✦ विद्यापति पदावली · भगवती गीत ✦
जय-जय भैरवि असुर भयाउनि
Jai Jai Bhairavi Asur Bhayauni
पशुपति भामिनी माया सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि
अनुगति गति तुअ पाया
रचनाकार: महाकवि विद्यापति · मैथिली कविता · १४वीं शताब्दी
भगवती उपासना मैथिली भक्ति देवी स्तुति शिव-शक्ति
जय-जय भैरवि असुर भयाउनि· पशुपति भामिनी माया· सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि· भनहि विद्यापति· इहो थिका त्रिभुवन नाथ· जय-जय भैरवि असुर भयाउनि· पशुपति भामिनी माया· सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि· भनहि विद्यापति· इहो थिका त्रिभुवन नाथ·
टेक
जय-जय भैरवि असुर भयाउनि
पशुपति भामिनी माया।
सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि
अनुगति गति तुअ पाया।
Jaya-jaya Bhairavi asura bhayāuni · Paśupati bhāminī māyā ·
Sahaja sumati vara diyau gosāuni · anugati gati tua pāyā
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पद १
वासर रैनि सबासन शोभित
चरण चन्द्रमणि चूड़ा।
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल
कतओ उगिलि कएल कूड़ा।
Vāsara raini sabāsana śobhita · caraṇa candramaṇi cūṛā ·
Kataoka daitya māri mukha melala · katao ugili kaela kūṛā
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पद २
सामर बरन नयन अनुरंजित
जलद जोग फुलकोका।
कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि
लिधुर फेन उठ फोंका।
Sāmara barana nayana anuran̐jita · jalada joga phulakokā ·
Kaṭa-kaṭa vikaṭa oṭha puṭa pāṃḍari · lidhura phena uṭha phonkā
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पद ३ — भनिता
घन-घन-घनय घुंघरू कत बाजय
हन-हन कर तुअ काता।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक
पुत्र बिसरू जनि माता।
Ghana-ghana-ghanaya ghuṃgharū kata bājaya · hana-hana kara tua kātā ·
Vidyāpati kavi tua pada sevaka · putra bisarū jani mātā
✦ प्रमुख शब्दार्थ
भैरवि
BHAIRAVI
भगवती का उग्र रूप, भय की स्वामिनी
असुर भयाउनि
ASURA BHAYĀUNI
असुरों को भय देने वाली
पशुपति भामिनी
PAŚUPATI BHĀMINĪ
पशुपति (शिव) की प्रिया
सुमति वर
SUMATI VARA
सुबुद्धि का वरदान
चन्द्रमणि चूड़ा
CANDRAMAṆI CŪṚĀ
चंद्रमणि से सुसज्जित मुकुट
सामर बरन
SĀMARA BARANA
श्यामल वर्ण, गहरा नीला रंग
घुंघरू
GHUṂGHARŪ
नृत्य की पायल, घंटिकाएँ
पद सेवक
PADA SEVAKA
चरणों का दास, विद्यापति
✦ सम्पूर्ण भावार्थ (हिंदी)
टेक: हे भैरवी! असुरों को भय देने वाली, पशुपति (शिव) की प्रिया माया-स्वरूपिणी — जय हो! हे देवी! मुझे सहज सुबुद्धि का वरदान दो, मैं तुम्हारे चरणों की शरण में हूँ, मुझे अनुगति (मोक्ष) प्रदान करो।

पद १: दिन-रात सर्वोत्तम आसन पर विराजमान, जिनके चरणों में चंद्रमणि की सुंदर चूड़ा है। कितने ही दैत्यों को मारकर मुख में ले लिया, कितनों को उगलकर कूड़ा बना दिया।

पद २: श्यामल वर्ण से रंजित नेत्र, मेघ के समान काले कमल के फूल जैसे। कट-कट भयंकर ओठों पर सफेद फेन — भयावह और अद्भुत रूप।

भनिता (पद ३): घन-घन-घन घुंघरू बजते हैं, माता की तलवार चलती है। विद्यापति कवि तुम्हारे चरणों के सेवक हैं — हे माता! अपने पुत्र को मत भूलो।
☽ गीत की महिमा एवं प्रसंग

भगवती भैरवी की स्तुति

यह गीत महाकवि विद्यापति (१३५२–१४४८) द्वारा रचित भगवती भैरवी की गहन स्तुति है। भैरवी शक्ति का उग्र किंतु करुणामय रूप है — वे असुरों की संहारिका और भक्तों की रक्षक हैं।

गीत की विशेषता यह है कि अंत में "विद्यापति कवि तुअ पद सेवक" — कवि स्वयं को माता का पुत्र और चरण-सेवक कहते हैं, जो मैथिली भक्ति-परंपरा की आत्मसमर्पण-भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है।

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विद्यापति की शैलीभक्ति, श्रृंगार और उग्रता का अद्भुत मिश्रण। माता का भयंकर रूप भी करुणा से परिपूर्ण।
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भैरवी तंत्र-परंपराभैरवी दस महाविद्याओं में से एक हैं — उग्र, ज्ञानदायिनी और मोक्षप्रदा।
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मैथिली लोक-परंपरायह गीत आज भी मिथिला के शक्ति पूजन, नवरात्र और देवी उत्सवों में श्रद्धा से गाया जाता है।
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भनिता की परंपरामैथिली काव्य में अंतिम पद में कवि का नाम — "विद्यापति कवि" — परम्परागत भनिता है।
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