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✦ उगना रे — विद्यापति का मैथिली गीत ✦
॥ पद १ ॥
मोर उगना कहाँ गया
उगना रे... मोर कतए गेलाह,
कतए गेला शिव कीदहू भेलाह मोर कतए गेलाह
Ugna Re... Mor Katae Gelah, Katae Gela Shiv Kidahu Bhelah Mor Katae Gelah
हे प्रिय! मेरा उगना (प्रिय, प्रेमी) कहाँ चला गया? वह कहाँ गया है? शिव के समान वह क्या बन गया है? मेरा प्रिय कहाँ चला गया है?
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भांग नहि बटुआ रुइस बैसलाह,
जोहि हेरि आनि देल हैंस उठलाह मोर कतए गेलाह
Bhang Nahi Batua Ruis Besalah, Johi Heri Ani Del Hans Uthlah Mor Katae Gelah
न तो भांग का पत्ता (गाँजा) है, न ही बटुआ की खोखली लकड़ी — उसी को देखकर हंस (राधा की सखी, कोई) आकर उठ गई। मेरा प्रिय कहाँ गया है?
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जे मोर उगनाक कहत उदेस,
ताहि देब ओकर कँगन संदेश मोर कतए गेलाह
Je Mor Ugnak Kahat Udes, Tahi Deb Okar Kangan Sandesh Mor Katae Gelah
जो कोई मेरे प्रिय को किसी दिशा में बताए, मैं उसे अपनी कंगन (चूड़ी) भेंट दूँगी संदेश के साथ। लेकिन मेरा प्रिय कहाँ गया है?
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॥ पद ४ ॥
नन्दन वन में महेश
नन्दन वन बीच भेटल महेस,
गौरी मन हरखित भेटल कलेस मोर कतए गेलाह
Nandan Van Beech Bhetel Mahes, Gauri Man Harkhit Bhetel Kales Mor Katae Gelah
नन्दन वन (वृन्दावन) के बीच शिव (महेश) मिले, गौरी (पार्वती) का मन खुश हुआ, लेकिन कलह (दुःख) भी देखा। लेकिन मेरा प्रिय कहाँ गया है?
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॥ पद ५ ॥
विद्यापति का निष्कर्ष
विद्यापति मन उगना सो काज,
नहि हितकर मोर तिहुवन राज मोर कतए गेलाह
Vidyapati Man Ugna So Kaaj, Nahi Hitkar Mor Tihuvan Raj Mor Katae Gelah
विद्यापति के मन में प्रिय की खोज ही काम (व्यस्तता) है। न ही तीनों लोकों का राज्य मेरे लिए हितकर है। मेरा प्रिय कहाँ गया है?
✦ गीत का आशय ✦
विद्यापति द्वारा रचित यह गीत राधा की विरह-वेदना को व्यक्त करता है। कृष्ण के बिना राधा के जीवन में कोई भी सुख नहीं — न भांग, न बटुआ, न ही तीनों लोकों का राज्य। केवल विरह की पीड़ा है।
Maithili Geet - Vidyapati • Radha Ki Virah Vedana • Prema Bhakti
यह गीत प्रेम की चरम परिणति को दर्शाता है — जहाँ प्रेमी के बिना प्रेमिका को कुछ भी आकर्षक नहीं रहता। विद्यापति की मैथिली भाषा में इस भाव को इतनी मधुरता से व्यक्त किया गया है कि यह गीत सदियों तक सुनी जाती है।
🌺 उगना रे — विद्यापति का गीत
विद्यापति (१४०२-१४८१ ई.) मिथिला के महान कवि थे जिन्होंने मैथिली भाषा को अपनी रचनाओं से समृद्ध किया। "उगना रे" उनके प्रसिद्ध प्रेम-गीतों में से एक है जो वृज-प्रेम के विषय पर आधारित है।
इस गीत में राधा की विरह-वेदना का सजीव चित्रण है। कृष्ण के विरह में राधा इतनी व्यथित हैं कि उन्हें संसार का कोई भी विषय आकर्षक नहीं लगता। मैथिली भाषा की सुमधुर गति और विद्यापति की काव्य-शैली इस गीत को अमर बनाती है।
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मैथिली परंपराविद्यापति को मैथिली भाषा का पितामह माना जाता है। उनकी रचनाएँ मैथिली साहित्य का आधार हैं।
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वृज-प्रेमयह गीत राधा-कृष्ण के प्रेम को मैथिली भाषा में सबसे मधुर रूप में प्रस्तुत करता है।
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विरह-रसविरह-रस का यह सबसे सुंदर उदाहरण है जहाँ प्रेमिका प्रेमी की खोज में व्यथित है।
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संगीत-परंपरायह गीत मिथिला में आज भी सामूहिक गायन की परंपरा में गाया जाता है।