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✦ महाकवि विद्यापति • नचारी गीत ✦

Vidyapati Geet Sangrah

विद्यापति गीत संग्रह
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मैथिली कोकिल महाकवि विद्यापति के शिव-पार्वती लीलागीत, नचारी, भक्ति रस के अमर पद। हर गीत में मधुर भाव, संस्कृति और श्रृंगार।

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✦ गीत
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✦ विद्यापति रचना
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✦ शिव भजन
चंद्रमुखी सन गौरी हमर छथि🎵 उगना रे मोर कतए गेलाह🎵 जोगिया मोर जगत सुखदायक🎵 आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागल हे🎵 हर हर महादेव बम बम भोले🎵 गौरी दौरी दौरी कहथिन हे🎵 चंद्रमुखी सन गौरी हमर छथि🎵
✦ कवि परिचय ✦
महाकवि विद्यापति — Maithil Kavi Kokil
महाकवि विद्यापति
Mahakavi Vidyapati
c. 1352 – 1448 CE

मैथिल कविकोकिल — The Nightingale of Maithili

महाकवि विद्यापति ठाकुर (लगभग 1352–1448 ई.) मिथिला क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ कवि थे जिन्हें मैथिल कविकोकिल की उपाधि दी गई। उनका जन्म बिहार के मधुबनी जिले के बिस्फी गाँव में हुआ था। वे राजा शिवसिंह के दरबारी कवि थे।

विद्यापति की रचनाएँ मुख्यतः मैथिली, संस्कृत और अपभ्रंश में हैं। उनके पदों में राधा-कृष्ण की श्रृंगारमयी लीला और शिव-पार्वती की भक्ति का अनूठा संगम मिलता है। उनकी नचारी गीत परंपरा आज भी मिथिलांचल में अत्यंत लोकप्रिय है।

उनके गीतों का प्रभाव केवल मैथिली तक सीमित नहीं रहा — वैष्णव आंदोलन के माध्यम से बंगाल, असम और ओडिशा के साहित्य पर भी उनकी गहरी छाप पड़ी। कहा जाता है कि स्वयं भगवान शिव उगना के रूप में उनके सेवक बने थे — यह भक्ति की चरम पराकाष्ठा का प्रमाण है।

मैथिली कविकोकिल 14वीं–15वीं सदी बिस्फी, मिथिला शिव–पार्वती भक्ति राधा–कृष्ण श्रृंगार नचारी परंपरा
✦ अमर रचना ✦
Maithili Vidyapati Geet — मैथिली गीत
✦ सम्पूर्ण गीत संग्रह ✦
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