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✦ शिव आरती — सम्पूर्ण पाठ ✦
✦ ध्रुवपंक्ति — हर छंद के बाद ✦
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥
ॐ हर हर हर महादेव।
॥ छंद १ ॥
एकानन — एक, चार और पाँच मुख
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
एक मुख वाले (शिव), चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पाँच मुख वाले (सदाशिव) — तीनों एक साथ विराजते हैं। हंस पर आसीन (ब्रह्मा), गरुड़ पर आसीन (विष्णु) और वृषभ (नंदी) पर विराजित (शिव) — सब सुशोभित हैं।
~ 🪔 ~
॥ छंद २ ॥
दो भुज — दस भुज — शिव की शक्ति
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
दो भुज, चार भुज और दस भुज वाले रूप अत्यंत सुशोभित हैं। शिव के त्रिगुण (सत्, रज, तम) स्वरूप को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
~ 🪔 ~
॥ छंद ३ ॥
अक्षमाला — कमलमाला — कर में माला
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहे भाले शशिधारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
अक्षमाला (रुद्राक्ष माला), वनमाला (वन-पुष्पों की माला) और मुण्डमाला धारण किए हुए हैं। ललाट पर चंदन और कस्तूरी (मृगमद) सुशोभित है — और सिर पर चंद्रमा धारण किए हुए हैं।
~ 🪔 ~
॥ छंद ४ ॥
श्वेत पुष्प — वेद-पाठ — ध्यान में ब्रह्मा
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
श्वेत वस्त्र (ब्रह्मा के साथ), पीत वस्त्र (विष्णु के साथ) और बाघांबर (शिव के स्वयं के) अंगों पर सुशोभित हैं। सनकादिक (ऋषि), गरुड़ादिक (देव-वाहन) और भूतगण — सब उनके साथ हैं।
~ 🪔 ~
॥ छंद ५ ॥
पञ्चतत्व — प्रकृति-स्वरूप शिव
कर में श्रेष्ठ कमण्डलु चक्र त्रिशूल धारे।
सुखकारी दुखहारी जगपालनकारे॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
हाथ में श्रेष्ठ कमण्डलु (जल-पात्र), चक्र और त्रिशूल धारण किए हुए हैं। वे सुख देने वाले, दुःख हरने वाले और जगत् का पालन करने वाले हैं।
~ 🪔 ~
॥ छंद ६ ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश — एक ही सत्य
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव — इन्हें अज्ञानी अलग-अलग मानते हैं। किंतु प्रणव (ॐ) अक्षर में ये तीनों एक ही हैं — यही परम सत्य है।
~ 🪔 ~
॥ छंद ७ ॥
त्रिकाल — तीन काल की आरती
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
त्रिगुण शिव की यह आरती जो कोई मनुष्य गाता है — शिवानंद स्वामी कहते हैं कि वह अपने मन की इच्छित फल को अवश्य प्राप्त करता है।
~ 🪔 ~
✦ समापन ध्रुवपंक्ति ✦
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥
ॐ हर हर हर महादेव।
जय शिव ओंकारा॥
🪔 शिव आरती — दीपदान की परम्परा
आरती का शाब्दिक अर्थ है — "आ" अर्थात् सब प्रकार से, "रती" अर्थात् प्रेम। यह भक्त का अपने इष्टदेव के प्रति सम्पूर्ण समर्पण का भाव है। दीप जलाकर देव के समक्ष घुमाने की यह परम्परा वेद-काल से चली आ रही है।
शिव आरती — "ॐ जय शिव ओंकारा" — संगीत की दृष्टि से भी अत्यंत सुंदर है। इसकी धुन भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुकी है। "ब्रह्मा विष्णु सदाशिव" की ध्रुवपंक्ति त्रिमूर्ति-एकता का संदेश देती है।
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पञ्चोपचार आरतीपाँच दीपों से आरती — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्वों के प्रतीक। यही पञ्चोपचार पूजा की पूर्णता है।
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त्रिमूर्ति एकता"ब्रह्मा विष्णु सदाशिव" — ध्रुवपंक्ति का संदेश यह है कि तीनों देव एक ही सत्य के तीन रूप हैं। ॐ में तीनों समाहित हैं।
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शिवानंद स्वामीअंतिम छंद में "शिवानंद स्वामी" नाम आता है — ये इस आरती के रचयिता माने जाते हैं। उनका संदेश है — भक्ति से मनोकामना पूर्ण होती है।
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त्रिकाल आरतीप्रातः, मध्याह्न और संध्या — तीनों कालों में आरती का पाठ-गायन शिव की नित्य उपासना का अभिन्न अंग है।
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