यह गीत महाकवि विद्यापति (१३५२–१४४८) द्वारा रचित भगवती भैरवी की गहन स्तुति है। भैरवी शक्ति का उग्र किंतु करुणामय रूप है — वे असुरों की संहारिका और भक्तों की रक्षक हैं।
गीत की विशेषता यह है कि अंत में "विद्यापति कवि तुअ पद सेवक" — कवि स्वयं को माता का पुत्र और चरण-सेवक कहते हैं, जो मैथिली भक्ति-परंपरा की आत्मसमर्पण-भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है।