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✦ वेदसार शिवस्तव स्तोत्रम् — सम्पूर्ण ११ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
महादेव — स्मरारि का ध्यान
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम् ।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥१॥
Paśūnāṃ patiṃ pāpanāśaṃ pareśaṃ gajendrasya kṛttiṃ vasānaṃ vareṇyam | Jaṭājūṭamadhye sphuradgāṅgavāriṃ mahādevamekaṃ smarāmi smarārim
मैं उस महादेव का स्मरण करता हूँ जो पशुओं के स्वामी हैं, पापों का नाश करने वाले हैं, परमेश्वर हैं, गज-चर्म धारण करने वाले, वरेण्य (सबसे श्रेष्ठ) हैं — जिनकी जटाओं के बीच गंगा की धारा प्रकाशित होती है, और जो कामदेव के शत्रु (स्मरारि) हैं।
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॥ श्लोक २ ॥
पञ्चवक्त्र — पाँच मुखों वाले शिव
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् ।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्निं त्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥२॥
Maheśaṃ sureśaṃ surārātināśaṃ vibhuṃ viśvanāthaṃ vibhūtyaṃgabhūṣam | Virūpākṣaminduarkavahniṃ trinetraṃ sadānandamīḍe prabhuṃ pañcavaktram
मैं उन प्रभु पञ्चवक्त्र (पाँच मुखों वाले) शिव की स्तुति करता हूँ जो महेश, देवों के ईश, असुरों का नाश करने वाले, व्यापक, विश्वनाथ, भस्म से देह को अलंकृत करने वाले हैं — जिनके तीन नेत्र चन्द्र, सूर्य और अग्नि हैं — जो विरूपाक्ष (विशिष्ट नयनों वाले) और सदा आनंदमय हैं।
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॥ श्लोक ३ ॥
भवानीकळत्र — गिरिशं का भजन
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम् ।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकळत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥३॥
Girīśaṃ gaṇeśaṃ gale nīlavarṇaṃ gavendrādhirūḍhaṃ guṇātītarūpam | Bhavaṃ bhāsvaraṃ bhasmanā bhūṣitāṅgaṃ bhavānīkaḷatraṃ bhaje pañcavaktram
मैं उन पञ्चवक्त्र शिव का भजन करता हूँ जो गिरियों (पहाड़ों) के स्वामी हैं, गणों के ईश हैं, नीलकंठ हैं, नन्दी (श्रेष्ठ बैल) पर विराजमान हैं, त्रिगुणातीत स्वरूप वाले हैं — जो तेजोमय भव हैं, भस्म से विभूषित हैं, और भवानी के पति हैं।
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॥ श्लोक ४ ॥
विश्वरूप — प्रसन्नता की प्रार्थना
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिन जटाजूटधारिन् ।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥४॥
Śivākānta śambho śaśāṅkārdhamāule maheśāna śūlin jaṭājūṭadhārin | Tvameko jagadvyāpako viśvarūpa prasīda prasīda prabho pūrṇarūpa
हे शिवप्रिय, हे शंभो, हे अर्धचंद्रमौलि, हे महेशान, हे त्रिशूलधारी, हे जटाजूटधारी — आप ही एकमात्र जगद्व्यापी विश्वरूप हैं। हे पूर्णरूप प्रभो, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों!
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॥ श्लोक ५ ॥
जगद्बीजम् — सृष्टि-स्थिति-लय के स्वामी
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम् ।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥५॥
Parātmānamekam jagadbījamādyaṃ nirīhaṃ nirākāramokāravedyam | Yato jāyate pālyate yena viśvaṃ tamīśaṃ bhaje līyate yatra viśvam
मैं उस एकमात्र परमात्मा का भजन करता हूँ जो जगत के मूल कारण हैं, आद्य हैं, निष्क्रिय हैं, निराकार हैं, ओंकार से जाने जाते हैं — जिनसे यह विश्व उत्पन्न होता है, जिनके द्वारा पालित होता है, और जिनमें लय को प्राप्त होता है।
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॥ श्लोक ६ ॥
त्रिमूर्तिम् — निर्गुण निराकार शिव
न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा ।
न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे ॥६॥
Na bhūmirna cāpo na vahnirnа vāyurna cākāśamāste na tandrā na nidrā | Na grīṣmo na śītaṃ na deśo na veṣo na yasyāsti mūrtistrimūrtiṃ tamīḍe
जिनके लिए न पृथ्वी है, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश; जिन्हें न तन्द्रा है, न निद्रा; जिन्हें न ग्रीष्म है, न शीत; जिनका न कोई देश है, न वेश; जिनकी कोई मूर्ति नहीं — उन त्रिमूर्ति शिव की मैं स्तुति करता हूँ।
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॥ श्लोक ७ ॥
द्वैतहीनम् — अद्वैत परं तत्त्व
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम् ।
तुरीयं तमः पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥७॥
Ajaṃ śāśvataṃ kāraṇaṃ kāraṇānāṃ śivaṃ kevalaṃ bhāsakaṃ bhāsakānām | Turīyaṃ tamaḥ pāramādyantahīnaṃ prapadye paraṃ pāvanaṃ dvaitahīnam
मैं उन परम पावन द्वैतहीन तत्त्व की शरण लेता हूँ जो अजन्मे हैं, शाश्वत हैं, सभी कारणों के कारण हैं, शिव हैं, केवल हैं, सभी प्रकाशकों के प्रकाशक हैं — जो तुरीयावस्था में हैं, अंधकार के पार हैं, आदि-अंत से रहित हैं।
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॥ श्लोक ८ ॥
नमस्ते — अष्टविध प्रणाम
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते ।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥८॥
Namaste namaste vibho viśvamūrte namaste namaste cidānandamūrte | Namaste namaste tapoyogagamya namaste namaste śrutijñānagamya
हे विभो, हे विश्वमूर्ते — आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे चिदानन्दमूर्ते — आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे तप और योग से प्राप्य — आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे वेद और ज्ञान से जाने जाने वाले — आपको नमस्कार है, नमस्कार है।
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॥ श्लोक ९ ॥
वरेण्यः — शिव से श्रेष्ठ कोई नहीं
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्र ।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥९॥
Prabho śūlapāṇe vibho viśvanātha mahādeva śambho maheśa trinetra | Śivākānta śānta smarāre purāre tvadanyo vareṇyo na mānyo na gaṇyaḥ
हे प्रभो, हे शूलपाणि, हे विभो, हे विश्वनाथ, हे महादेव, हे शंभो, हे महेश, हे त्रिनेत्र, हे शिवप्रिय, हे शांत, हे स्मरारि, हे पुरारि — आपके अतिरिक्त अन्य कोई वरेण्य नहीं, मान्य नहीं, गण्य नहीं।
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॥ श्लोक १० ॥
महेश्वरः — करुणामय काशीपति
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।
काशीपते करुणया जगदेतदेकस्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥१०॥
Śambho maheśa karuṇāmaya śūlapāṇe gaurīpate paśupate paśupāśanāśin | Kāśīpate karuṇayā jagadetadekastvaṃ haṃsi pāsi vidadhāsi maheśvaro'si
हे शंभो, हे महेश, हे करुणामय, हे शूलपाणि, हे गौरीपति, हे पशुपति, हे पशु-पाश-नाशक — हे काशीपति! आप ही अपनी करुणा से इस जगत का संहार करते हैं, पालन करते हैं, रचना करते हैं। आप ही महेश्वर हैं।
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॥ श्लोक ११ ॥
लिङ्गात्मकम् — सृष्टि-स्थिति-लय का रहस्य
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगनमृड विश्वनाथ ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥११॥
Tvatto jagadbhavati deva bhava smarāre tvayyeva tiṣṭhati jaganamṛḍa viśvanātha | Tvayyeva gacchati layaṃ jagadetadīśa liṅgātmakaṃ hara carācaraviśvarūpin
हे देव, हे भव, हे स्मरारि — आपसे ही यह जगत उत्पन्न होता है। हे मृड, हे विश्वनाथ — यह जगत आप में ही स्थित है। हे ईश — यह जगत आप में ही लय को प्राप्त होता है। हे हर, हे चराचर विश्वरूपी — आप लिंगात्मक हैं।
इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितो वेदसारशिवस्तवः संपूर्णः ॥
Thus ends Vedasara Shivastava Stotram by Sri Shankaracharya