🌟🌟
🌟🌟
✦ शिवाष्टकम् — सम्पूर्ण ८ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
प्राणनाथ, विश्वनाथ — सदानंद
प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं
जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजम्।
भवाब्धितरणं परानन्दधाम
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्॥
Prabhuṃ Prāṇanāthaṃ Vibhuṃ Viśvanāthaṃ | Jagannātha-Nāthaṃ Sadānanda-Bhājam | Bhavābdhi-Taraṇaṃ Parānanda-Dhāma | Bhaje Pāñcajanyaṃ Bhaje Śūlapāṇim
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्
मैं उन शिव का भजन करता हूँ जो प्राणनाथ (प्राणों के स्वामी) हैं, विभु (सर्वव्यापी) हैं, विश्वनाथ हैं, जगन्नाथों के भी नाथ हैं, सदा आनंदस्वरूप हैं — जो भव-सागर से तारने वाले हैं, परम आनंद के धाम हैं, पाञ्चजन्य (शंख) और त्रिशूल धारण करने वाले हैं।
~ 🌙 ~
॥ श्लोक २ ॥
गले रुण्डमाल — सर्पभूषण
गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं
महाकालकालं गणेशाधिपालम्।
जटाजूटगंगोत्तरंगैर्विशालं
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्॥
Gale Ruṇḍa-Mālaṃ Tanau Sarpa-Jālaṃ | Mahākāla-Kālaṃ Gaṇeśā-Dhipālam | Jaṭā-Jūṭa-Gaṅgottaraṅgair-Viśālaṃ | Bhaje Pāñcajanyaṃ Bhaje Śūlapāṇim
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्
जिनके गले में रुण्डों की माला है, शरीर पर सर्पों का जाल है, जो महाकाल के भी काल हैं, गणेश के अधिपति हैं — जिनकी जटाओं में गंगा की उत्ताल तरंगें विशाल रूप से बह रही हैं — उन पाञ्चजन्यधारी शूलपाणि का मैं भजन करता हूँ।
~ 🌙 ~
॥ श्लोक ३ ॥
भवानीपति — चंद्रशेखर
भवानीपतिं चंद्रशेखरम्
चराचरेशं महेश्वरम्।
त्रिलोकेशमादिं निरामयम्
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्॥
Bhavānī-Patiṃ Candra-Śekharam | Carācareśaṃ Maheśvaram | Triloke-Śam-Ādiṃ Nirāmayam | Bhaje Pāñcajanyaṃ Bhaje Śūlapāṇim
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्
भवानी (पार्वती) के पति, चंद्रशेखर (चंद्रमा को शीश पर धारण करने वाले), चर-अचर के ईश्वर महेश्वर — तीनों लोकों के स्वामी, आदि-अनादि, निरोग और निर्मल — उन शूलपाणि का मैं भजन करता हूँ।
~ 🌙 ~
॥ श्लोक ४ ॥
कपालधारी — पशुपति
कपालं करे शूलमेकं करे
मृगं चाभयं दक्षिणे वामयोः।
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्॥
Kapālaṃ Kare Śūlam-Ekaṃ Kare | Mṛgaṃ Cābhayaṃ Dakṣiṇe Vāmayoḥ | Paśūnāṃ Patiṃ Pāpa-Nāśaṃ Pareśaṃ | Bhaje Pāñcajanyaṃ Bhaje Śūlapāṇim
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्
एक हाथ में कपाल, दूसरे में त्रिशूल, दाहिने और बाएँ हाथों में मृग और अभयमुद्रा धारण करने वाले — पशुपति (प्राणियों के स्वामी), पापनाशक, परमेश्वर — उन शूलपाणि का मैं भजन करता हूँ।
~ 🌙 ~
॥ श्लोक ५ ॥
शिव-नेत्र — विश्वरूप
विशालाक्षमाद्यं जगत्कारणं
निराकारमोंकाररूपं निधानम्।
सदा तं भजामि शिवं शंकरं
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्॥
Viśālākṣam-Ādyaṃ Jagat-Kāraṇaṃ | Nirākāram-Oṃkāra-Rūpaṃ Nidhānam | Sadā Taṃ Bhajāmi Śivaṃ Śaṃkaraṃ | Bhaje Pāñcajanyaṃ Bhaje Śūlapāṇim
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्
विशाल नेत्रों वाले, जगत् के आदि कारण, निराकार, ओंकार-स्वरूप और सर्व-निधान — उन शिव-शंकर का मैं सदा भजन करता हूँ। वही पाञ्चजन्यधारी शूलपाणि हैं जिन्हें मैं भजता हूँ।
~ 🌙 ~
॥ श्लोक ६ ॥
अनादि — मृत्युंजय
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तमः पारमाद्यन्तहीनं
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्॥
Ajaṃ Śāśvataṃ Kāraṇaṃ Kāraṇānāṃ | Śivaṃ Kevalaṃ Bhāsakaṃ Bhāsakānām | Turīyaṃ Tamaḥ-Pāram-Ādyanta-Hīnaṃ | Bhaje Pāñcajanyaṃ Bhaje Śūlapāṇim
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्
अज (अजन्मा), शाश्वत, समस्त कारणों के कारण, केवल शिव — समस्त प्रकाश के प्रकाशक, तुरीय अवस्था (चतुर्थ अवस्था), अंधकार से परे, आदि-अंत-रहित — उन पाञ्चजन्य-शूलपाणि का मैं भजन करता हूँ।
~ 🌙 ~
॥ श्लोक ७ ॥
भस्मधारी — श्मशानेश्वर
स्मशानेशमाद्यं पुराणं पुरारिं
नमद्ब्रह्मविष्णुं मनोवागतीतम्।
सकृत्कीर्तनात् पापनाशं भयारिं
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्॥
Śmaśāneśam-Ādyaṃ Purāṇaṃ Purāriṃ | Namad-Brahma-Viṣṇuṃ Mano-Vāg-Atītam | Sakṛt-Kīrtanāt Pāpa-Nāśaṃ Bhayāriṃ | Bhaje Pāñcajanyaṃ Bhaje Śūlapāṇim
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्
श्मशान के ईश्वर, आदि पुराण, त्रिपुर के शत्रु (पुरारि), जिन्हें ब्रह्मा और विष्णु नमन करते हैं, मन और वाणी से परे — एक बार कीर्तन मात्र से पापों का नाश और भय का अंत करने वाले — उन शूलपाणि का मैं भजन करता हूँ।
~ 🌙 ~
॥ श्लोक ८ ॥
करुणासागर — जगदीश्वर
रसं तं सदानन्दरूपं भजेऽहं
जगद्विश्वरूपं जगत्कारणं तम्।
करुणासमुद्रं महेशं महान्तं
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्॥
Rasaṃ Taṃ Sadānanda-Rūpaṃ Bhaje'ham | Jagad-Viśva-Rūpaṃ Jagat-Kāraṇaṃ Tam | Karuṇā-Samudraṃ Maheśaṃ Mahāntaṃ | Bhaje Pāñcajanyaṃ Bhaje Śūlapāṇim
भजे पाञ्चजन्यं भजे शूलपाणिम्
मैं उस सदानंद-रस-स्वरूप का भजन करता हूँ — जो जगद्-विश्वरूप हैं, जगत् के कारण हैं, करुणा के सागर हैं, महेश और महान् हैं — उन पाञ्चजन्यधारी शूलपाणि का मैं भजन करता हूँ।
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
शिवाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
एकवारं पठेन्नित्यं पापेभ्यः परिमुच्यते।
सर्वदुःखविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति॥
Śivāṣṭakam-idaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhet śiva-sannidhau | Śivalokam-avāpnoti Śivena saha modate | Ekavāraṃ paṭhen-nityaṃ pāpebhyaḥ parimucyate | Sarvaduḥkha-vinirmuktaḥ śivalokaṃ sa gacchati
जो इस पवित्र शिवाष्टकम् का शिव-सन्निधि में पाठ करता है वह शिवलोक को प्राप्त करता है और शिव के साथ आनंद भोगता है। जो प्रतिदिन एक बार भी इसका पाठ करे, वह पापों से मुक्त हो जाता है और समस्त दुःखों से निर्मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है।
Please login/register for write comments