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✦ श्री विश्वनाथाष्टकम् — सम्पूर्ण ८ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
गंगाजटाधारी विश्वनाथ
गङ्गातरङ्गरमणीयजटाकलापं
गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् ।
नारायणप्रियमनङ्गमदापहारं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥१॥
Ganggaa-Tarangga-Ramanniiya-Jattaa-Kalaapam | Gaurii-Nirantara-Vibhuussita-Vaama-Bhaagam |
Naaraayanna-Priyam-Anangga-Madaa-Apahaaram | Vaaraannasii-Pura-Patim Bhaja Vishvanaatham
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्
गंगा की लहरों से सुशोभित जटाओं वाले, जिनका वाम भाग सदा देवी गौरी से अलंकृत है, जो श्री नारायण को प्रिय हैं और जिन्होंने कामदेव का मद चूर किया — उन काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ की आराधना करो।
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॥ श्लोक २ ॥
वाणी से परे, अर्धनारीश्वर
वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं
वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम् ।
वामेन विग्रहवरेण कलत्रवन्तं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥२॥
Vaacaam-Agocaram-Aneka-Gunna-Svaruupam | Vaagiisha-Vissnnu-Sura-Sevita-Paada-Piittham |
Vaamena Vigraha-Varenna Kalatravantam | Vaaraannasii-Pura-Patim Bhaja Vishvanaatham
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्
अनेक दिव्य गुणों के स्वरूप, वाणी से परे, जिनके चरणकमलों की सेवा ब्रह्मा, विष्णु और देवगण करते हैं, और जो अपने वाम विग्रह (अर्धनारीश्वर रूप) में सहधर्मिणी सहित विराजमान हैं — उन काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ की आराधना करो।
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॥ श्लोक ३ ॥
भूताधिपति, सर्पभूषण, त्रिनेत्र
भूताधिपं भुजगभूषणभूषिताङ्गं
व्याघ्राजिनाम्बरधरं जटिलं त्रिनेत्रम् ।
पाशाङ्कुशाभयवरप्रदशूलपाणिं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥३॥
Bhuuta-Adhipam Bhujaga-Bhuussanna-Bhuussita-Anggam | Vyaaghra-Ajina-Ambara-Dharam Jattilam Tri-Netram |
Paasha-Angkusha-Abhaya-Vara-Prada-Shuula-Paannim | Vaaraannasii-Pura-Patim Bhaja Vishvanaatham
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्
समस्त भूतों के स्वामी, सर्पाभूषणों से विभूषित देह वाले, व्याघ्रचर्म के वस्त्रधारी, जटाधारी और त्रिनेत्री — जो पाश, अंकुश धारण करते हैं, अभय और वर देते हैं तथा त्रिशूल हाथ में लिए हैं — उन काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ की आराधना करो।
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॥ श्लोक ४ ॥
चन्द्रमुकुट, कामदाहक, नागकर्णपूर
शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं
भालेक्षणानलविशोषितपञ्चबाणम् ।
नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥४॥
Shiitaamshu-Shobhita-Kiriitta-Viraajamaanam | Bhaale-Ikssanna-Anala-Vishossita-Pan.cabaannam |
Naaga-Adhipa-Aracita-Bhaasura-Karnnapuuram | Vaaraannasii-Pura-Patim Bhaja Vishvanaatham
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्
शीतल चन्द्रमा जिनका मुकुट बना है, जिनके ललाट के तृतीय नेत्र की अग्नि ने कामदेव के पाँचों बाणों को भस्म किया, और जिनके कर्णों में नागराज से निर्मित दीप्तिमान आभूषण शोभित हैं — उन काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ की आराधना करो।
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॥ श्लोक ५ ॥
पंचानन — दुर्गुणों के संहारक
पञ्चाननं दुरितमत्तमतङ्गजानां
नागान्तकं दनुजपुङ्गवपन्नगानाम् ।
दावानलं मरणशोकजराटवीनां
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥५॥
Pan.caananam Durita-Matta-Matanggajaanaam | Naaga-Antakam Danuja-Punggava-Pannagaanaam |
Daavaanalam Maranna-Shoka-Jaraa-Attaviinaam | Vaaraannasii-Pura-Patim Bhaja Vishvanaatham
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्
पाप और वासनाओं के मत्त हाथियों के लिए सिंह समान, दानवों के नाग-प्रमुखों को नष्ट करने वाले गरुड़ सदृश, और मृत्यु, शोक व वृद्धावस्था के वन को भस्म करने वाले दावानल — उन काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ की आराधना करो।
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॥ श्लोक ६ ॥
तेजोमय, आनन्दकन्द, अद्वैत
तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीयम्
आनन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम् ।
नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥६॥
Tejomayam Sagunna-Nirgunnam-Advitiiyam | Aananda-Kandam-Aparaajitam-Aprameyam |
Naaga-Aatmakam Sakala-Nisskalam-Aatmaruupam | Vaaraannasii-Pura-Patim Bhaja Vishvanaatham
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्
दिव्य तेजस्वी, सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में अद्वितीय, आनन्द के मूलस्रोत, अपराजित, अप्रमेय — जिनका शरीर नागों से अलंकृत है और जिनका स्वरूप चिदाकाश में पूर्ण एवं अखंड है — उन काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ की आराधना करो।
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॥ श्लोक ७ ॥
वैराग्य-शांति के आश्रय, गरलधारी
रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागं
वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम् ।
माधुर्यधैर्यसुभगं गरलाभिरामं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥७॥
Raaga-Aadi-Dossa-Rahitam Svajana-Anuraagam | Vairaagya-Shaanti-Nilayam Girijaa-Sahaayam |
Maadhurya-Dhairya-Subhagam Garala-Abhiraamam | Vaaraannasii-Pura-Patim Bhaja Vishvanaatham
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्
राग, द्वेष आदि सभी दोषों से रहित, भक्तों पर स्नेह करने वाले, वैराग्य और शांति के निवास, देवी गिरिजा के सहचर — जो माधुर्य और धैर्य से सुशोभित हैं और जिनका कंठ विष की नीलिमा से सुन्दर है — उन काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ की आराधना करो।
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॥ श्लोक ८ ॥
आत्मसाक्षात्कार — मोक्ष का मार्ग
आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दां
पापे रतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ ।
आदाय हृत्कमलमध्यगतं परेशं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥८॥
Aashaam Vihaaya Parihrtya Parasya Nindaam | Paape Ratim Ca Sunivaarya Manah Samaadhau |
Aadaaya Hrt-Kamala-Madhyagatam Paresham | Vaaraannasii-Pura-Patim Bhaja Vishvanaatham
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्
समस्त आशाओं को त्यागकर, दूसरों की निंदा से दूर रहकर, पाप में आसक्ति को सुनिवृत्त कर मन को समाधि में लगाकर — हृदयकमल के मध्य स्थित उस परमेश्वर को ग्रहण करते हुए — उन काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ की आराधना करो।
वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य
व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः
— फलश्रुति श्लोक (नवम श्लोक) —
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य
व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः ।
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥९॥
Vaarannasii-Pura-Pate Stavanam Shivasya | Vyaakhyaatam-Asttakam-Idam Pattate Manuussyah |
Vidyaam Shriyam Vipula-Saukhyam-Ananta-Kiirtim | Sampraapya Deha-Vilaye Labhate Ca Moksham
जो मनुष्य काशी के अधिपति भगवान शिव के इस विश्वनाथाष्टकम् का नित्य पाठ करता है — वह विद्या, लक्ष्मी, अपार सुख और अनन्त यश को प्राप्त करता है, और देह के विलय पर मोक्ष की प्राप्ति करता है।
🌊 काशी विश्वनाथ — ज्योतिर्लिंग की महिमा
काशी (वाराणसी) भारत की प्राचीनतम नगरी है, और भगवान विश्वनाथ यहाँ के सप्तम ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं। गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित इस तीर्थ में मृत्यु को स्वयं शिव तारक मंत्र देते हैं।
यह अष्टक भगवान विश्वनाथ के उस स्वरूप का वर्णन करता है जो एक साथ सगुण और निर्गुण, भोगी और योगी, करुणामय और संहारक है — अर्धनारीश्वर के रूप में शक्ति सहित सदा पूर्ण।
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गंगाजटाधारीभगवान शिव की जटाओं में माँ गंगा का वास है। गंगातरंग से सुशोभित उनकी जटाएँ भक्तों को पाप से मुक्त करती हैं।
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चन्द्रशेखरशीतल चन्द्रमा उनके मस्तक पर विराजमान है — ताप और ज्वर को शान्त करने की शक्ति का प्रतीक।
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त्रिशूलधारीतीन गुणों — सत्व, रज, तम — के नियंता, जो सृष्टि, पालन और संहार करते हैं।
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काशी — मोक्षनगरीमृत्यु के समय यहाँ शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं। इस अष्टक का पाठ उस कृपा को जीवन में ही उतारता है।