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✦ अथर्वशीर्ष • Upanishad ✦

Ganapati Atharvashirsha

गणपति अथर्वशीर्षम्
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अथर्ववेद के उपनिषद् — गणपति की परम् दिव्यता का उद्घाटन करने वाला महान् ग्रन्थ। यह उपनिषद् गणेश को ब्रह्म, विष्णु और शिव का स्वरूप बताता है।

२५
श्लोक
अथर्ववेद
स्रोत
२१×
पाठ संख्या

परिचय — Introduction

गणपति अथर्वशीर्ष अथर्ववेद का एक लघु उपनिषद् है जो गणेश की सर्वोच्चता और सर्वव्यापकता का वर्णन करता है। इसका नित्य पाठ विघ्नों को दूर करता है, बुद्धि और सिद्धि प्रदान करता है। गणेशोत्सव में इसका २१ बार पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

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शान्ति पाठ — Shanti Path
मंगलाचरण
ॐ भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हे देवों! हम कानों से शुभ सुनें, आँखों से शुभ देखें। स्वस्थ अंगों और शरीर से देवों की स्तुति करते हुए देवों को प्रिय आयु को भोगें। इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
प्रथम खण्ड — First Section
श्लोक १
ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्माऽसि।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥
हे गणपति! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष तत्त्व हैं। आप ही एकमात्र कर्ता, धर्ता और हर्ता हैं। यह सब कुछ निश्चय ही आप ही ब्रह्म हैं। आप साक्षात् नित्य आत्मा हैं।
श्लोक २
ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥
मैं ऋत (वैदिक सत्य) कहता हूँ। मैं सत्य कहता हूँ।
श्लोक ३
अव त्वं माम्।
अव वक्तारम्।
अव श्रोतारम्।
अव दातारम्।
अव धातारम्।
अवानूचानमव शिष्यम्।
अव पश्चात्तात्।
अव पुरस्तात्।
अवोत्तरात्तात्।
अव दक्षिणात्तात्।
अव चोर्ध्वात्तात्।
अवाधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥
आप मेरी रक्षा करें। वक्ता की रक्षा करें, श्रोता की, दाता की, धाता की, गुरु और शिष्य की रक्षा करें। पीछे से, आगे से, उत्तर-दक्षिण-ऊपर-नीचे से — सभी ओर से मेरी रक्षा करें।
द्वितीय खण्ड — Ganesha as Brahman
श्लोक ४
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
त्वं सच्चिदानन्दाऽद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥
आप वाङ्मय, चिन्मय, आनन्दमय और ब्रह्ममय हैं। आप सच्चिदानन्द अद्वितीय हैं। आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आप ज्ञानमय और विज्ञानमय हैं।
श्लोक ५
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥
यह समस्त जगत् आपसे उत्पन्न होता है, आप में स्थित रहता है, आप में लय होगा और आप में वापस लौटता है। आप ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। आप वाणी के चार पद हैं।
श्लोक ६
त्वं गुणत्रयातीतः।
त्वं देहत्रयातीतः।
त्वं कालत्रयातीतः।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्।
त्वं शक्तित्रयात्मकः॥
आप तीनों गुणों (सत्, रज, तम) से परे हैं। तीनों देहों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) से परे हैं। तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) से परे हैं। आप नित्य मूलाधार में स्थित हैं। आप तीनों शक्तियों के आत्मा हैं।
श्लोक ७
त्वं योगिनां योगिनी च।
त्वं सिद्धिदाता सिद्धिबुद्धिप्रदाता।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥
आप योगियों के योगी और योगिनी हैं। आप सिद्धिदाता, सिद्धि और बुद्धि के प्रदाता हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हैं।
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गणेश ध्यान — Ganesha Dhyana
श्लोक ८
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम्।
अनुस्वारः परतरः।
अर्धेन्दुलसितम्।
तारेण ऋद्धम्।
एतत्तव मनुस्वरूपम्॥
गकारः पूर्वरूपम्।
अकारो मध्यमरूपम्।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्।
बिन्दुरुत्तररूपम्।
नादः सन्धानम्।
सग्ँहिता सन्धिः।
सैषा गणेशविद्या।
गणकर्षी नाम॥
'ग' पूर्वरूप है, 'अ' मध्यरूप, अनुस्वार अन्तरूप, बिन्दु उत्तररूप और नाद सन्धान है। यही 'गं' — गणेश की बीज-विद्या है जिसे 'गण-कर्षी' कहते हैं।
श्लोक ९ — एकदन्त ध्यानम्
एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगन्धानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्।
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥
एक दाँत, चार हाथों में पाश, अंकुश, दाँत और वरमुद्रा धारण करने वाले, मूषक-चिह्नयुक्त ध्वज वाले, रक्तवर्ण, लम्बोदर, सूप के समान कर्णयुक्त, रक्त वस्त्र पहने, रक्त चन्दन से सुशोभित, भक्तों पर दयालु — जो नित्य ऐसे ध्यान करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ योगी है।
अष्टनाम — Eight Sacred Names
श्लोक १०
गणेश विद्या —

ॐ गं गणपतये नमः।
नमो गणपतये।

त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि॥
ॐ गं — यह गणपति की बीज-विद्या है। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं — यह त्रिवार उच्चारण तीनों लोकों में इस सत्य को स्थापित करता है।
श्लोक ११ — प्रणाम मंत्र
नमः पूर्वाय।
नमो जात्याय।
नमस्ते अस्तु।
एक एव अद्वितीयोऽसि।
भूर्भुवःस्वरोम॥
पूर्व दिशा को नमस्कार। जन्मदाता को नमस्कार। आपको नमस्कार हो। आप एक और अद्वितीय हैं। आप ही भूर्भुव:स्वर् ओम् हैं।
फल श्रुति — Phala Shruti
फलश्रुति
एतदथर्वशीर्षमधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वतः सुखमेधते।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति।

महाविघ्नात् प्रमुच्यते।
महादोषात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति।
एतदथर्वशीर्षं शिष्यायादेयम्।
यो यदि मोहाद् दास्यति स पापीयान् भवति।

सहस्रावर्तनाद् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥
जो इस अथर्वशीर्ष का पाठ करता है वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है, सब ओर से सुख पाता है और कोई विघ्न उसे नहीं सताता। सूर्यग्रहण में महानदी के निकट जप करने से मंत्र-सिद्धि होती है। महाविघ्न और महादोष से मुक्ति मिलती है। सहस्र आवृत्ति से जो कामना मन में हो, वह पूर्ण होती है।
पाठ विधि — Chanting Method

📿 पाठ विधि एवं लाभ

लाभ — Benefits
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बुद्धि वृद्धि
नियमित पाठ से बुद्धि, स्मृति और एकाग्रता में वृद्धि होती है। छात्रों के लिए विशेष लाभकारी।
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विघ्न नाश
सभी विघ्न, बाधाएं और शत्रुओं से रक्षा। नए कार्य या यात्रा से पहले पाठ करें।
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समृद्धि
व्यावसायिक सफलता, धन-लाभ और गृह में सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है।
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मोक्ष मार्ग
नित्य पाठ से ब्रह्मभाव की प्राप्ति और अन्त में मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
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