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✦ शिव मानस पूजा — सम्पूर्ण ५ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
पूजा-सामग्री — आसन से दीप तक
💎 रत्न-आसन
❄️ हिमजल-स्नान
👘 दिव्य-वस्त्र
🌸 पुष्प-धूप-दीप
रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥
Ratnaiḥ kalpitam-āsanaṃ himajalaiḥ snānaṃ ca divyāmbaraṃ | Nānā-ratna-vibhūṣitaṃ mṛgamadā-modāṅkitaṃ candanam | Jātī-campaka-bilvapattra-racitaṃ puṣpaṃ ca dhūpaṃ tathā | Dīpaṃ deva dayānidhe paśupate hṛtkalpitaṃ gṛhyatām
हृत्कल्पितं गृह्यताम् — देव दयानिधे पशुपते
हे करुणा के सागर पशुपति देव! — रत्नों से बना आसन, हिमजल से स्नान, दिव्य वस्त्र, अनेक रत्नों से भूषित और कस्तूरी-चंदन, जाती-चंपक-बेलपत्र से रचित पुष्प, धूप और दीप — ये सब हृदय में कल्पित करके अर्पण करता हूँ, कृपया स्वीकार करें।
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॥ श्लोक २ ॥
नैवेद्य — भोजन और पान
🥘 पंचविध भोजन
🍌 रम्भाफल
💧 कर्पूर जल
🌿 ताम्बूल
सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम्।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥
Sauvarṇe navaratna-khaṇḍa-racite pātre ghṛtaṃ pāyasaṃ | Bhakṣyaṃ pañcavidhaṃ payodadhi-yutaṃ rambhāphalaṃ pānakam | Śākānām-ayutaṃ jalaṃ rucikaraṃ karpūra-khaṇḍojjvalaṃ | Tāmbūlaṃ manasā mayā viracitaṃ bhaktyā prabho svīkuru
मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु
नव-रत्नों से जड़े सोने के पात्र में — घी, खीर, दूध-दही युक्त पाँच प्रकार का भोजन, केले का पेय, हजारों प्रकार की सब्जियाँ, स्वादिष्ट जल, जलती कपूर की ज्योति और ताम्बूल (पान) — हे प्रभु! इन सबको मैंने मन से भक्ति सहित निर्मित किया है, कृपया स्वीकार करें।
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॥ श्लोक ३ ॥
छत्र, चामर, नृत्य और संगीत
☂️ छत्र (आकाश)
💨 वायु-चामर
🌟 सूर्य-चंद्र दीप
🎶 संगीत-नृत्य
छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकलागीतं च नृत्यं तथा।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत् समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥
Chatraṃ cāmara-yor-yugaṃ vyajanakaṃ cā-darśakaṃ nirmalaṃ | Vīṇā-bherī-mṛdaṅga-kāhala-kalā-gītaṃ ca nṛtyaṃ tathā | Sāṣṭāṅgaṃ praṇatiḥ stutiḥ bahuvidha hyetat samastaṃ mayā | Saṅkalpena samarpitaṃ tava vibho pūjāṃ gṛhāṇa prabho
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो
छत्र, दो चामर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदंग, काहल वाद्य, संगीत-कला और नृत्य — साष्टांग प्रणाम और अनेक प्रकार की स्तुतियाँ — यह सब संकल्प से तुम्हें अर्पित किया है, हे विभु प्रभु! इस पूजा को स्वीकार करो।
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॥ श्लोक ४ ॥
जीवन ही पूजा है — अद्वैत का सार
🧘 आत्मा = तुम
🧠 बुद्धि = पार्वती
💨 प्राण = सेवक
🚶 गमन = प्रदक्षिणा
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरः
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥
Ātmā tvaṃ girijā matiḥ sahacarāḥ prāṇāḥ śarīraṃ gṛhaṃ | Pūjā te viṣayopabhoga-racanā nidrā samādhi-sthitiḥ | Sañcāraḥ padayoḥ pradakṣiṇa-vidhiḥ stotrāṇi sarvā giraḥ | Yad-yat-karma karomi tat-tad-akhilaṃ Śambho tavā-rādhanam
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्
हे शम्भो! तुम ही मेरी आत्मा हो, गिरिजा (पार्वती) ही मेरी बुद्धि है, प्राण तुम्हारे साथी हैं, मेरा शरीर तुम्हारा घर है। विषयों का उपभोग ही तुम्हारी पूजा है, निद्रा ही समाधि है, मेरे पैरों का चलना ही प्रदक्षिणा है, मेरी सभी वाणी तुम्हारी स्तुति है। जो भी कर्म मैं करता हूँ — वह सब शम्भो, तुम्हारी आराधना है।
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॥ श्लोक ५ ॥
क्षमा-याचना — जय जय महादेव शम्भो
🙏 हाथ-पैर के दोष
🗣️ वाणी के दोष
👁️ नेत्र-श्रवण दोष
🧠 मन के दोष
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥
Kara-caraṇa-kṛtaṃ vāk-kāyajaṃ karma-jaṃ vā | Śravaṇa-nayana-jaṃ vā mānsaṃ vā-parādham | Vihitam-avihitaṃ vā sarvam-etat-kṣamasva | Jaya jaya karuṇābdhe śrī-mahādeva śambho
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो
हाथ-पैर से किए गए, वाणी-शरीर से उत्पन्न, कर्म से, कानों-नेत्रों से हुए या मन से किए गए — जो भी अपराध मैंने जाने या अनजाने में किए हों — हे करुणा के सागर श्रीमहादेव शम्भो! उन सबको क्षमा करें। जय जय महादेव!
🙏 मानस पूजा — मन ही मंदिर
शिव मानस पूजा की रचना आदि शंकराचार्य (788-820 ई.) ने की। इसमें पाँच श्लोकों में शिव की संपूर्ण पूजा मन में ही की जाती है — बाहरी सामग्री की कोई आवश्यकता नहीं। शंकराचार्य का अद्वैत-दर्शन यहाँ व्यावहारिक रूप में प्रकट होता है।
सबसे महत्वपूर्ण है श्लोक ४ — "आत्मा त्वं गिरिजा मतिः..." — जिसमें कहा गया है कि जीवन का हर कार्य शिव की आराधना है। यह श्लोक अद्वैत वेदांत का सार है। सिद्धयोग आश्रमों में यह स्तोत्र शिव-महिम्नः स्तोत्र के बाद नित्य गाया जाता है।
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मानसिक पूजा की शक्तिमन शरीर से अधिक शक्तिशाली है — अतः मानस पूजा बाह्य पूजा से श्रेष्ठ है। मन की एकाग्रता ही इसकी कुंजी है।
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असीमित अर्पणबाह्य पूजा में सामग्री सीमित होती है — मन में आप पूरे ब्रह्माण्ड को अर्पण कर सकते हैं।
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श्लोक ४ — अद्वैत का सार"यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्" — जीवन का प्रत्येक कर्म शिव-पूजा बन जाता है।
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सेवा में उपयोगसिद्धयोग में श्लोक ४ और ५ को सेवा शुरू करने से पहले पढ़ा जाता है — सेवा को भगवान को समर्पित करने के लिए।
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