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॥ अथ देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् ॥
✦ महावाक्य — Mahaavakya ✦
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि
कुमाता न भवति ॥
कुमाता न भवति ॥
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api
Kumaataa Na Bhavati
Kumaataa Na Bhavati
श्लोक १
क्लेश-हरण — न मन्त्रं नो यन्त्रम्
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥
Na Matram No Yantram Tad-Api Ca Na Jaane Stutim-Aho
Na Ca-Ahvaanam Dhyaanam Tad-Api Ca Na Jaane Stuti-Kathaah |
Na Jaane Mudraas-Te Tad-Api Ca Na Jaane Vilapanam
Param Jaane Maatas-Tvad-Anusarannam Klesha-Harannam ||1||
Na Ca-Ahvaanam Dhyaanam Tad-Api Ca Na Jaane Stuti-Kathaah |
Na Jaane Mudraas-Te Tad-Api Ca Na Jaane Vilapanam
Param Jaane Maatas-Tvad-Anusarannam Klesha-Harannam ||1||
हे माँ! न आपका मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र; और अफसोस — आपकी स्तुति भी नहीं जानता।
न आपके ध्यान से आह्वान जानता हूँ; आपकी स्तुति-कथाएँ भी नहीं जानता।
आपकी मुद्राओं को नहीं जानता; और यहाँ तक कि आपके लिए विलाप भी नहीं जानता।
किन्तु एक बात जानता हूँ — आपका स्मरण करते रहना ही सब क्लेशों को हर लेता है।
~ 🙏 ~
श्लोक २
अज्ञान-दरिद्र-आलस्य — विधि-अज्ञान
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥
Vidher-Ajnyaanena Dravinna-Virahenna-Alasatayaa
Vidheya-Ashakyatvaat-Tava Carannayoryaa Cyutir-Abhuut |
Tad-Etat Kssantavyam Janani Sakalo[a-U]ddhaarinni Shive
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||2||
Vidheya-Ashakyatvaat-Tava Carannayoryaa Cyutir-Abhuut |
Tad-Etat Kssantavyam Janani Sakalo[a-U]ddhaarinni Shive
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||2||
हे माँ! पूजा-विधि के अज्ञान से, धन के अभाव से और अपनी आलस्य-प्रवृत्ति के कारण...
...विधि का पालन करने में असमर्थ होने से, आपके चरणों की सेवा में जो त्रुटियाँ हुईं...
...वे सब क्षमा करने योग्य हैं, हे जननी! हे समस्त जगत की उद्धारिणी शिवे!
क्योंकि कुपुत्र तो होते हैं — परन्तु कुमाता कभी नहीं होती।
॥ महावाक्य ॥
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥
~ 🙏 ~
श्लोक ३
विरल-चञ्चल पुत्र — Virala-Tarala
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥
Prthivyaam Putraas-Te Janani Bahavah Santi Saralaah
Param Tessaam Madhye Virala-Taralo[a-A]ham Tava Sutah |
Madiiyo-[A]yam Tyaagah Samucitam-Idam No Tava Shive
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||3||
Param Tessaam Madhye Virala-Taralo[a-A]ham Tava Sutah |
Madiiyo-[A]yam Tyaagah Samucitam-Idam No Tava Shive
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||3||
हे जननी! इस संसार में आपके अनेक सरल-चित्त पुत्र हैं।
परन्तु उनमें मैं एक ऐसा विरल पुत्र हूँ जो चंचल और अस्थिर है।
इसीलिए हे शिवे! मुझे त्यागना आपके लिए उचित नहीं होगा।
क्योंकि कुपुत्र तो होते हैं — परन्तु कुमाता कभी नहीं होती।
॥ महावाक्य ॥
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥
~ 🙏 ~
श्लोक ४
अनन्य-स्नेह — Jaganmata
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥
Jaganmaatar-Maatas-Tava Caranna-Sevaa Na Racitaa
Na Vaa Dattam Devi Dravinnam-Api Bhuuyas-Tava Mayaa |
Tathaa-[A]pi Tvam Sneham Mayi Nirupamam Yat-Prakurusse
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||4||
Na Vaa Dattam Devi Dravinnam-Api Bhuuyas-Tava Mayaa |
Tathaa-[A]pi Tvam Sneham Mayi Nirupamam Yat-Prakurusse
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||4||
हे जगन्माता! हे माँ! मैंने कभी आपके चरणों की सेवा नहीं की।
न ही हे देवि! मैंने आपके श्रीचरणों में प्रचुर धन अर्पित किया।
फिर भी आप मुझ पर जो अनुपम मातृ-स्नेह बनाए रखती हैं...
...क्योंकि कुपुत्र तो होते हैं — परन्तु कुमाता कभी नहीं होती।
॥ महावाक्य ॥
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥
~ 🙏 ~
श्लोक ५
पञ्चाशीति वयस् — निरालम्ब शरण
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥
Parityaktaa Devaa Vividha-Vidha-Sevaa-Kulatayaa
Mayaa Pan.caashiiter-Adhikam-Apaniite Tu Vayasi |
Idaaniim Cenmaatas-Tava Yadi Krpaa Na-Api Bhavitaa
Niraalambo Lambodara-Janani Kam Yaami Sharannam ||5||
Mayaa Pan.caashiiter-Adhikam-Apaniite Tu Vayasi |
Idaaniim Cenmaatas-Tava Yadi Krpaa Na-Api Bhavitaa
Niraalambo Lambodara-Janani Kam Yaami Sharannam ||5||
हे माँ! विविध पूजा-विधियों की जटिलता में उलझकर देवताओं की सेवा छोड़ दी...
...और पच्चासी वर्ष से भी अधिक आयु बीत गई।
यदि अब भी हे माँ! आपकी कृपा नहीं मिली...
...तो हे लम्बोदर-जननी! यह निरालम्ब (असहाय) कहाँ जाए शरण को?
~ 🙏 ~
श्लोक ६
जप-विधि का फल — श्वपाको जल्पाको
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥
Shvapaako Jalpaako Bhavati Madhupaako[a-U]pama-Giraa
Niraatangko Rangko Viharati Ciram Kotti-Kanakaih |
Tava-Aparnne Karnne Vishati Manu-Varnne Phalam-Idam
Janah Ko Jaaniite Janani Japaniiyam Japa-Vidhau ||6||
Niraatangko Rangko Viharati Ciram Kotti-Kanakaih |
Tava-Aparnne Karnne Vishati Manu-Varnne Phalam-Idam
Janah Ko Jaaniite Janani Japaniiyam Japa-Vidhau ||6||
हे माँ! एक श्वपाक (अस्पृश्य) भी आपकी कृपा से मधु-समान वाणी से बोलने वाला जल्पक बन जाता है।
एक दरिद्र (रंक) निर्भय होकर करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं के समान वैभव से विचरण करता है।
हे अपर्णे! जब आपकी स्तुति के वर्ण किसी के कान में पड़ते हैं — यही फल मिलता है।
हे जननी! जप-विधि में जपने योग्य आपकी महिमा को कौन जान सकता है!
~ 🙏 ~
श्लोक ७
भवानी का पाणिग्रहण-फल — शिव की महिमा
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥
Citaa-Bhasmaa-Lepo Garalam-Ashanam Dik-Patta-Dharo
Jattaa-Dhaarii Kanntthe Bhujaga-Pati-Haarii Pashupatih |
Kapaalii Bhuutesho Bhajati Jagadiishai[a-E]ka-Padaviim
Bhavaani Tvat-Paanni-Grahanna-Paripaattii-Phalam-Idam ||7||
Jattaa-Dhaarii Kanntthe Bhujaga-Pati-Haarii Pashupatih |
Kapaalii Bhuutesho Bhajati Jagadiishai[a-E]ka-Padaviim
Bhavaani Tvat-Paanni-Grahanna-Paripaattii-Phalam-Idam ||7||
हे माँ! शंकर जी जो चितासभस्म से लिपे हैं, विष पीते हैं, दिशाएँ ही जिनका वस्त्र है...
...जटाधारी हैं और कण्ठ में सर्परांज की माला पहनते हैं — फिर भी वे 'पशुपति' कहलाते हैं।
कपाल धारण करने वाले भूतेश्वर जगदीश के एकमात्र पद को प्राप्त हुए हैं...
...हे भवानी! यह सब आपके पाणिग्रहण (विवाह) का ही फल है।
~ 🙏 ~
श्लोक ८
मृडानी नाम-जप — न मोक्ष न विभव
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥
Na Mokssasya-Akaangkssaa Bhava-Vibhava-Vaan.chaa-Api Ca Na Me
Na Vijnyaana-Apekssaa Shashi-Mukhi Sukhe[a-I]ccha-Api Na Punah |
Atas-Tvaam Samyaace Janani Jananam Yaatu Mama Vai
Mrddaanii Rudraannii Shiva Shiva Bhavaani-Iti Japatah ||8||
Na Vijnyaana-Apekssaa Shashi-Mukhi Sukhe[a-I]ccha-Api Na Punah |
Atas-Tvaam Samyaace Janani Jananam Yaatu Mama Vai
Mrddaanii Rudraannii Shiva Shiva Bhavaani-Iti Japatah ||8||
हे माँ! मुझे मोक्ष की भी आकांक्षा नहीं; न संसारिक ऐश्वर्य की कामना है।
हे शशि-मुखी! न विज्ञान की अपेक्षा है; और न पुनः सांसारिक सुखों की इच्छा।
अतः हे जननी! मैं आपसे बस यही माँगता हूँ — मेरा जीवन आपके नाम-स्मरण में बीते।
'मृडानी', 'रुद्राणी', 'शिव शिव', 'भवानी' — इन नामों का जप करते हुए मेरा जीवन जाए।
~ 🙏 ~
श्लोक ९
श्यामे कृपा — अनाथ पर अनुग्रह
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
Na-Araadhitaasi Vidhinaa Vividho[a-U]pacaaraih
Kim Rukssa-Cintana-Parair-Na Krtam Vacobhih |
Shyaame Tvameva Yadi Kin.cana Mayy-Anaathe
Dhatse Krpaam-Ucitam-Amba Param Tavai[a-E]va ||9||
Kim Rukssa-Cintana-Parair-Na Krtam Vacobhih |
Shyaame Tvameva Yadi Kin.cana Mayy-Anaathe
Dhatse Krpaam-Ucitam-Amba Param Tavai[a-E]va ||9||
हे माँ! मैंने आपको परम्परागत विधि-विधान और विविध उपचारों से पूजा नहीं।
बल्कि रूखे-कठोर विचारों से भरे शब्दों से क्या नहीं किया (जो अनुचित था)?
हे श्यामे! फिर भी यदि आप इस अनाथ पर थोड़ी भी कृपा करती हैं...
...हे अम्ब! तो वह आपको ही शोभा देता है — यह केवल आपसे ही सम्भव है।
~ 🙏 ~
श्लोक १०
आपत्काल स्मरण — क्षुधातृषार्त
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥
Aapatsu Magnah Smarannam Tvadiiyam
Karomi Durge Karunnaa-[A]rnnav[a-Ii]eshi |
Nai[a-E]tac-Chattha-Tvam Mama Bhaavayethaah
Kssudhaa-Trssaa-[Aa]rtaa Jananiim Smaranti ||10||
Karomi Durge Karunnaa-[A]rnnav[a-Ii]eshi |
Nai[a-E]tac-Chattha-Tvam Mama Bhaavayethaah
Kssudhaa-Trssaa-[Aa]rtaa Jananiim Smaranti ||10||
हे दुर्गे! मैं संकटों में डूबा हुआ आपका स्मरण कर रहा हूँ...
...हे करुणा के सागर की स्वामिनी!
इसे मेरा कपट या छल मत समझिए।
क्योंकि भूख-प्यास से पीड़ित बच्चे माँ को ही याद करते हैं।
~ 🙏 ~
श्लोक ११
जगदम्ब करुणा — अपराध-परम्परा
जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परापरं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परापरं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥
Jagadamba Vicitram-Atra Kim
Paripuurnnaa Karunnaa-[A]sti Cenmayi |
Aparaadha-Paramparaa-Param
Na Hi Maataa Samupekssate Sutam ||11||
Paripuurnnaa Karunnaa-[A]sti Cenmayi |
Aparaadha-Paramparaa-Param
Na Hi Maataa Samupekssate Sutam ||11||
हे जगदम्बा! यदि आपकी कृपा मुझ पर पूर्ण रूप से हो — तो इसमें आश्चर्य क्या!
क्योंकि आपकी करुणा तो सदा परिपूर्ण भरी रहती है।
पुत्र चाहे अपराध पर अपराध करता रहे...
...माँ कभी पुत्र की उपेक्षा नहीं करती।
~ 🙏 ~
श्लोक १२
समापन — पातकी और पापघ्नी
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥
मेरे समान पातकी (पापी) और कोई नहीं है; और आपके समान पापों को नष्ट करने वाली भी कोई नहीं।
हे महादेवि! यह जानकर, जो उचित हो — वह कीजिए।
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
यः पठेत् क्षमापन स्तोत्रं भक्तियुक्तः समाहितः।
तस्य सर्वापराधानि क्षमते जगदम्बिका॥
तस्य सर्वापराधानि क्षमते जगदम्बिका॥
जो भक्तिभाव और एकाग्रचित्त से इस क्षमापन स्तोत्र का पाठ करता है — जगदम्बा उसके समस्त अपराधों को क्षमा कर देती हैं।
🙏 देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् — परिचय
यह अत्यन्त भावस्पर्शी स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। इसमें भक्त अपनी अज्ञानता, दरिद्रता, आलस्य और कमियों को स्वीकार करते हुए माँ दुर्गा से क्षमा माँगता है। इस स्तोत्र का केन्द्रीय भाव यह है कि पुत्र चाहे कितना भी कुपुत्र हो, माँ कभी 'कुमाता' नहीं बनती।
विशेष रूप से पञ्चम श्लोक में आचार्य कहते हैं कि पच्चासी वर्ष की अवस्था में भी यदि माँ की कृपा नहीं मिली — तो इस निरालम्ब जीव का शरण कौन होगा? यह स्तोत्र नवरात्रि, शुक्रवार और संकट के समय विशेष रूप से पठनीय है।
रचयिताआदि शंकराचार्य — अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक और महान शाक्त-भक्त।
महावाक्य"कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति" — यह वाक्य चार बार आता है।
पाठ-कालनवरात्रि, संकट-काल, शुक्रवार और प्रातःकाल स्नानोपरान्त पाठ श्रेष्ठ।
श्लोक-संख्याबारह श्लोकों का यह स्तोत्र संक्षिप्त किन्तु परम भावपूर्ण और फलदायी है।