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✦ पुष्पदंत गन्धर्व विरचितम् ✦

Shiv Mahimna Stotra

शिव महिम्नः स्तोत्र
✦ ✦ ✦
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥

गन्धर्व पुष्पदंत द्वारा रचित — शिव की महिमा का वर्णन करने में ब्रह्मा तक असमर्थ हैं, फिर भी भक्त अपनी बुद्धि के अनुसार स्तुति करने में अदोष है।

रचयिता : पुष्पदंत गन्धर्व • ४३ श्लोक + फलश्रुति
४३
✦ श्लोक
✦ फलश्रुति
पुष्पदंत
✦ रचयिता
महिम्नः पारं ते📖 असितगिरिसमं स्यात् कज्जलम्📖 त्वयि न रचितैः किं वा स्तवैः📖 अतीतः पन्थानं तव च महिमा📖 विनायकं त्वां नाभिनवमथो📖 बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ📖 हर हर महादेव📖 महिम्नः पारं ते📖 असितगिरिसमं स्यात् कज्जलम्📖 त्वयि न रचितैः किं वा स्तवैः📖 अतीतः पन्थानं तव च महिमा📖 विनायकं त्वां नाभिनवमथो📖 बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ📖 हर हर महादेव📖
✦ शिव महिम्नः स्तोत्र — सम्पूर्ण ४३ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
स्तुति की असमर्थता — भूमिका
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥
Mahimnaḥ Pāraṃ Te Parama-viduṣo Yady-asadṛśī | Stutir-Brahmādīnām-api Tadavasannāstvayi Giraḥ
हे हर! यदि परमज्ञानी भी आपकी महिमा की सीमा नहीं जान सके, और ब्रह्मा जैसे महान देव भी आपकी स्तुति में असमर्थ हों — तो फिर भी जो अपनी बुद्धि के अनुसार स्तुति करता है, वह निर्दोष है। यह स्तोत्र रचना में मेरा भी यही आधार है।
✦ २ ✦
॥ श्लोक २ ॥
यदि सागर स्याल्ल — असीमित महिमा
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥
Asita-Giri-Samaṃ Syāt Kajjalaṃ Sindhu-Pātre | Surataru-Vara-Śākhā Lekhanī Patra-Murvī
यदि विशाल काला पर्वत स्याही बन जाए, समुद्र दवात बन जाए, कल्पवृक्ष की शाखा लेखनी बन जाए, पूरी पृथ्वी कागज़ बन जाए — और माँ सरस्वती स्वयं सदा लिखती रहें — तब भी हे ईश! आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।
✦ ३ ✦
॥ श्लोक ३ ॥
तव तत्त्वं न जानामि — अज्ञान की स्वीकृति
त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
Trayī Sāṃkhyaṃ Yogaḥ Paśupati-Mataṃ Vaiṣṇavam-iti | Prabhinnе Prasthāne Param-idam-adaḥ Pathyam-iti ca
वेद, सांख्य, योग, पाशुपत और वैष्णव — ये सभी अलग-अलग मार्ग हैं, और सब यही कहते हैं कि "हमारा मार्ग ही श्रेष्ठ है"। परंतु विभिन्न स्वभाव के मनुष्यों के अलग-अलग मार्गों से चलने पर भी — जैसे सभी नदियाँ समुद्र में मिलती हैं — वे सब आप ही को प्राप्त होते हैं।
✦ ४ ✦
॥ श्लोक ४ ॥
त्रयम्बकः — ब्रह्मा-विष्णु-शिव एकता
महोक्षः खट्वाङ्गी शिखरिणि मुसलं तव करे
वेदान्तप्रत्यग्रे सह जनन्यात्मविभवैः।
तव त्रिष्वेकस्मिन्नमिततनुर् एव जगतः
पिताऽहं माता च प्रभव उत मृत्युर्मपि च॥
Mahokṣaḥ Khaṭvāṅgī Śikhariṇi Musalaṃ Tava Kare | Vedānta-Pratyagre Saha Jananī-Ātma-Vibhavaiḥ
आपके हाथों में नंदी, खट्वांग, त्रिशूल और मुसल हैं। वेदांत के परे भी आप माँ के साथ आत्म-विभव में हैं। आप तीनों में एक हैं, जगत के पिता, माता, उत्पत्ति और मृत्यु — सभी आप ही हैं।
✦ ५ ✦
॥ श्लोक ५ ॥
अतीतः पन्थानं — मार्ग से परे
किमिह बहुषु दग्धेष्वीश्वरः किं मृगेन्द्रः
क्व सरसि कमलिन्यां क्व गिरौ पर्वतेन्द्रे।
तव तु जलधिवातप्राणदुर्दर्शरूपा
दिशि दिशि विततानि त्वत्कराः सर्वगाः सन्ति॥
Kimika Bahuṣu Dagdheṣvīśvaraḥ Kiṃ Mṛgendraḥ | Kva Sarasi Kamalinyāṃ Kva Girau Parvatendre
जब जंगल जल जाए तो शेर कहाँ? जब तालाब सूख जाए तो कमल कहाँ? जब पर्वत टूट जाए तो पर्वतराज कहाँ? — किंतु आपकी भुजाएँ जल, वायु और प्राण के समान सर्वव्यापी हैं। आपका रूप सब दिशाओं में व्याप्त है।
✦ ६ ✦
॥ श्लोक ६ ॥
त्रिगुण स्वरूप — सृष्टि, पालन, संहार
बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः।
प्रबल-तमसे तत्संहारे हराय नमो नमः।
जनसुखकृते सत्त्वोद्रेके मृडाय नमो नमः।
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः॥
Bahula-Rajase Viśvotpattau Bhavāya Namo Namaḥ | Prabala-Tamase Tatsaṃhāre Harāya Namo Namaḥ
बहुल रजोगुण से सृष्टि करने वाले भव को नमस्कार! प्रबल तमोगुण से संहार करने वाले हर को नमस्कार! लोगों को सुख देने के लिए सत्त्वगुण में स्थित मृड को नमस्कार! और तीनों गुणों से परे परमपद में स्थित शिव को नमस्कार!!
✦ ७ ✦
॥ श्लोक ७ ॥
कृत्तिवासाः — व्याघ्रचर्म और वैराग्य
कृत्तिवासाः पशूनां पतिर्विशालाक्षः
सुगन्धि-पुष्पाढ्याः सुरतरुवरे संस्थिताः।
सरसिरुह-सदृशैर्नयनैः प्रसन्नं
हरिहर-हरणाभ्यां हरमीडे॥
Kṛttivāsāḥ Paśūnāṃ Patir-Viśālākṣaḥ | Sugandhi-Puṣpāḍhyāḥ Surataru-Vare Saṃsthitāḥ
व्याघ्र-चर्म वस्त्र धारण करने वाले, पशुपति, विशाल नेत्रों वाले, दिव्य पुष्पों से सुसज्जित कल्पवृक्ष के नीचे विराजमान, कमल के समान प्रसन्न नेत्रों वाले — उन हर-हरण-हर का मैं स्तवन करता हूँ।
✦ ८ ✦
॥ श्लोक ८ ॥
पुष्पदंत की कथा — चोरी और क्षमा
महेशान नमस्तुभ्यं नमस्ते रुद्र मन्यवे।
उत ते इषवे नमो नमस्ते अस्तु धन्वने।
नमस्ते गृणते तुभ्यं नमो नमश्च तन्वते।
विश्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्य इडामहे सतो नमः॥
Maheśāna Namastubhyaṃ Namaste Rudra Manyave | Uta Te Iṣave Namo Namaste Astu Dhanvane
हे महेशान! आपको नमस्कार। हे रुद्र! आपके क्रोध को नमस्कार। आपके बाण को नमस्कार, आपके धनुष को नमस्कार। आपकी स्तुति करने वाले को नमस्कार, फैलाने वाले को नमस्कार। समस्त प्राणियों में विद्यमान आपको बारम्बार नमन।
✦ ९ ✦
॥ श्लोक ९ ॥
नमो हिरण्यबाहवे — रुद्र नमस्कार
नमो हिरण्यबाहवे सेनान्ये दिशां च पतये नमः।
नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यः पशूनां पतये नमः।
नमः सस्पिञ्जराय त्विषीमते पथीनां पतये नमः।
नमो बभ्लुशाय विव्याधिने अन्नानां पतये नमः॥
Namo Hiraṇyabāhave Senānye Diśāṃ ca Pataye Namaḥ | Namo Vṛkṣebhyo Harikeśebhyaḥ Paśūnāṃ Pataye Namaḥ
सुनहरी भुजाओं वाले, दिशाओं के सेनापति को नमस्कार। हरे-वृक्षों जैसे जटाधारी पशुपति को नमस्कार। तेजस्वी, मार्गों के स्वामी को नमस्कार। सभी अन्न के स्वामी को नमस्कार।
✦ १० ✦
॥ श्लोक १० ॥
विनायकं त्वाम् — शिव को ही ब्रह्मांड
विनायकं त्वामहमीश मन्ये नाभिनवमथो।
बन्धुं बन्धुरता यतः कृतोऽसि बन्धनात्परम्।
व्रजन्ति देवाः परमं पदं ते सेवापरा येन।
त्वं ब्रह्मचर्येण परं ब्रह्म स्वकीयमासादितम्॥
Vināyakaṃ Tvāmaham-Īśa Manye Nābhinavam-atho | Bandhuṃ Bandhutā Yataḥ Kṛto'si Bandhanāt-Param
हे ईश! मैं आपको विनायक मानता हूँ — क्योंकि आप ही बंधन से परे हैं और सभी के बंधु हैं। जो देवता आपकी सेवा में लगे हैं, वे आपके परमपद को पाते हैं। आपने ब्रह्मचर्य से परब्रह्म को अपना स्वरूप पाया है।
✦ ११–२० ✦
॥ श्लोक ११ ॥
रावण की स्तुति और कैलास प्रसंग
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥
Tava Tattvaṃ Na Jānāmi Kīdṛśo'si Maheśvara | Yādṛśo'si Mahādeva Tādṛśāya Namo Namaḥ
हे महेश्वर! मैं आपका तत्त्व नहीं जानता कि आप कैसे हैं। हे महादेव! आप जैसे भी हैं — उस स्वरूप को नमस्कार! नमस्कार!
✦ १२ ✦
॥ श्लोक १२ ॥
कालकण्ठः — विष और करुणा
त्रिदशगुरुरपि त्रैलोक्यस्य तद्वद् नम-
स्कृतिमनुदिनं यन्त्रैः प्राप्य ते पार्श्वमागात्।
स्वयमपि न यतस्तत्तत्त्वं विदुस्तं शंभुं
प्रणतपरिजनं पाति शंकरं शरणं व्रजे॥
Tridaśa-Gurur-api Trailokyasya Tadvad Nama-skṛtim | Anudinaṃ Yantraiḥ Prāpya Te Pārśvam-āgāt
देवगुरु बृहस्पति भी नित्य यंत्रों के माध्यम से आपके समीप पहुँचने का प्रयास करते हैं — क्योंकि वे भी आपका तत्त्व नहीं जान पाते। जो शंभु अपने भक्तजनों की रक्षा करते हैं, उन शंकर की शरण में मैं जाता हूँ।
✦ १३ ✦
॥ श्लोक १३ ॥
भस्म और श्मशान — वैराग्य का स्वरूप
भवः कर्ता भवस्त्राता भवो हर्ता च संकटे।
आगतासु विपत्तिषु भवस्तारयते नरम्॥
Bhavaḥ Kartā Bhavas-Trātā Bhavo Hartā ca Saṃkaṭe | Āgatāsu Vipattitṣu Bhavas-Tārayate Naram
भव ही कर्ता हैं, भव ही रक्षक हैं, संकट में भव ही हर्ता (हरने वाले) हैं। विपत्तियाँ आने पर भव ही मनुष्य को तारते (मुक्त करते) हैं।
✦ १४–२० ✦
॥ श्लोक १४ ॥
त्रिनेत्र — ज्ञान का प्रकाश
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
त्वं एव माता च पिता त्वमेव त्वं एव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वं एव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वं एव सर्वं मम देव देव॥
Ayaṃ Nijaḥ Paro Veti Gaṇanā Laghu-Cetasām | Udāra-Caritānāṃ tu Vasudhāiva Kuṭumbakam
"यह अपना है, वह पराया है" — यह संकीर्ण विचार क्षुद्र हृदय वालों का है। उदार चरित्र वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही परिवार है। हे देव! आप ही माता हैं, पिता हैं, बंधु-सखा हैं, विद्या हैं, धन हैं — आप ही मेरे सब कुछ हैं।
✦ १५–२० ✦
॥ श्लोक १५–२० ॥
शिव के विविध स्वरूप और लीलाएँ
सूर्यो ह्यग्निरपश्चैव विद्युच्चन्द्रस्तथैव च।
एते शिवस्य नेत्राणि ज्योतींषि विविधानि च॥

रुद्र कोपेन जगद् ध्वंसं पुनः स्रष्टा च शंकरः।
अस्मत्पुत्रप्रसूत्यर्थं शिवः सृष्टिं करोति च॥
Sūryo Hyagnir-Apaśc-aiva Vidyuc-Candras-tathāiva ca | Ete Śivasya Netrāṇi Jyotīṃṣi Vividhāni ca
सूर्य, अग्नि, जल, विद्युत और चंद्रमा — ये सभी शिव के नेत्र हैं और विविध ज्योतियाँ हैं। रुद्र के क्रोध से जगत का विनाश होता है और शंकर फिर से सृष्टि करते हैं। शिव ही संतानोत्पत्ति के लिए सृष्टि करते हैं।
✦ २१–३० ✦
॥ श्लोक २१–२५ ॥
शिव और काम-दहन की कथा
यत्र तत्र मृताः सन्ति तान् उद्धर्तुं यतस्त्वया।
वेदोक्तमार्गमासाद्य प्राणिनस्त्वं विमोचयेः॥

नैव तज्ज्ञानमार्गेण न च भक्त्यैकभावनात्।
प्राप्यते परमं ब्रह्म प्रपत्त्याऽऽशु विमुच्यते॥
Yatra Tatra Mṛtāḥ Santi Tān Uddhartum Yatastayā | Vedokta-Mārgam-Āsādya Prāṇinas-tvaṃ Vimocayeḥ
जहाँ-तहाँ मरे हुए जीवों को उठाने के लिए आप वेदोक्त मार्ग से उन्हें मुक्त करते हैं। न केवल ज्ञान-मार्ग से, न केवल भक्ति से — परब्रह्म प्राप्त होता है, किंतु शरणागति (प्रपत्ति) से शीघ्र मुक्ति मिलती है।
✦ २६–३५ ✦
॥ श्लोक २६–३० ॥
विश्वरूप और सर्वव्यापकता
मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥
Mano Buddhy-Ahaṃkāra-Cittāni Nāham | Na ca Śrotra-Jihve Na ca Ghrāṇa-Netre
मैं मन नहीं, बुद्धि नहीं, अहंकार नहीं, चित्त नहीं। मैं कान नहीं, जीभ नहीं, नासिका नहीं, नेत्र नहीं। मैं आकाश नहीं, पृथ्वी नहीं, तेज नहीं, वायु नहीं। मैं चिदानन्दरूप हूँ — शिव हूँ, शिव हूँ।
✦ ३१–४० ✦
॥ श्लोक ३१–३५ ॥
पुष्पदंत की क्षमा-याचना
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदो न यज्ञः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥
Na Puṇyaṃ Na Pāpaṃ Na Saukhyaṃ Na Duḥkhaṃ | Na Mantro Na Tīrthaṃ Na Vedo Na Yajñaḥ
न पुण्य है, न पाप, न सुख, न दुःख। न मंत्र, न तीर्थ, न वेद, न यज्ञ। मैं भोजन नहीं हूँ, न भोज्य वस्तु, न भोक्ता। मैं चिदानन्दरूप हूँ — शिव हूँ, शिव हूँ।
✦ ३६–४३ ✦
॥ श्लोक ३६–४० ॥
शिव की असीम महिमा — उपसंहार
न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥
Na Mṛtyur-Na Śaṃkā Na Me Jāti-Bhedaḥ | Pitā Naiva Me Naiva Mātā Na Janma
न मृत्यु है, न भय, न जाति-भेद। न पिता है, न माता, न जन्म। न बंधु है, न मित्र, न गुरु, न शिष्य। मैं चिदानन्दरूप हूँ — शिव हूँ, शिव हूँ।
✦ ४१–४३ ✦
॥ श्लोक ४१–४३ ॥
अन्तिम प्रार्थना — पुष्पदंत की विनती
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेयः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥
Ahaṃ Nirvikalpo Nirākārarūpo | Vibhutvācca Sarvatra Sarvendriyāṇām
मैं निर्विकल्प हूँ, निराकार हूँ। विभुत्व (सर्वव्यापकता) से समस्त इन्द्रियों में सर्वत्र हूँ। न संग है, न बंधन, न मुक्ति की चाह। मैं चिदानन्दरूप हूँ — शिव हूँ, शिव हूँ।
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नःस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
Maheśān-nāparo Devo Mahimno Nāparā Stutiḥ | Aghorān-nāparo Mantro Nāsti Tattvaṃ Guroḥ Param
महेश से बड़ा कोई देव नहीं, महिम्नः स्तोत्र से बड़ी कोई स्तुति नहीं, अघोर से बड़ा कोई मंत्र नहीं, और गुरु से परे कोई तत्त्व नहीं। दीक्षा, दान, तप, तीर्थ, ज्ञान, यज्ञ — ये सभी मिलकर भी महिम्नः स्तोत्र के पाठ की सोलहवीं कला के बराबर नहीं हैं।

📖 शिव महिम्नः स्तोत्र — पुष्पदंत की कथा

यह स्तोत्र गन्धर्व पुष्पदंत ने रचा था। कथा है कि पुष्पदंत एक राजा के बाग से पूजा के लिए शिव को प्रतिदिन पुष्प चुराते थे। एक दिन राजा ने बाग में बिल्वपत्र बिछा दिए — जिन पर पैर रखने से पुष्पदंत की दैवीय शक्ति नष्ट हो गई। तब शिव की कृपा पाने के लिए उन्होंने यह महिम्नः स्तोत्र रचा।

यह स्तोत्र न केवल भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि दार्शनिक गहराई की दृष्टि से भी अद्वितीय है। इसमें "शिवोऽहम्" का सिद्धांत — "मैं ही शिव हूँ" — अद्वैत वेदांत का सार है।

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गन्धर्व रचनापुष्पदंत स्वर्ग के गन्धर्व थे जिन्हें संगीत और काव्य में अतुलनीय दक्षता थी। यह स्तोत्र उनकी काव्य-प्रतिभा का शिखर है।
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बिल्वपत्र प्रसंगबिल्वपत्र पर पैर रखने से पुष्पदंत की शक्ति गई — यही कारण है कि शिव-पूजा में बिल्वपत्र की इतनी महिमा है।
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शिवोऽहम् का दर्शन"चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्" — आदि शंकराचार्य के अद्वैत का सार: आत्मा और परमात्मा एक ही हैं।
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सर्वोत्कृष्ट स्तोत्रफलश्रुति में स्वयं कहा है — दान, तप, तीर्थ, यज्ञ सब मिलकर भी इस स्तोत्र की सोलहवीं कला के बराबर नहीं।
📖 भक्तों के विचार

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SHIV MAHIMNA STOTRA
४३ श्लोक • पुष्पदंत