। जय-जय रघुनाथ! सदा सन्तों का पालन करते रहें।
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॥ चौपाई ५-१२ ॥
राम के परिवार और सेवक
दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना॥
तव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥
तुम अनाथ के नाथ गुँसाईं। दीनन के हो सदा सहाई॥
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं। सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥
चारिउ वेद भरत हैं साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
गुण गावत शारद मन माहीं। सुरपति ताको पार न पाहीं॥
नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥
राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
आपके दूत वीर हनुमान हैं जिनका प्रभाव तीनों लोकों में विख्यात है। आपकी प्रचण्ड भुजाओं ने रावण को मारकर देवताओं का पालन किया। आप अनाथों के नाथ और दीनों के सहायक हैं। ब्रह्मा आदि भी आपकी पार नहीं पा सकते। चारों वेद भरत-बन्धु साक्षी हैं। आपके नाम से बढ़कर कोई नहीं — राम नाम अपरम्पार है।
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॥ चौपाई १३-२० ॥
राम के चरित्र और भाइयों की भक्ति
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो। तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥
शेष रटत नित नाम तुम्हारा। महि को भार शीश पर धारा॥
फूल समान रहत सो भारा। पावत कोउ न तुम्हरो पारा॥
भरत नाम तुम्हरो उर धारो। तासों कबहुँ न रण में हारो॥
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा। सुमिरत होत सकल भव नाशा॥
लखन नाम सुन राखत ध्यानू। सदा चरण रज उर में मानू॥
राम भरोसे जो नर जीवे। ता कहँ सुख कर कहा न लीवे॥
तुम करुणा के सागर स्वामी। चरण पकरि भज अन्तरयामी॥
गणपति ने आपका नाम लेकर प्रथम पूज्य स्थान पाया। शेषनाग नित्य आपका नाम रटते हैं और पृथ्वी का भार वहन करते हैं। भरत जी के हृदय में आपका नाम है इसीलिए वे कभी रण में नहीं हारे। लक्ष्मण जी सदा आपके चरण-रज को हृदय में रखते हैं। आप करुणा के सागर हैं — आपके चरण पकड़कर भजन करें।
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॥ चौपाई २१-३२ ॥
राम की विशेषताएँ और महिमा
राम रामपति रघुपति जय जय। महालोकपति जगपति जय जय॥
राजत जनक दुलारी जय जय। महानन्दिनी प्रभु जय जय॥
रतिहुँ दिवस राम धुन जाही। मगन रहत मन, तन दुख नाहीं॥
राम सने जासु उर होई। महा भाग्यशाली नर सोई॥
रक्षस दल संहारि जय जय। महापतित तनु तारि जय जय॥
राम नाम जो निशदिन गावत। मन वाञ्छित फल निश्चे पावत॥
रामयुद्धसार जेहि कर साजत। मन मनोज लखि कोटि लाजत॥
राखु लाज हमारी जय जय। महिमा अगम तुम्हारी जय जय॥
राजीव नयन मुनिन मन मोहे। मुकुट मनोहर शिर पर सोहे॥
राजित मृदुल गात शुचि आनन। मकरकृत कुण्डल दुहु कानन॥
रामचन्द्र सर्वोत्तम जय जय। मर्यादा पुरुषोत्तम जय जय॥
राम नाम गुण agan अनन्ता। मनन करत शारद सुर सन्ता॥
राम-रामपति-रघुपति की जय हो! महालोकपति जगपति की जय! जानकी राजत हैं। दिन-रात राम धुन में जो मगन रहते हैं, उन्हें तन का दुख नहीं। जो राम नाम दिन-रात गाते हैं, मनोवाञ्छित फल पाते हैं। कमल-नेत्र राम का मनोहर मुकुट — रामचन्द्र सर्वोत्तम, मर्यादा-पुरुषोत्तम की जय!
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॥ चौपाई ३३-४० ॥
अन्तिम चौपाइयाँ — भक्त-वात्सल्य
राम की महिमा कहाँ लौं गाऊँ। मति मलिन मन पार न पाऊँ॥
रामवली यों लिखि चालीसा। मति अनुसार ध्यान गुरुईसा॥
रामहिं सुन्दर रचि रस पागा। मठ दुर्वासा निकट प्रयागा॥
राम भगत जो नित यह ध्यावे। मन वाञ्छित फल निश्चे पावे॥
अन्त समय रघुबरपुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
श्री हरिदास कहे अरु गावे। सो वैकुण्ठ धाम को पावे॥
सात दिवस जो नेम कर। पाठ करे चित लाय॥
हरिदास हरि कृपा से। अवसि भक्ति को पाय॥
राम की महिमा का वर्णन कहाँ तक करूँ — मेरी मति मलिन है। श्री हरिदास ने इस रामचालीसा को यहाँ रचा। जो राम-भक्त नित्य इसका ध्यान करता है, उसे मनोवाञ्छित फल मिलता है। अन्त में रघुबर-धाम जाता है और हरिभक्त कहलाता है। सात दिन नियम से पाठ करने से हरि की कृपा से भक्ति अवश्य मिलती है।
✦ फल-दोहा ✦
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।
जो इच्छा मन में करे, सकल सिद्ध हो जाय॥
जो राम के चरणों में चित लगाकर राम चालीसा पढ़ता है, उसकी मन में जो भी इच्छा है वह सब सिद्ध हो जाती है।
चौपाई ८
राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
चारों वेदों में राम नाम की घोषणा है
चौपाई १६
राम सने जासु उर होई। महा भाग्यशाली नर सोई॥
जिसके हृदय में राम हैं वह परम भाग्यशाली है
चौपाई १७
राम नाम जो निशदिन गावत। मन वाञ्छित फल निश्चे पावत॥
दिन-रात रामनाम से मनोकामना पूर्ण होती है
चौपाई ३९
अन्त समय रघुबरपुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
अन्त में रामधाम की प्राप्ति होती है
✦ राम चालीसा फल — Phala Shruti ✦
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।
जो इच्छा मन में करे, सकल सिद्ध हो जाय॥
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
जो राम चालीसा का नित्य पाठ करता है, उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। सात दिन नियम से पाठ करने पर हरि की कृपा से भक्ति अवश्य प्राप्त होती है। अन्तकाल में रामधाम मिलता है।

📿 श्री राम चालीसा — परिचय

श्री राम चालीसा श्री हरिदास जी द्वारा रचित ४० चौपाइयों की स्तुति है जो मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्री राम को समर्पित है। 'राम' शब्द के आगे 'श्री' लगाना इस बात का प्रतीक है कि राम सदा चारों वेदों के सार से युक्त हैं।

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मर्यादापुरुषोत्तमराम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' — आदर्श पुरुष — माना जाता है। पिता की आज्ञा पालन, पत्नी-व्रत, न्यायप्रिय शासन — सब उनके गुण हैं।
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विष्णु का सातवाँ अवतारराम भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं जिन्होंने त्रेतायुग में अवतरण लेकर रावण का वध किया।
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नित्य पाठ का महत्वप्रतिदिन प्रातः भगवान राम के सामने यह चालीसा पढ़ने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। सात दिन नियम से पाठ विशेष फलदायी है।
रामनाम = सहस्रनामभगवान शिव के अनुसार एक बार रामनाम का उच्चारण विष्णु सहस्रनाम के तुल्य है।